उर्दू अदब के आसमान पर कुछ सितारे ऐसे होते हैं जो सिर्फ़ चमकते नहीं, बल्कि रास्ता भी दिखाते हैं। फ़हमीदा रियाज़ उन्हीं में से एक थीं। वे सिर्फ़ शायरा या लेखिका नहीं थीं, बल्कि एक सोच, एक एतराज़, और एक बेबाक आवाज़ थीं जो नारी, समाज, सत्ता और इंसान की आज़ादी की बात पूरी शिद्दत से करती थी।
फ़हमीदा रियाज़ का जन्म 28 जुलाई 1945 को उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक साहित्यिक परिवार में हुआ। यह वो दौर था जब हिंदुस्तान और पाकिस्तान की सरहदें खिंचने ही वाली थीं। बंटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया और सिंध में बस गया। फ़हमीदा की उम्र महज़ चार साल थी, जब उनके वालिद का इंतकाल हो गया। इसके बाद उनकी परवरिश उनकी मां ने की। एक ऐसी मां जिसने मुश्किल हालात में भी बेटी की तालीम और आज़ादी से समझौता नहीं किया।
रेडियो से अदब तक का सफ़र
फ़हमीदा ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद रेडियो पाकिस्तान में न्यूज़कास्टर के तौर पर काम शुरू किया। यहीं से उनकी आवाज़ लोगों तक पहुंची। लेकिन जल्द ही उन्होंने महसूस किया कि सिर्फ़ ख़बरें पढ़ना उनके मिज़ाज के मुताबिक़ नहीं है। उनके भीतर एक बेचैनी थी, सवाल थे, और उन सवालों को ज़बान देने की ज़रूरत थी।
बहुत कम उम्र में उन्होंने लिखना शुरू कर दिया। महज़ 15 साल की उम्र में उनकी पहली ग़ज़ल मशहूर साहित्यिक पत्रिका ‘फ़ुनून’ में प्रकाशित हुई। यह किसी भी युवा शायर के लिए बड़ी बात थी।
‘आवाज़’: जब कलम सत्ता के सामने खड़ी हो गई
फ़हमीदा और उनके पति रियाज़ ने मिलकर एक उर्दू पत्रिका ‘आवाज़’ शुरू की। यह पत्रिका सिर्फ़ साहित्य की नहीं, बल्कि इंसाफ़, बराबरी और लोकतंत्र की आवाज़ बन गई। इसमें जनरल ज़िया-उल-हक़ की तानाशाही नीतियों पर खुलकर सवाल उठाए जाते थे।
नतीजा ये हुआ कि ‘आवाज़’ पर पाबंदी लगा दी गई। फ़हमीदा और उनके पति पर देशद्रोह जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। पाकिस्तानी पीनल कोड की धारा 124 के तहत 10 से ज़्यादा मुक़दमे दर्ज हुए। उन्हें गिरफ्तार किया गया। जेल, डर और दबाव सब कुछ झेलना पड़ा। इसके बावजूद फ़हमीदा ने कलम नहीं छोड़ी।
सात साल हिंदुस्तान में फ़हमीदा
ज़मानत पर रिहा होने के बाद फ़हमीदा अपने दोनों बच्चों को लेकर भारत आ गईं। मुशायरों के बहाने आईं और फिर लगभग सात साल तक भारत में निर्वासित जीवन बिताया। मशहूर लेखिका अमृता प्रीतम ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से बात कर फ़हमीदा के भारत में रुकने की व्यवस्था करवाई।
इस दौरान फ़हमीदा जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली से जुड़ी रहीं और लगातार लिखती रहीं। यही वो समय था जब उनकी शायरी और नज़्मों में सरहदों से ऊपर उठकर इंसानियत बोलती है।
उनकी मशहूर नज़्म “तुम बिल्कुल हम जैसे निकले”
भारत-पाक रिश्तों पर एक गहरी टिप्पणी है-जहां दुश्मनी के पीछे छुपा एक जैसा दर्द साफ़ दिखता है।
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
फ़हमीदा रियाज़
अब तक कहां छुपे थे भाई
औरत की आवाज़, औरत की ज़ुबान
फ़हमीदा रियाज़ की शायरी में औरत कोई ख़ामोश किरदार नहीं है। वह सवाल करती है, चाहती है, चाहने का हक़ मांगती है, और अपने बदन और ज़िंदगी पर अपना इख़्तियार चाहती है।
उनकी नज़्में कहती हैं:
“दौलत, ताक़त और शोहरत सब कुछ भी नहीं
फ़हमीदा रियाज़
उसके बदन में छुपी है उसकी आज़ादी”
“जो मुझ में छुपा मेरा गला घोंट रहा है
या वो कोई इबलीस है या मेरा ख़ुदा है”
यह शायरी सिर्फ़ एहसास नहीं, बल्कि एतराज़ है पितृसत्ता, धार्मिक पाखंड और सत्ता के ज़ुल्म के ख़िलाफ़।
किताबें, जो सवाल बन गईं
फ़हमीदा रियाज़ ने 15 से ज़्यादा किताबें लिखीं। शायरी, नज़्म, नॉवेल और निबंध के रूप में। उनकी प्रमुख रचनाओं में शामिल हैं:
- पत्थर की ज़ुबान
- गोदावरी
- बदन दरिया
- धूप
- ख़त-ए-मरमूज़
- गुलाबी कबूतर
- खुले दरीचे से
- अधूरा आदमी
- क़ाफ़िले परिंदों के
- ख़ाना-ए-आब-ओ-गिल
उनका नॉवेल ‘बदन दरिया’ ख़ासा चर्चा में रहा। इस किताब को लेकर उन पर ये आरोप लगाए गए कि उन्होंने समाज की बंदिशों और रोक-टोक पर खुलकर लिखा है। और “कामुकता” लिखी है। लेकिन फ़हमीदा ने साफ़ कहा— औरत के जिस्म पर लिखना फहाशी नहीं, हक़ीक़त है।
फ़हमीदा रियाज़ का एक बड़ा योगदान अनुवाद के क्षेत्र में रहा। उन्होंने फ़ारसी और सिंधी साहित्य को उर्दू में पहुंचाया।
- मौलाना जलालुद्दीन रूमी की मसनवी का उर्दू अनुवाद किया
- शाह अब्दुल लतीफ़ भिटाई
- शेख़ अयाज़
- और अल्बेनियन लेखक इस्माइल कादरे
इन अनुवादों के ज़रिए उन्होंने सूफ़ी विचारधारा और इंसानी मुहब्बत को नई पीढ़ी तक पहुंचाया।
सम्मान और ज़िम्मेदारियां
1988 में बेनज़ीर भुट्टो के दौर में फ़हमीदा रियाज़ को नेशनल बुक फ़ाउंडेशन का प्रबंध निदेशक बनाया गया। वे उर्दू डिक्शनरी बोर्ड की प्रमुख भी रहीं। इसके अलावा उन्हें कई सम्मान मिले, जिनमें शामिल हैं:
- सितारा-ए-इम्तियाज़
- शेख़ अयाज़ अवार्ड
- ह्यूमन राइट्स के लिए हेलमैन-हैमेट अवार्ड
लंबी बीमारी के बाद 21 नवंबर 2018 को लाहौर में फ़हमीदा रियाज़ का इंतकाल हुआ। वे 73 साल की थीं। लेकिन फ़हमीदा रियाज़ मरी नहीं—वे आज भी ज़िंदा हैं अपनी नज़्मों में, अपने सवालों में, और उस हर औरत की आवाज़ में जो चुप रहने से इंकार करती है। फ़हमीदा रियाज़ हमारे दौर की वह आवाज़ हैं, जो आने वाले वक़्त में भी शिद्दत से सुनी जाती रहेंगी। क्योंकि सच की उम्र कभी ख़त्म नहीं होती।
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