मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य ज़िले बैतूल के छोटे से गांव टिकरिया में एक ऐसी कला आज भी ज़िंदा है, जिसकी जड़ें हज़ारों साल पुरानी सभ्यता से जुड़ी मानी जाती हैं। इस कला का नाम है भरेवा शिल्प (Bharewa Crafts)।
इस परंपरा को आज आगे बढ़ा रहे हैं अनिल बाघमारे (Anil Baghmare), जो अपने पूर्वजों से मिली इस धरोहर को न केवल संभाले हुए हैं, बल्कि उसे नई पहचान भी दे रहे हैं।
प्राचीन इतिहास से जुड़ी कला
भरेवा शिल्प की तकनीक को इतिहासकार ‘लॉस्ट वैक्स कास्टिंग’ यानी मोम ढलाई पद्धति से जोड़ते हैं। यही तकनीक प्राचीन काल में मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की सभ्यता में भी इस्तेमाल की जाती थी। यानी यह कला केवल एक शिल्प नहीं, बल्कि सभ्यता की विरासत है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही है।
क्या होता है ‘भरेवा’?
स्थानीय भाषा में ‘भरेवा’ का मतलब है भरने वाला। इस कला में पहले मोम से आकृति बनाई जाती है और फिर उसके भीतर पिघला हुआ पीतल भरा जाता है। इसी वजह से इसे भरेवा कहा जाता है। यह शिल्प गोंड समुदाय की परंपराओं से जुड़ा हुआ है। इसमें देवी-देवताओं की मूर्तियां, पारंपरिक आभूषण और पूजा-पाठ की वस्तुएं बनाई जाती हैं।

कैसे बनती है एक आकृति?
- सबसे पहले मिट्टी से एक आधार ढांचा तैयार किया जाता है।
- फिर मधुमक्खी के मोम से बारीक डिज़ाइन बनाई जाती है।
- उस पर दो तरह की मिट्टी की परत चढ़ाई जाती है।
- सांचा सूखने के बाद उसे आग में गर्म किया जाता है।
- गर्म करने पर मोम पिघल कर बाहर निकल जाता है और अंदर खाली जगह बन जाती है।
- उसी जगह में लगभग 1000 डिग्री तापमान पर पिघलता हुआ पीतल डाला जाता है।
- ठंडा होने के बाद मिट्टी तोड़ दी जाती है और अंदर से तैयार पीतल की मूर्ति निकल आती है।
फिर उसकी सफाई और फिनिशिंग में 2-3 दिन और लगते हैं।

इस शिल्प से क्या-क्या बनता है?
1. देवी-देवताओं की मूर्तियां
भरेवा शिल्प में सबसे ज़्यादा भगवान शिव और पार्वती की मूर्तियां बनाई जाती हैं। इसके अलावा ठाकुर देव और अन्य ग्राम देवताओं की प्रतिमाएं भी तैयार की जाती हैं।
2. पारंपरिक आभूषण
अंगूठियां, झुमके, बाजूबंद, कंगन और पायल जैसे आभूषण बनाए जाते हैं, जो आदिवासी पहनावे का अहम हिस्सा हैं।
3. ग्रामीण जीवन की आकृतियां
बैलगाड़ी, किसान, नर्तक-नर्तकी जैसी आकृतियां गांव के जीवन को दर्शाती हैं।
4. सजावटी दीपक
मोर आकार के दीपक और पारंपरिक चिमनी आज भी ख़ास आकर्षण का केंद्र हैं।
5. घंटियां और घुंघरू
छोटी-बड़ी घंटियां और घुंघरू पूजा और सजावट दोनों में उपयोग होते हैं।
6. उपयोगी घरेलू वस्तुएं
अब पेन होल्डर, हैंगर, किचन आइटम और अन्य सजावटी सामान भी बनाए जाते हैं।
7. पशु-पक्षियों की मूर्तियां
कछुआ, मोर, हाथी, घोड़ा और अन्य पशु-पक्षियों की सुंदर प्रतिमाएं भी तैयार की जाती हैं।
इस तरह भरेवा शिल्प पारंपरिक आस्था और आधुनिक ज़रूरत-दोनों को साथ लेकर चल रहा है।
महिलाओं को मिल रहा रोज़गार
अनिल बाघमारे अकेले काम नहीं करते। उनके साथ आज 25 से 30 लोग जुड़े हुए हैं, जिनमें अधिकतर महिलाएं हैं। महिलाएं ख़ासतौर पर डिज़ाइनिंग और बारीक काम में माहिर हैं। इस कला के ज़रिए 20 से 25 महिलाएं नियमित रूप से रोज़गार पा रही हैं। 2012-13 से अब तक वे राज्य और केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत करीब 300 से 400 महिलाओं को प्रशिक्षण दे चुके हैं। इससे गांव की कई महिलाएं आत्मनिर्भर बनी हैं।
विश्वकर्मा पुरस्कार से सम्मानित
अनिल बाघमारे को राज्य सरकार की ओर से विश्वकर्मा पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। दिल्ली जैसे बड़े शिल्प मेलों में भाग लेकर उन्होंने अपने उत्पादों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। वहां उनके काम को खूब सराहा गया और कई नए ऑर्डर भी मिले।
टिकरिया बना ‘शिल्प गांव’
आज टिकरिया गांव को एक ‘शिल्प गांव’ के रूप में पहचाना जाने लगा है। यहां कई परिवार भरेवा शिल्प से जुड़े हैं। यह केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि एक पहचान है अपनी संस्कृति को जीवित रखने की पहचान। आज दुनिया भर में हाथ से बनी चीज़ों की मांग बढ़ रही है। पर्यावरण के अनुकूल और पारंपरिक डिजाइन वाले उत्पाद लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। भरेवा शिल्प भी अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह बना रहा है। बैलगाड़ी, मोर दीपक, घंटियां और सजावटी फ्रेम विदेशों में भी पसंद किए जा रहे हैं।
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