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लखनऊ का स्टेट म्यूज़ियम: 6 करोड़ साल पुराना डायनासोर के अंडे से लेकर मिस्र की ममी का इतिहास अपने आंगन में समेटे

नवाबों के शहर लखनऊ (Lucknow, the City of Nawabs) में एक ऐसी जगह है, जहां आपको एक साथ छह करोड़ साल पुराना डायनासोर का अंडा (A 60-million-year-old dinosaur egg) भी मिल जाएगा और 40 हज़ार साल पुराना हाथी का दांत (A 40,000-Year-Old Elephant Tusk) भी। 3 हजार साल पुरानी ममी (3 thousand year old Mummy) भी आप देख सकते हैं। ये है लखनऊ का स्टेट म्यूज़ियम (The State Museum, Lucknow), जो उत्तर प्रदेश का सबसे पुराना और देश का पांचवां सबसे बड़ा संग्रहालय है।

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तारीख़ का आइना

इस म्युज़ियम की नींव सन् 1863 में रखी गई थी। उस वक़्त लखनऊ के डिविज़नल कमिश्नर कर्नल एबट ने सोचा कि प्रदेश की पुरानी रिवायतों और जन-जीवन से जुड़ी चीज़ों को इकट्ठा किया जाए। चुनांचे कैसरबाग स्थित छोटी छतर मंजिल में इसकी शुरुआत हुई। पहले ये एक म्युनिसिपल संस्था थी, लेकिन 1883 में इसे ‘Provincial Museum’ का दर्जा मिला।

इलाहाबाद से पुरातात्विक चीज़ें लाकर यहां रखी गईं। आज़ादी के बाद 1948 में सरकार ने Museum Reorganization Committee बनाई। 15 अगस्त 1956 को तत्कालीन मुख्यमंत्री सम्पूर्णानन्द ने नए भवन का शिलान्यास किया और 1963 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसका उद्घाटन किया। आज ये संग्रहालय नवाब वाजिद अली शाह प्राणी उद्यान (चिड़ियाघर) के बीचोंबीच चार मंज़िला इमारत में क़ायम है।

करीब डेढ़ लाख अनोखी चीज़ें

यहां करीब डेढ़ लाख नायाब चीज़ों का ज़ख़ीरा है। इन्हें अलग-अलग गैलरियों में सजाया गया है – जैन आर्ट गैलरी, भारतीय मूर्तिकला गैलरी, पुरातात्विक गैलरी, नवाबों की कला और सिक्कों की गैलरी, मिस्र की गैलरी, धातु कला गैलरी, प्राकृतिक इतिहास गैलरी और बुद्ध गैलरी।

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वो चीज़ें जो आपको हैरान कर देंगी

सबसे हैरतअंगेज़ चीज़ है छह करोड़ साल पुराना डायनासोर का अंडा। जी हां, आपने सही सुना,छह करोड़ साल! इसके अलावा यहां हाथी का 40 हज़ार साल पुराना दांत भी रखा है। कल्पना कीजिए, उस ज़माने की कोई चीज़ आज आपके सामने है।

पुरातात्विक गैलरी में पत्थर के ज़माने के औज़ार, सिंधु घाटी की मशहूर मूर्तियों के प्लास्टर कास्ट, मिट्टी की मुहरें, शिलालेख और मिट्टी के बर्तन मौजूद हैं। मथुरा की खुदाई से मिली ग्रे स्ख़िस्ट की मूर्तियां, मौर्य और शुंग काल की मूर्तियां, कुषाण और गुप्त काल की टेराकोटा मूर्तियां, ये सब देखते ही बनता है।

बौद्ध गैलरी में गांधार कला के ख़ूबसूरत नमूने हैं – बुद्ध के उपदेश देने वाले फ्रिज़ और बुद्ध का सिर। श्रावस्ती से मिले शिलालेख वाले बौद्ध शिल्प भी यहां रखे हैं।

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सिक्कों का ख़ज़ाना

ये संग्रहालय उत्तर प्रदेश सिक्का समिति का मुख्यालय भी है। यहां सिक्कों का बेशक़ीमती जखीरा है। आठवीं सदी ईसा पूर्व से लेकर मुग़ल काल तक के सिक्के। पांचाल, अयोध्या, इंडो-ग्रीक, कुषाण और गुप्त काल के सिक्के यहां देख सकते हैं। डच ईस्ट इंडिया कंपनी, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और अवध के सिक्के भी यहां मौजूद हैं।

नवाबों का जहां

अवध गैलरी में नवाबी तहज़ीब के रंग बिखरे हैं। यहां आपको बिदरी काम (हुक्का, पीकदान, बक्से), सोने-चांदी का जड़ाऊ काम, हाथी दांत की नक्क़ाशी, शीशे का काम और चिकन-जामदानी के नमूने दिखेंगे। अवध स्कूल की लघु चित्रकारी और ऑइल पेंटिंग भी यहां की ज़ीनत हैं।

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‘The Mummy’ भी है यहां

इस म्यूज़ियम में आपको मिस्र से लाई गई 3 हजार साल पुरानी ममी भी देखने को मिल जाएगी। ये ममी 13 साल की लड़की की है। इसको देखने में अपना एक अलग ही रोमांच हैं।  

अनोखा तोहफ़ा

एक ख़ास बात और इस म्यूज़ियम में वेद, पुराण, क़ुरान, गुरुग्रंथ साहिब और संविधान की मूल प्रतियां भी रखी गई हैं। ये हमारे गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल है।

आज भी ज़िंदा है ये संग्रहालय

संग्रहालय सिर्फ़ पुरानी चीज़ों का मकबरा नहीं, बल्कि आज भी पूरी तरह ज़िंदा है। यहां स्कूली बच्चों और कॉलेज के तालिब-ए-इल्म के लिए फ़िल्में दिखाई जाती हैं, सेमिनार और लेक्चर होते हैं। ऑडिटोरियम में दो सौ लोगों की गुंजाइश है।

एक लाइब्रेरी भी है, जहां विद्वान और तालीमी इदारों से जुड़े लोग ख़ास इजाज़त से किताबों से फ़ायदा उठा सकते हैं।

कैसे पहुंचें?

लखनऊ के बनारसीबाग में मौजूद इस संग्रहालय को देखने के लिए आपको मामूली शुल्क देना होता है। चिड़ियाघर के अंदर होने के बावजूद यह अपनी अलग पहचान रखता है।

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हमारे शानदार इतिहास का गवाह…

ये म्यूज़ियम सिर्फ़ पत्थर की मूर्तियों और पुराने सिक्कों का संग्रह नहीं है,ये हमारी तारीख़ का वो आइना है, जिसमें हम देख सकते हैं कि हम कहां से आए हैं। एक शायर ने ख़ूब कहा है:

न रहा जिस्म तो क्या, नाम का आलम है बाक़ी,
यही मौत का समां है, यही जिंदगी का सबब है।

इस संग्रहालय की हर चीज़ हमें बताती है कि हमारे पुरखे कैसे रहते थे, क्या सोचते थे, किस चीज़ पर फ़ख्र करते थे। अगर एक बार यहां आ जाएं तो तारीख़ का सफ़र आपको अपने आगोश में ले लेगा। तो फिर क्या इंतज़ार? लखनऊ जाइए, म्यूज़ियम देखिए, और इतिहास को महसूस कीजिए।

ये भी पढ़ें:  ‘दक्षिणी तहज़ीब’ का चेहरा और केरल की सांस्कृतिक ‘पहचान’ हैं कासरगोड की हथकरघा साड़ियां

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