आज के ज़माने में लग्ज़री घड़ियां कोई अनोखी चीज़ नहीं रहीं। हर कोई जानता है कि रोलेक्स, पटेक फिलिप, या ऑडेमार्स पिगेट जैसी ब्रांड्स की घड़ियां लाखों-करोड़ों में बिकती हैं। कलेक्टर इन्हें सेफ रखते हैं, नीलामी में इनकी कीमतें आसमान छूती हैं, और हर कोई इनकी मुश्किल से बनने वाली मूवमेंट और शानदार डिज़ाइन की तारीफ़ करता है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि करीब सौ साल पहले एक भारतीय महाराजा ने लग्ज़री को पूरी तरह नई परिभाषा दी थी? एक ऐसी घड़ी (Swiss watch) जिस पर समय बताने वाले नंबर नहीं, बल्कि खुद महाराजा का चेहरा बना हुआ था। ये कोई आम शौक नहीं था, ये थी शाही शान की इंतिहा।
पटियाला के शानदार शासक
पटियाला के महाराजाओं का नाम दुनिया भर में सबसे बड़े खर्चीले शासकों में लिया जाता था। चाहे वो कार्टियर के गहने हों या रोल्स-रॉयस की गाड़ियां, वे हर चीज़ में बेहतरीन चाहते थे। महाराजा भूपिंदर सिंह (1891-1938) ने तो कार्टियर से पटियाला नेकलेस जैसा अनमोल हीरों का हार बनवाया, जो उस वक्त की सबसे बड़ी कमिशनिंग में से एक थी।
और घड़ियां? वे तो इस शाही शौक का एक अहम हिस्सा थीं। महाराजा ने 1930 के आसपास एक सोने की पॉकेट घड़ी बनवाई, जिसके सामने की तरफ उनका खूबसूरती से बना इनेमल पोर्ट्रेट था और पीछे पटियाला का राजकीय चिन्ह। अंदर मिनट-रिपीटिंग मूवमेंट थी जो अपने ज़माने की सबसे मुश्किल और शानदार घड़ी कला थी।
जिनेवा के कलाकार का जादू
इन घड़ियों के पीछे एक और भी दिलचस्प कहानी है। भारत से भेजी गई तस्वीरों को देखकर जिनेवा के मशहूर इनेमल पोर्ट्रेटिस्ट जॉन ग्राफ (Geneva’s renowned enamel portraitist Jean Graff- 1836-1906) ये शानदार पोर्ट्रेट बनाते थे। उनकी ख़ासियत ये थी कि वो भेजी गई तस्वीरों से हूबहू चेहरा उतार लेते थे, चाहे तस्वीर कितनी भी साधारण क्यों न हो। उनके हाथों की कारीगरी इतनी कमाल की होती थी कि महाराजा अपनी घड़ियों पर ‘J. Graff’ का सिग्नेचर ज़रूर चाहते थे।
पटियाला के शासकों का ये शौक और भी पुराना था। महाराजा राजेंद्र सिंह (भूपिंदर सिंह के पिता) के लिए भी 1895 के आसपास ऐसी ही एक शानदार घड़ी बनाई गई थी, जिस पर जॉन ग्राफ का बनाया पोर्ट्रेट (Portrait created by John Graf) था ।
वो घड़ियां जो आज इतिहास हैं
ये घड़ियां सिर्फ वक्त बताने का जरिया नहीं हैं। ये उस ज़माने की कहानी हैं जब भारत के महाराजा यूरोप के लग्ज़री ब्रांड्स के सबसे बड़े कस्टमर्स हुआ करते थे। क्रिस्टीज़ जैसी नीलामियों में जब ये घड़ियां आती हैं, तो कलेक्टर और इतिहासकार इनकी कारीगरी और दुर्लभता पर दंग रह जाते हैं।
आज के कलेक्टर सिर्फ एक घड़ी नहीं खरीदते, वे एक ज़माना खरीदते हैं। और जब बात पटियाला की इन घड़ियों की आती है, तो वे शाही ठाठ का वो नमूना खरीदते हैं जो शायद ही कभी देखने को मिलता है।
सोचिए, आज अगर कोई आपको ऐसी घड़ी दिखाए जिस पर आपका अपना चेहरा बना हो, तो आप हैरान रह जाएंगे। लेकिन पटियाला के महाराजा के लिए यह कोई हैरान करने वाली बात नहीं थी। ये तो उनकी शान का एक हिस्सा था। और शायद यही चीज़ आज भी इन घड़ियों को इतना ख़ास बनाती है। वक़्त पर अपनी मुहर लगाने वाले उन शासकों की याद, जिन्होंने लग्ज़री को एक नई पहचान दी।
आज जब हम इन घड़ियों के बारे में पढ़ते हैं, तो हमें एक झलक मिलती है उस शानदार दौर की, जब भारतीय राजाओं के सामने दुनिया की बड़ी-बड़ी लग्जरी कंपनियाँ झुकती थीं।
ये सिर्फ एक घड़ी की कहानी नहीं है-यह भारत की शाही विरासत की कहानी है
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