सिख धर्म में गुरु के लंगर की परंपरा से लगभग हर कोई वाकिफ़ है। यहां बिना किसी भेदभाव के हर इंसान एक साथ बैठकर लंगर का प्रसाद खाता है। लेकिन पंजाब में एक ऐसा ऐतिहासिक गुरुद्वारा साहिब भी है, जहां लंगर तो तैयार होता है, मगर कुछ ख़ास श्रद्धालुओं को उसे खाने की इजाज़त नहीं है। तरन तारन साहिब के नज़दीक बसे गांव चंबल में स्थित “गुरुद्वारा धन-धन बाबा सिद्ध सरसाई जी” में ये अनोखी मर्यादा पिछले कई सदियों से निभाई जा रही है।
गुरु अर्जन देव जी से जुड़ा इतिहास
इस जगह की मर्यादा सिखों के पांचवें गुरु, श्री गुरु अर्जन देव जी के समय से चली आ रही है। उस दौर में तरन तारन साहिब में पवित्र सरोवर की खुदाई की सेवा चल रही थी। बाबा सिद्ध सरसाई जी रोज़ अपने घर से प्रसाद ग्रहण करके सेवा के लिए आते थे और दिन-रात पूरी निस्वार्थ भावना से सेवा करते थे। एक दिन एक कोढ़ (कुष्ठ रोग) से पीड़ित व्यक्ति गुरु अर्जन देव जी के दरबार में आया।
उसने अपनी बीमारी से छुटकारा पाने की अरदास की। तब गुरु साहिब ने संगत से पूछा, “क्या यहां कोई ऐसा व्यक्ति है, जो पूरी निस्वार्थ भावना से नितनेम करता हो और रोज़ अपने घर से प्रसाद ग्रहण करके आता हो?” दो-तीन बार आवाज़ लगाने के बाद भी जब कोई आगे नहीं आया, तो गुरु अर्जन देव जी ने खुद बाबा सिद्ध सरसाई जी का नाम लेकर उन्हें बुलाया।

निस्वार्थ सेवा और करामात
गुरु साहिब ने बाबा सिद्ध सरसाई जी की सेवा और श्रद्धा देखकर फरमाया, “इस बीमार व्यक्ति को अपना पल्ला छुआओ।” बाबा जी ने बड़ी विनम्रता से कहा, “सच्चे पातशाह, मेरे पास कोई ताक़त नहीं है। अगर आप मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दें, तो आपकी मेहर से कोई करामात हो सकती है।” गुरु साहिब के दोबारा हुक्म देने पर जैसे ही बाबा जी ने उस बीमार व्यक्ति को अपना पल्ला छुआया, वो पूरी तरह ठीक हो गया।
इससे खुश होकर गुरु अर्जन देव जी ने आशीर्वाद दिया कि आने वाले समय में आपके वंश का जो भी व्यक्ति यहां सेवा करेगा और किसी रोगी को ‘रख’ लगाएगा, उसकी चमड़ी का रोग ठीक हो जाएगा। लेकिन इसके लिए रोगी को इस स्थान की ख़ास मर्यादा और नियमों का पालन करना होगा।
रोगियों के लिए नियम और मर्यादा
ये ‘रख’ 40 दिनों के लिए दी जाती है। आज भी चमड़ी के रोग से परेशान लोगों को गुरुद्वारा साहिब का लंगर खाने की इजाज़त नहीं होती। हालांकि, उनके साथ आए परिवार के लोग और रिश्तेदार लंगर ग्रहण कर सकते हैं। गुरुद्वारे से मिली ‘रख’ को घर में किसी पवित्र या धार्मिक जगह पर रखने की सलाह दी जाती है। इसके साथ ही रोगी को 40 दिनों तक कुछ ख़ास नियमों का पालन करना होता है, जैसे—
श्रद्धा के तौर पर सवा किलो गुड़ लेकर आना।
अरदास में पूरी श्रद्धा और विनम्रता के साथ शामिल होना और घर पर रोज़ नितनेम करना।
40 दिनों तक मांस और शराब से दूर रहना।
पंजाब के गांव चंबल में स्थित ये पवित्र स्थान आज भी गुरु साहिब के बचनों और अटूट विश्वास की मिसाल माना जाता है। यहां आने वाली संगत का यकीन है कि गुरु महाराज की मेहर से लोगों को चमड़ी के रोगों से राहत मिलती है। यही वजह है कि दूर-दूर से श्रद्धालु आज भी पूरी आस्था के साथ इस गुरुद्वारा साहिब में माथा टेकने आते हैं।
स्टोरी– मनमीत कौर
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