Saturday, August 22, 2026
30 C
Delhi

पंजाब का अनोखा गुरुद्वारा: यहां हर किसी को लंगर खाने की इजाज़त नहीं मिलती

सिख धर्म में गुरु के लंगर की परंपरा से लगभग हर कोई वाकिफ़ है। यहां बिना किसी भेदभाव के हर इंसान एक साथ बैठकर लंगर का प्रसाद खाता है। लेकिन पंजाब में एक ऐसा ऐतिहासिक गुरुद्वारा साहिब भी है, जहां लंगर तो तैयार होता है, मगर कुछ ख़ास श्रद्धालुओं को उसे खाने की इजाज़त नहीं है। तरन तारन साहिब के नज़दीक बसे गांव चंबल में स्थित “गुरुद्वारा धन-धन बाबा सिद्ध सरसाई जी” में ये अनोखी मर्यादा पिछले कई सदियों से निभाई जा रही है।

गुरु अर्जन देव जी से जुड़ा इतिहास

इस जगह की मर्यादा सिखों के पांचवें गुरु, श्री गुरु अर्जन देव जी के समय से चली आ रही है। उस दौर में तरन तारन साहिब में पवित्र सरोवर की खुदाई की सेवा चल रही थी। बाबा सिद्ध सरसाई जी रोज़ अपने घर से प्रसाद ग्रहण करके सेवा के लिए आते थे और दिन-रात पूरी निस्वार्थ भावना से सेवा करते थे। एक दिन एक कोढ़ (कुष्ठ रोग) से पीड़ित व्यक्ति गुरु अर्जन देव जी के दरबार में आया।

उसने अपनी बीमारी से छुटकारा पाने की अरदास की। तब गुरु साहिब ने संगत से पूछा, “क्या यहां कोई ऐसा व्यक्ति है, जो पूरी निस्वार्थ भावना से नितनेम करता हो और रोज़ अपने घर से प्रसाद ग्रहण करके आता हो?” दो-तीन बार आवाज़ लगाने के बाद भी जब कोई आगे नहीं आया, तो गुरु अर्जन देव जी ने खुद बाबा सिद्ध सरसाई जी का नाम लेकर उन्हें बुलाया।

Pic Credit: Social Media

निस्वार्थ सेवा और करामात

गुरु साहिब ने बाबा सिद्ध सरसाई जी की सेवा और श्रद्धा देखकर फरमाया, “इस बीमार व्यक्ति को अपना पल्ला छुआओ।” बाबा जी ने बड़ी विनम्रता से कहा, “सच्चे पातशाह, मेरे पास कोई ताक़त नहीं है। अगर आप मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दें, तो आपकी मेहर से कोई करामात हो सकती है।” गुरु साहिब के दोबारा हुक्म देने पर जैसे ही बाबा जी ने उस बीमार व्यक्ति को अपना पल्ला छुआया, वो पूरी तरह ठीक हो गया।

इससे खुश होकर गुरु अर्जन देव जी ने आशीर्वाद दिया कि आने वाले समय में आपके वंश का जो भी व्यक्ति यहां सेवा करेगा और किसी रोगी को ‘रख’ लगाएगा, उसकी चमड़ी का रोग ठीक हो जाएगा। लेकिन इसके लिए रोगी को इस स्थान की ख़ास मर्यादा और नियमों का पालन करना होगा।

रोगियों के लिए नियम और मर्यादा

ये ‘रख’ 40 दिनों के लिए दी जाती है। आज भी चमड़ी के रोग से परेशान लोगों को गुरुद्वारा साहिब का लंगर खाने की इजाज़त नहीं होती। हालांकि, उनके साथ आए परिवार के लोग और रिश्तेदार लंगर ग्रहण कर सकते हैं। गुरुद्वारे से मिली ‘रख’ को घर में किसी पवित्र या धार्मिक जगह पर रखने की सलाह दी जाती है। इसके साथ ही रोगी को 40 दिनों तक कुछ ख़ास नियमों का पालन करना होता है, जैसे—

श्रद्धा के तौर पर सवा किलो गुड़ लेकर आना।

अरदास में पूरी श्रद्धा और विनम्रता के साथ शामिल होना और घर पर रोज़ नितनेम करना।

40 दिनों तक मांस और शराब से दूर रहना।

पंजाब के गांव चंबल में स्थित ये पवित्र स्थान आज भी गुरु साहिब के बचनों और अटूट विश्वास की मिसाल माना जाता है। यहां आने वाली संगत का यकीन है कि गुरु महाराज की मेहर से लोगों को चमड़ी के रोगों से राहत मिलती है। यही वजह है कि दूर-दूर से श्रद्धालु आज भी पूरी आस्था के साथ इस गुरुद्वारा साहिब में माथा टेकने आते हैं।

स्टोरी– मनमीत कौर

इस लेख को पंजाबी में पढ़ें

ये भी पढ़ें: दिल्ली में ‘वीर जी दा डेरा’ करीब 35 सालों से लोगों की कर रहा सेवा

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

नौवारी साड़ी: योद्धा रानियों का वेश,मॉडर्न मराठी दुल्हन की पहचान

आपने कभी महाराष्ट्रीयन शादी देखी होगी... या गणेश चतुर्थी...

अख़लाक़ अहमद आहन: फ़ारसी और उर्दू अदब की एक ख़ास आवाज़

फ़ारसी और उर्दू अदब की दुनिया में प्रोफ़ेसर अख़लाक़...

शाहिद अहमद देहलवी: दिल्ली की तहज़ीब और उर्दू अदब के अमीन

उर्दू अदब की दुनिया में शाहिद अहमद देहलवी का...

Topics

नौवारी साड़ी: योद्धा रानियों का वेश,मॉडर्न मराठी दुल्हन की पहचान

आपने कभी महाराष्ट्रीयन शादी देखी होगी... या गणेश चतुर्थी...

अख़लाक़ अहमद आहन: फ़ारसी और उर्दू अदब की एक ख़ास आवाज़

फ़ारसी और उर्दू अदब की दुनिया में प्रोफ़ेसर अख़लाक़...

शाहिद अहमद देहलवी: दिल्ली की तहज़ीब और उर्दू अदब के अमीन

उर्दू अदब की दुनिया में शाहिद अहमद देहलवी का...

Related Articles

Popular Categories