“मंदिर भी साफ़ हम ने किए मस्जिदें भी पाक
मुश्किल ये है कि दिल की सफ़ाई न हो सकी।”
यह सिर्फ़ एक शेर नहीं, बल्कि तिलोकचंद महरूम की पूरी फ़िक्र का आईना है। उन्होंने अपनी शायरी में मज़हब से ज़्यादा इंसान को अहमियत दी, और यही वजह है कि उनका कलाम आज भी उतना ही ताज़ा महसूस होता है जितना अपने दौर में था।
शुरुआती ज़िंदगी
उर्दू अदब के मशहूर शायर तिलोकचंद महरूम की पैदाइश 1 जुलाई 1887 को पंजाब के मियांवाली ज़िले (अब पाकिस्तान) के एक छोटे से गांव मौसा नूर ज़मान शाह में हुयी। उनका बचपन बेहद सादगी में गुज़रा। गांव सिंधु नदी की बाढ़ से अक्सर प्रभावित होता था, इसलिए उनका परिवार बाद में इसाखेल जाकर बस गया।
महरूम बचपन से ही पढ़ाई में बहुत होशियार थे। हर साल अपनी कक्षा में अव्वल आते और वज़ीफ़ा (स्कॉलरशिप) हासिल करते। उस दौर में उनके इलाक़े में उच्च शिक्षा की सुविधाएं बहुत कम थीं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। 1907 में बन्नू के डायमंड जुबिली स्कूल से मैट्रिक प्रथम श्रेणी में पास किया। इसके बाद सेंट्रल ट्रेनिंग कॉलेज, लाहौर से शिक्षक प्रशिक्षण लिया और बी.ए. की डिग्री हासिल की।
अध्यापन से साहित्य तक का सफ़र
सन् 1908 में उन्होंने डेरा इस्माइल ख़ान के मिशन हाई स्कूल में अंग्रेज़ी शिक्षक के रूप में नौकरी शुरू की। बाद में घरेलू वजहों से इसाखेल लौट आए। शिक्षा और समाज-सेवा के प्रति उनकी लगन उन्हें अलग-अलग शहरों तक ले गई।
सन् 1924 में वे कालूरकोट के मिडिल स्कूल के हेडमास्टर बने। बाद में रावलपिंडी के कैंटोनमेंट बोर्ड स्कूल के पहले हेडमास्टर नियुक्त हुए। इसके बाद उन्होंने गॉर्डन कॉलेज में उर्दू और फ़ारसी के लेक्चरर के रूप में भी सेवाएं दीं।
बंटवारे का दर्द
सन् 1947 में देश के बंटवारे ने लाखों लोगों की तरह महरूम की ज़िंदगी भी बदल दी। उन्हें रावलपिंडी छोड़कर दिल्ली आना पड़ा। दिल्ली में कुछ समय तक उन्होंने ‘तेज’ अख़बार के साहित्यिक साप्ताहिक संस्करण का संपादन किया।
बाद में शरणार्थियों की शिक्षा के लिए स्थापित कैंप कॉलेज, दिल्ली में उन्हें उर्दू के प्रोफ़ेसर के रूप में नियुक्त किया गया। वे 1957 तक वहीं पढ़ाते रहे और फिर सेवानिवृत्त हुए।
बचपन से शायरी का शौक़
महरूम को शायरी से मोहब्बत बहुत छोटी उम्र में ही हो गई थी। जब वे मिडिल स्कूल में पढ़ते थे, तभी उन्होंने मलिका विक्टोरिया पर एक मर्सिया लिखा था।
करीब 12–13 साल की उम्र में उन्होंने “ख़िदमत-ए-वालिदैन” नाम की नज़्म लिखी, जिसे शिक्षा अधिकारियों ने भी बहुत सराहा।
हाईस्कूल के दिनों से ही उनकी नज़्में मशहूर उर्दू रिसालों ‘मख़ज़न’ और ‘ज़माना’ में छपने लगी थीं। यही वह दौर था जब उनकी पहचान एक उभरते हुए शायर के रूप में बनने लगी।
ग़ालिब और ज़ौक़ से मिली प्रेरणा
महरूम ने किसी उस्ताद से बाक़ायदा शायरी नहीं सीखी। उन्होंने ख़ुद ही मिर्ज़ा ग़ालिब और शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ का कलाम पढ़ा और उसी से अपनी शायरी का रास्ता बनाया।
यही वजह है कि उनकी शायरी में क्लासिकी रंग भी मिलता है और आधुनिक सोच भी।
महरूम की शायरी की ख़ासियत
तिलोकचंद महरूम की शायरी बेहद सादा, असरदार और दिल से निकली हुई लगती है। वे मुश्किल अल्फ़ाज़ के बजाय आसान ज़ुबान में गहरी बातें कहते हैं।
उनके यहां मोहब्बत भी है, इंसानियत भी, वतन से मोहब्बत भी और समाज की सच्चाइयां भी।
उनकी ग़ज़लों और नज़्मों में इंसान को मज़हब से ऊपर रखा गया है। वे मानते थे कि अगर इंसान का दिल साफ़ नहीं है तो सिर्फ़ इबादतगाहों की सफ़ाई का कोई मतलब नहीं।
मंदिर भी साफ़ हम ने किए मस्जिदें भी पाक
मुश्किल ये है कि दिल की सफ़ाई न हो सकी।
वतनपरस्ती की बुलंद आवाज़
महरूम की नज़्मों में राष्ट्रीय भावना बहुत मज़बूत दिखाई देती है। उनकी देशभक्ति किसी नारे की तरह नहीं, बल्कि एक सच्चे एहसास की तरह सामने आती है।
इसी वजह से उन्हें चकबस्त और सुरूर जहानाबादी की परंपरा का अहम शायर माना जाता है।
इंसानियत सबसे बड़ा मज़हब
महरूम एक हिंदू परिवार में पैदा हुए, लेकिन उनका बचपन मुस्लिम आबादी के बीच गुज़रा। इसी वजह से उनकी सोच हमेशा गंगा-जमुनी तहज़ीब से जुड़ी रही।
वे कहते नहीं थे, बल्कि अपनी ज़िंदगी से साबित करते थे कि इंसान की पहचान उसका मज़हब नहीं, उसका किरदार होता है।
जब उनकी बेटी शकुंतला का इंतक़ाल हुआ, तो उनकी इच्छा के मुताबिक़ उसे दफ़नाया गया। और जब महरूम का निधन हुआ तो उनकी अर्थी को हिंदू, मुस्लिम और सिख—तीनों समुदायों के लोगों ने कंधा दिया। उनके दसवें में वेद, भगवद्गीता, क़ुरआन और सुखमनी साहिब—सभी धर्मग्रंथों का पाठ हुआ। यह उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी पहचान थी।
बड़े शायरों की नज़र में महरूम
महरूम के कलाम की तारीफ़ अपने दौर के कई बड़े अदीबों और शायरों ने की। मुहम्मद इक़बाल, फ़िराक़ गोरखपुरी, कैफ़ी आज़मी, नियाज़ फ़तेहपुरी, जोश मलसियानी और एजाज़ हुसैन जैसे साहित्यकारों ने उनकी शायरी की खुलकर सराहना की।
लगभग पांच हफ़्तों की बीमारी के बाद 6 जनवरी 1966 को दिल्ली में तिलोकचंद महरूम का इंतक़ाल हो गया।
उनके बेटे, मशहूर शायर जगन्नाथ आज़ाद, ने उनकी किताबों का निजी संग्रह कश्मीर विश्वविद्यालय की अल्लामा इक़बाल लाइब्रेरी को भेंट कर दिया, जहां आज भी यह संग्रह शोधकर्ताओं के लिए एक अहम धरोहर है।
महरूम के कुछ यादगार अशआर
साफ़ आता है नज़र अंजाम हर आग़ाज़ का
ज़िंदगानी मौत की तम्हीद है मेरे लिए।
ऐ हम-नफ़स न पूछ जवानी का माजरा
मौज-ए-नसीम थी, इधर आई उधर गई।
यूं तो बरसों न पिलाऊं न पियूं ऐ ज़ाहिद
तौबा करते ही बदल जाती है नीयत मेरी।
नज़र उठा दिल-ए-नादां ये जुस्तुजू क्या है
उसी का जल्वा तो है और रू-ब-रू क्या है।
तिलोकचंद महरूम उन शायरों में शामिल हैं जिन्होंने शायरी को सिर्फ़ इश्क़ और हुस्न तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इंसानियत, वतन, भाईचारे, नैतिकता और ज़िंदगी की सच्चाइयों को अपनी ग़ज़लों और नज़्मों का मौज़ू बनाया।
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