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बीते दौर की मशहूर पंजाबी लोक गायिका बीबी नूरां की सुरीली आवाज़

ये करीब साल 1974 या 1975 की बात है, जब मैंने पहली बार बीबी नूरां की आवाज़ सुनी। दोपहर में आकाशवाणी जालंधर के “लोक गीत” कार्यक्रम में वो गा रही थी।

“कुल्ली साड़ सुट्टी काहनूं मेरी,
मैं आगे तंग बथेरी…”

उनकी आवाज़ सुनते ही ऐसा लगा जैसे कहीं दूर रेगिस्तान के टीलों पर बनी एक छोटी-सी झोंपड़ी में दिया जल रहा हो और उसकी रोशनी चारों तरफ फैल रही हो। कुछ समय बाद बटाला में मशहूर फ़ोटोग्राफ़र और लेखक हरभजन सिंह बाजवा ने “साहित्य कला संसार” की ओर से शिव कुमार की बरसी पर बीबी नूरां को बुलाया। मुझे आज भी याद है, वो अपने बेटों के साथ बस से जालंधर से आई थी। हारमोनियम एक पतले कपड़े में लिपटा हुआ था और बैग में ढोलकी रखी थी।

बटाला में ये उनका पहला प्रोग्राम था। उन्हें अपनी आवाज़ पर पूरा यक़ीन था। जैसे ही उन्होंने आलाप लिया, लगा कि पूरे शहर के बुझे हुए दीये एक साथ जल उठे हों। उनकी आवाज़ आसमान तक पहुंच रही थी। उन्होंने गाया—

“जीअ वे सोहणियां जीअ,
भले किसी का होकर जीअ…”

इसके अलावा भी उन्होंने कई गीत सुनाए। करीब एक घंटे तक लगातार गाती रही। आज भी जब वो महफ़िल याद आती है तो रूह तक भीग जाती है। उसी दिन मुझे पता चला कि हमारे पंजाब की ‘रेशमा’ कही जाने वाली बीबी नूरां जालंधर के नकोदर रोड पर रहती हैं।

बीबी नूरां से पहली मुलाक़ात

साल 1978 की सर्दियों की बात है। मेरी आकाशवाणी जालंधर में कविता पाठ की रिकॉर्डिंग थी। उस समय कार्यक्रम निर्माता एस. एस. मीशा जी थे। उनके पास इंग्लैंड से पंजाबी लेखक कुलदीप तख्खर आए हुए थे। उन्होंने 1973 में इंग्लैंड में शिव कुमार बटालवी के साथ काफ़ी समय बिताया था और उनकी बहुत-सी यादें अपने साथ लेकर आए थे।

तख्खर साहब के पास चांदी का वो पैमाना भी था, जिससे शिव कुमार शराब नापकर पीते थे। बाद में 2012 में अमेरिका के स्टॉकटन शहर में उनके घर जाकर मैंने वो पैमाना दोबारा देखा। उन्होंने शिव कुमार की मशहूर रचना “मैं ते मैं” की हस्तलिखित प्रति भी संभालकर रखी थी।

उसी दौरान तय हुआ कि हम बीबी नूरां से भी मिलने चलेंगे। कुलदीप तख्खर को लेखकों और गायकों की आवाज़ें रिकॉर्ड करने का शौक़ था। वो नूरां जी के घर जाकर उनकी बातचीत और गायकी रिकॉर्ड करना चाहते थे। मीशा जी ने मुझे भी साथ चलने के लिए कहा और हम तीनों स्कूटर पर आबादपुरा मोहल्ले पहुंच गए।

गरीबी में जीती एक बड़ी फ़नकार

उनका घर देखकर मुझे यक़ीन ही नहीं हुआ कि इतनी ख़ूबसूरत आवाज़ वाली गायिका इतने मुश्किल हालात में रहती हैं। चारों तरफ़ गंदा पानी जमा था, बदबू फैली रहती थी। यही निशानी थी कि बीबी नूरां का घर पास ही है।

ये 1978 की बात है। उस समय उनके घर में बिजली तक नहीं थी। रातें अंधेरे में कटती थी, लेकिन उनकी ज़िंदगी सुरों की रोशनी से जगमगाती रहती थी। बीबी नूरां बिल्कुल सादा और फ़क़ीराना मिज़ाज की औरत थी। वो मीर आलम परिवार की बेटी और बहू थी। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “गाना तो हमारा पुश्तैनी पेशा है। मैं बचपन से गा रही हूं।”

उनका जन्म शाहकोट के पास कोटला सूरज मल गांव में हुआ था, लेकिन उन्हें अपनी जन्मतिथि या साल तक याद नहीं था। उस समय उनकी उम्र करीब 50–55 साल रही होगी। जब वो कान पर हाथ रखकर ऊंची तान लगाती, तो ऐसा लगता जैसे सुर रबड़ की तरह लंबा होता ही चला जा रहा हो।

रेडियो तक कैसे पहुंची?

उन्होंने बताया कि वो पिछले सात-आठ साल से ऑल इंडिया रेडियो के लिए गा रही हैं। जालंधर दूरदर्शन पर भी कभी-कभी उनके कार्यक्रम आते हैं। बलवंत गार्गी की शिव कुमार बटालवी पर बनी डॉक्यूमेंट्री में भी उन्होंने ये पंक्तियां गाई थी— “इक दी अख़ दा तारा चल्लिया, इक दी अख़ दा नूर…”

उन्होंने ये भी बताया कि बीबी जगमोहन कौर की सलाह पर उनकी आवाज़ में एक एलपी रिकॉर्ड निकला था। वो रिकॉर्ड कनाडा और अमेरिका तक पहुंचा, लेकिन बीबी नूरां को उसकी रॉयल्टी कभी नहीं मिली। जब उन्होंने ये बात जगमोहन कौर तक पहुंचाने को कहा तो जवाब मिला कि उस समय एचएमवी कंपनी एक गीत के सिर्फ़ दस रुपये देती थी। चार गीतों के उन्हें कुल चालीस रुपये मिले थे।

रेडियो पर गाने की शुरुआत भी बड़ी दिलचस्प थी। उन्होंने हंसते हुए बताया— “मेरे धर्म-भाई और लोक गायक जगत सिंह जग्गा और मेरी भाभी मुझसे बोले कि चलो, तुम्हें नए कपड़े सिलवाने हैं। लेकिन बाज़ार ले जाने की बजाय सीधे रेडियो स्टेशन ले गए। वहां मीशा साहब और सहायक केंद्र निदेशक एन. एम. भाटिया ने मेरा गाना सुना और मुझे गाने का मौक़ा दे दिया। उसके बाद मैं लगातार रेडियो पर गाने लगी।”

सूफ़ी कलाम की सच्ची आवाज़

बीबी नूरां सिर्फ़ सूफ़ी कलाम ही नहीं गाती थी, बल्कि बाबा हश्मत शाह, बाबा बुल्ले शाह और शाह हुसैन की काफ़ियां भी बड़े दर्द और रूहानी अंदाज़ में गाती थी। उन्होंने अपने बेटे मालटा को ढोलकी बजाने के लिए बुलाया और ख़ुद हारमोनियम संभाल लिया। फिर पूरी मस्ती और रूहानी कैफ़ियत में गाने लगी— “असां ऐवें ना फ़कीरी तेरी मल्ली, बहाना तेरे तक लैण दा…” उन्हें सुनते हुए ऐसा लगता था जैसे कोई अंधेरे जंगल में हाथ में जलता हुआ दिया लेकर अपने घर का रास्ता तलाश रहा हो।

परिवार में भी ज़िंदा रही संगीत की विरासत

उनका छोटा बेटा ढोलकी बहुत अच्छा बजाता था और बड़ा बेटा हारमोनियम बजाता था। बीबी नूरां ने संगीत की शुरुआती तालीम अपने पिता से ली थी। बाद में उस्ताद गुलाम मोहम्मद से संगीत की बारीकियां सीखी। वो आधी-आधी रात तक रियाज़ करती थी। उन्होंने बताया कि वो बिल्कुल अनपढ़ हैं। उन्हें लिखना-पढ़ना नहीं आता। कोई गीत एक बार सुन लें तो ज़बानी याद कर लेती हैं।

उनकी बेटी स्वर्ण नूरां और बड़ी बहू घर संभालती थी। इसी स्वर्ण नूरां का बेटा गुलशन मीर है, जिसकी बेटियां सुल्ताना, ज्योति और रितु आज बहुत अच्छा गाती हैं। उनका बेटा भी संगीत से जुड़ा हुआ है। 1978 में बीबी नूरां अपने बेटों के साथ गांवों और शादी-ब्याह के कार्यक्रमों में गाने जाया करती थी। सफ़ेद कपड़ों में वो किसी फ़क़ीरनी जैसी दिखाई देती थी। उन्होंने कभी शोहरत या चमक-दमक का सहारा नहीं लिया। बस अपनी सादगी और गायकी से लोगों के दिल जीतती रही।

हमेशा याद रहने वाली मुलाक़ात

बीबी नूरां के साथ हमारी बातचीत की रिकॉर्डिंग बाद में निंदर घुगियाणवी ने देश-विदेश तक पहुंचाई। उन्होंने देसी रेडियो यूके के लिए उन पर एक विशेष ऑडियो फ़ीचर भी तैयार किया। मैंने भी बीबी नूरां पर एक फ़ीचर रिकॉर्ड किया, जिसे दिलबाग हुंदल के यूट्यूब चैनल बावा रेडियो पर साझा किया गया।

आज उनके बेटे मालटा (माटा), जो अब नियाज़ अली के नाम से भी गाते हैं, नवांशहर में रहते हैं। उनके बेटे भी संगीत की इसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। आज जब भी बीबी नूरां याद आती हैं तो दिल भर आता है। उनसे मेरी सिर्फ़ पांच-छह मुलाक़ातें हुईं, लेकिन उन मुलाक़ातों ने उम्र भर का रिश्ता बना दिया। उनकी सादगी, दर्द भरी आवाज़ और फ़क़ीराना ज़िंदगी आज भी दिल में उसी तरह बसी हुई है।

स्टोरी– गुरभजन सिंह गिल

इस लेख को पंजाबी में पढ़ें

ये भी पढ़ें: Zubeen Garg: असम के दिल में आज भी धड़कती एक अमर आवाज़

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