तमिलनाडु के पुरातत्व विभाग ने एक ऐसी खोज का ऐलान किया है जिसने इतिहास-प्रेमियों और कला- प्रेमियो के दिलों में एक अजीब-सी बेताबी पैदा की है। बंदरगाह नगर नागपट्टिनम (Nagapattinam) में ज़मीन के सिर्फ़ एक मीटर नीचे से चोल-काल (The Chola) की दो कांस्य मूर्तियां मिली हैं। जिसमें एक भगवान शिव के नटराज स्वरूप की और दूसरी देवी शिवकामी की मूर्ति (An idol of Lord Shiva in his Nataraja form, and another of the goddess Shivakami) है। राज्य के पुरातत्व मंत्री ए. राजमोहन ने इस खोज की तस्दीक करते हुए इस मक़ाम की तारीख़ी अहमियत पर ज़ोर दिया।

नटराज: बारहवीं सदी की दास्तान
खोजी गई नटराज की मूर्ति अपने आप में एक मुकम्मल दास्तान है। 110 सेंटीमीटर ऊंची और 100 सेंटीमीटर चौड़ी ये प्रतिमा भगवान शिव को ‘आनंद तांडव’ मुद्रा में दिखाती है। वही लयात्मक मुद्रा जिसमें ब्रह्मांड की सृष्टि और संहार दोनों समाए हुए हैं। चार भुजाओं वाली इस मूर्ति में ‘अभय मुद्रा’ और ‘गजहस्त मुद्रा’ जैसी बारीक मुद्राएं तराशी गई हैं। एक पैर ऊपर उठा हुआ है तो दूसरा अज्ञान के प्रतीक राक्षस मुयालक के ऊपर टिका है। ये वही क्लासिकी तस्वीर है जो चोल कारीगरों की उंगलियों की महारत का सबूत है।
इसके साथ ही 82 सेंटीमीटर ऊंची शिवकामी की प्रतिमा मिली है जो ‘त्रिभंग’ मुद्रा में खड़ी है। कमर, कंधे और गर्दन के तीन मोड़ों वाली वह नज़ाकत भरी अदा जो दक्षिण भारतीय कला की पहचान है। दोनों ही मूर्तियां पीठिकाओं (पेडस्टल) परमौजूद पाई गई हैं।

क्यों छिपाई गईं ये मूर्तियां?
राज्य पुरातत्व विभाग के सलाहकार प्रोफ़ेसर के. राजन ने इन मूर्तियों को चोल-काल के कांस्य-कला का शाहकार क़रार दिया। उनका क़यास है कि इन्हें जान-बूझकर ज़मीन में दफ़्न किया गया था ताकि किसी तारीख़ी उथल-पुथल के दौरान इन्हें नुक़सान या चोरी से बचाया जा सके। ये अनुमान उस वक़्त और पुख़्ता होता है जब हम नागपट्टिनम की रणनीतिक अहमियत को समझते हैं।
रिटायर्ट प्रोफ़ेसर वी. सेल्वकुमार, जो तमिल यूनिवर्सिटी में समुद्री इतिहास और समुद्री पुरातत्व पढ़ाते रहे हैं, बताते हैं कि चोल युग (9वीं से 13वीं सदी) में नागपट्टिनम एक ज़िंदादिल शहरी मरकज़ था। तिजारत, तामीर और नौसेना का गवाह। यहां ताजिर (व्यापारी) , दूत और भक्तों का हुजूम उमड़ता रहता था। ऐसे मालदार बंदरगाह पर हमलों का ख़तरा हमेशा मंडराता रहता था, इसलिए मुमकिन है कि हमले के दौरान धार्मिक प्रतीकों को महफ़ूज़ रखने के लिए ज़मीन में छिपाया गया हो।

आगे की तहक़ीक़ात
के. वसंतकुमार की अगुवाई में खुदाई दल अब ये पता लगाने में जुटा है कि इतनी अहम कांस्य मूर्तियां इस ख़ास मक़ाम पर क्यों छिपाई गईं। ज़्यादा तहक़ीक़ात के लिए मूर्तियों को चेन्नई भेज दिया गया है जहां उनका पेशेवर केमिकल ट्रीटमेंट होगा ताकि उनकी हालत महफ़ूज़ रहे, और उसके बाद बारीक धातु-विश्लेषण (Metallurgical Analysis) किया जाएगा जिससे पता चलेगा कि क़दीम कारीगरों ने किन मादों का इस्तेमाल किया था।

क्यों अहम है ये खोज?
चोल राजवंश अपनी बेमिसाल कांस्य ढलाई तकनीक के लिए दुनिया भर में मशहूर है। ये मूर्तियां न सिर्फ़ उस हुनर का जीता-जागता सबूत हैं बल्कि उस दौर की मज़हबी और सांस्कृतिक ज़िंदगी की भी झलक देती हैं। एक मीटर की गहराई से निकला यह खज़ाना बताता है कि इतिहास की कितनी कहानियां अभी भी ज़मीन के नीचे दबी हुई हैं, बस अपने मुसाफ़िर का इंतज़ार कर रही हैं।
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