“अभी सुमूम ने मानी कहां नसीम से हार,
अभी तो मअरका-हा-ए-चमन कुछ और भी हैं।”
मुईन अहसन जज़्बी का यह शेर उम्मीद, हौसले और लगातार जद्दोजहद करते रहने का पैग़ाम देता है। शायर कहते हैं कि अभी ज़हरीली हवाओं ने बहार की खुशबू से हार नहीं मानी है, यानी मुश्किलें अभी बाकी हैं और उनसे मुकाबला भी जारी है। यह शेर जज़्बी की शायरी के उस मिज़ाज को सामने लाता है, जिसमें दर्द के साथ उम्मीद और मायूसी के बीच भी आगे बढ़ने का हौसला दिखाई देता है।
उर्दू अदब में मुईन अहसन जज़्बी का नाम उन शायरों में लिया जाता है, जिन्होंने अपनी ग़ज़लों के ज़रिए इंसानी जज़्बात, ज़िंदगी की मुश्किलों और बदलते समाज की तस्वीर पेश की। वह प्रगतिशील(तरक़्क़ीपंसद) शायरी की उस रिवायत से जुड़े थे, जिसने साहित्य को समाज और इंसान के सवालों से जोड़ने की कोशिश की। हालांकि, जज़्बी की शायरी में विचारों को सीधे बयान करने के बजाय इशारों, अलामतों और गहरे एहसास के ज़रिए पेश करने का अंदाज़ मिलता है। यही वजह है कि उनके अशआर पढ़ने वाले को सोचने और उनके भीतर छिपे मानी तलाश करने के लिए मुत्तासिर करते हैं।
इल्म और अदब की दुनिया में जज़्बी का सफ़र
मुईन अहसन जज़्बी की पैदाइश 21 अगस्त 1912 को उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले के मुबारकपुर में हुयी थी। उन्होंने अपनी शुरुआती तालीम मुबारकपुर में हासिल की और वहीं से हाईस्कूल का इम्तिहान पास किया। इसके बाद उन्होंने आगरा के सेंट जॉन्स कॉलेज से 1931 में इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की। आगे चलकर उन्होंने एंग्लो-अरबी कॉलेज से बी.ए. किया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एम.ए. की पढ़ाई के दौरान अदबी दुनिया में अपनी पहचान मज़बूत की।
जज़्बी बचपन से ही शायरी का शौक़ रखते थे। बताया जाता है कि उन्होंने महज़ नौ साल की उम्र में शेर कहना शुरू कर दिया था। शुरुआत में उन्होंने हामिद शाहजहांपुरी से अपने कलाम की इस्लाह कराई। बाद में आगरा में मजाज़ लखनवी, फ़ानी बदायूंनी और मैकश अकबराबादी जैसे शायरों से मुलाक़ातों ने उनकी अदबी समझ को और निखारा।
लखनऊ में रहते हुए उनकी मुलाक़ात अली सरदार जाफ़री और सिब्ते हसन जैसे प्रगतिशील विचारकों से हुई। इन रिश्तों ने उन्हें साहित्य की नई सोच और सामाजिक बदलाव से जुड़े सवालों को समझने का मौक़ा दिया। धीरे-धीरे वह प्रगतिशील अदबी आंदोलन से जुड़ गए और अलीगढ़ में अपनी पढ़ाई के दौरान इस आंदोलन के सक्रिय सदस्यों में गिने जाने लगे।
एम.ए. के बाद जज़्बी ने कुछ समय तक मशहूर मासिक पत्रिका ‘आजकल’ में सहायक संपादक के रूप में काम किया। वर्ष 1945 में उनकी नियुक्ति अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लेक्चरर के तौर पर हुई। इसके बाद उन्होंने लंबे समय तक विश्वविद्यालय में अलग-अलग ज़िम्मेदारियां निभाईं और तालीम के साथ-साथ अदब की दुनिया में भी अपना योगदान जारी रखा।
दर्द और ज़िंदगी की हक़ीक़त को बयान करती शायरी
जज़्बी की शायरी का एक अहम पहलू इंसान की अधूरी ख़्वाहिशें और दिल की बेचैनी है। उनकी ग़ज़लों में ऐसा इंसान दिखाई देता है, जो ज़िंदगी भर सुकून की तलाश में भटकता रहता है, लेकिन उसे पूरी तरह हासिल नहीं कर पाता।
“मुख़्तसर ये है हमारी दास्तान-ए-ज़िंदगी,
इक सुकून-ए-दिल की ख़ातिर उम्र भर तड़पा किए।”
इस शेर में शायर ने ज़िंदगी की लंबी कहानी को कुछ लफ़्ज़ों में समेट दिया है। इंसान की तमाम कोशिशों के पीछे अक्सर एक ही ख़्वाहिश होती है दिल को सुकून मिल जाए। मगर कभी हालात, कभी रिश्ते और कभी अपनी ही उम्मीदें उसे बेचैन रखती हैं। जज़्बी ने इसी आम इंसानी अनुभव को इतनी सादगी से बयान किया है कि यह शेर हर दौर के पाठक को अपना-सा लगता है।
उनकी शायरी में खुशी और ग़म को भी ज़िंदगी के दो अलग-अलग किनारों की तरह नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए एहसासों की तरह देखा जा सकता है।
“यही ज़िंदगी मुसीबत यही ज़िंदगी मसर्रत,
यही ज़िंदगी हक़ीक़त यही ज़िंदगी फ़साना।”
यहां ‘मसर्रत’ का मतलब खुशी और ‘हक़ीक़त’ के मायने सच है। शायर के मुताबिक, ज़िंदगी कभी परेशानी बनकर सामने आती है, तो कभी खुशियों की वजह बनती है। इसमें सच भी है और ऐसे ख़्वाब भी, जिन्हें इंसान अपनी हक़ीक़त समझ बैठता है। यही ज़िंदगी का रंग है कि इसमें हर इंसान अपने हिस्से के सुख-दुख और उम्मीदों के साथ आगे बढ़ता है।
जज़्बी की ग़ज़लों में मोहब्बत का ज़िक्र भी एक अलग अंदाज़ में मिलता है। उनके यहां इश्क़ सिर्फ़ खुशी या मिलन का नाम नहीं, बल्कि यादों, अफ़सोस और कभी न भरने वाले ज़ख़्मों का एहसास भी है।
“जब मोहब्बत का नाम सुनता हूं,
हाए कितना मलाल होता है।”
इस छोटे-से शेर में एक लंबी कहानी छिपी हुई है। मोहब्बत का नाम सुनते ही शायर के दिल में कोई पुरानी याद जाग उठती है। वह याद, जो कभी खुशी का सबब रही होगी, अब मलाल और उदासी पैदा करती है। जज़्बी ने यहां किसी घटना का खुलासा नहीं किया, बल्कि एहसास को इस तरह बयान किया है कि पाठक अपने अनुभवों के मुताबिक इसका मतलब तलाश सकता है।
प्रगतिशील सोच और क्लासिकी अंदाज़ का मेल
मुईन अहसन जज़्बी की शायरी को समझने के लिए प्रगतिशील अदबी आंदोलन से उनके रिश्ते को जानना भी ज़रूरी है। इस आंदोलन ने साहित्य में आम इंसान की ज़िंदगी, सामाजिक गैर-बराबरी और बदलाव की ज़रूरत जैसे विषयों को अहमियत दी। जज़्बी भी इस विचारधारा से प्रभावित हुए, लेकिन उनकी शायरी केवल नारों या सीधे संदेशों तक सीमित नहीं रही।
उनकी तर्बियत क्लासिकी उर्दू शायरी की परंपरा में हुई थी। इसी वजह से उनके कलाम में लफ़्ज़ों का ठहराव, एहसास की गहराई और बयान की नफ़ासत दिखाई देती है। उन्होंने नए सामाजिक विचारों को ग़ज़ल के पारंपरिक अंदाज़ में ढालकर पेश किया। उनकी शायरी में इंक़लाबी सोच भी है और दिल की नर्म कैफ़ियत भी।
शायरी के साथ आलोचना में भी अहम योगदान
जज़्बी की पहचान सिर्फ़ एक शायर के तौर पर नहीं थी। उन्होंने उर्दू साहित्य की आलोचना के क्षेत्र में भी अहम काम किया। उनकी किताब ‘हाली का सियासी शुऊर’ को ख़ास अहमियत हासिल है। इस विषय पर उन्हें डॉक्टरेट की डिग्री मिली और उनकी यह किताब हाली के अध्ययन में एक संदर्भ ग्रंथ के रूप में स्वीकार की गई।
उनके प्रमुख काव्य संग्रहों में ‘फ़ुरोज़ां’, ‘सुख़न-ए-मुख़्तसर’ और ‘गुदाज़-ए-शब’ के नाम शामिल हैं। इन रचनाओं में उनकी शायरी का वह रंग दिखाई देता है, जिसमें निजी एहसास, सामाजिक चेतना और क्लासिकी अदबी रवायत एक साथ मिलते हैं।
मुईन अहसन जज़्बी का इंतेकाल 13 फ़रवरी 2005 को हुआ। वह अपने पीछे ऐसा अदबी सरमाया छोड़ गए, जिसमें इंसान के दुख, मोहब्बत की कसक, समाज को समझने की नज़र और उम्मीद की लौ एक साथ मौजूद हैं।
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