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Nawab Kapur Singh: सिख इतिहास के अज़ीम जरनल, महान रहनुमा और खालसा पंथ के बेमिसाल नेता

सिख तारीख़ की 18वीं सदी संघर्ष, कुर्बानी, मज़हब पर यक़ीन और बेमिसाल बहादुरी की गवाह है। साल 1716 में बाबा बंदा सिंह बहादुर और उनके साथियों की शहादत के बाद मुग़ल हुकूमत ने सिखों पर ज़ुल्म और बढ़ा दिए। सिखों को पकड़ने और मारने के लिए उनके सिरों पर इनाम रखे गए। ऐसे हालात में सिखों को अपने घर-बार छोड़कर जंगलों, पहाड़ों और दूर-दराज़ के इलाक़ों में पनाह लेनी पड़ी। उस मुश्किल दौर में खालसा पंथ को एक ऐसे रहनुमा की ज़रूरत थी, जो बिखरी हुई सिख ताक़त को एकजुट कर सके और उसे नई राह दिखा सके।

ऐसे वक़्त में नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) ने अपनी समझदारी, हिम्मत और शानदार क़यादत से अहम किरदार निभाया। उन्होंने सिख जत्थों को अच्छी तरह संगठित किया और बुड्ढा दल, तरुणा दल और दल खालसा को मज़बूत बनाने में अहम योगदान दिया। वो सिंहपुरिया मिसल के बड़े रहनुमा थे, जिसे फ़ैज़लपुरिया मिसल भी कहा जाता है। उनकी ज़िंदगी इस बात की मिसाल है कि मुश्किल हालात में भी ख़िदमत, समझदारी और इत्तेहाद के ज़रिए अपनी क़ौम की हिफ़ाज़त की जा सकती है।

माना जाता है कि नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) की पैदाइश 1697 में पश्चिमी पंजाब के शेखूपुरा ज़िले के कालो के गांव में हुई थी। ये इलाक़ा आज पाकिस्तान में है। उनके वालिद का नाम सरदार दिलीप सिंह था। वो विर्क गोत्र के जाट किसान थे और उनका परिवार खेती-बाड़ी से जुड़ा हुआ था। उनके भाई सरदार धन्ना सिंह का ज़िक्र भी तारीख़ी बयानों में मिलता है।

नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) का बचपन ऐसे दौर में गुज़रा, जब पंजाब के सियासी हालात लगातार बदल रहे थे। गुरु गोबिंद सिंह जी के ज्योति-जोत समाने और बाबा बंदा सिंह बहादुर की शहादत के बाद सिखों को अपने मज़हब और पहचान की हिफ़ाज़त के लिए बड़ी जद्दोजहद करनी पड़ी। इन हालात का कपूर सिंह जी की शख़्सियत पर गहरा असर पड़ा। उन्होंने गुरुओं की तालीम से प्रेरणा ली और ख़िदमत, क़ुर्बानी, हिम्मत और मज़हब पर पक्के यक़ीन को अपनी ज़िंदगी का उसूल बनाया।

अमृत की दात और खालसा पंथ में शामिल होना

साल 1721 के आसपास नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) ने भाई मनी सिंह जी के हाथों खंडे की पाहुल यानी अमृत छका और खालसा पंथ में शामिल हो गए। उस समय भाई मनी सिंह जी सिख धर्म और श्री दरबार साहिब, अमृतसर की सेवा से जुड़े एक अहम शख़्स थे। अमृत छकने के बाद कपूर सिंह जी ने अपनी ज़िंदगी गुरु-पंथ की ख़िदमत के लिए समर्पित कर दी। वो अपने परिवार और बिरादरी के दूसरे लोगों को भी गुरुओं की तालीम पर चलने के लिए प्रेरित करते थे।

इसके बाद वो दीवान दरबारा सिंह जी के जत्थे में शामिल हो गए। उस दौर में दीवान दरबारा सिंह जी सिख पंथ के बड़े रहनुमाओं में से एक थे। नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) ने अपनी मेहनत, ख़िदमत के जज़्बे और बहादुरी से सिख पंथ में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी शख़्सियत में एक तरफ़ जंग के मैदान में लड़ने का हौसला था, तो दूसरी तरफ़ संगत की ख़िदमत और गुरु की मर्यादा के लिए गहरी श्रद्धा भी थी।

नवाबी का ख़िताब

साल 1733 में लाहौर के मुग़ल गवर्नर ज़करिया ख़ान ने सिखों की बढ़ती ताक़त और उनकी गुरिल्ला कार्रवाइयों को देखते हुए समझौते की कोशिश की। उसने अपना पैग़ाम सरबत खालसा तक पहुंचाने के लिए सुबेग सिंह को बीच में रखा। इस पैग़ाम में सिखों को जागीर और नवाबी का ख़िताब देने की पेशकश की गई थी। इतिहास के मुताबिक, इस जागीर में दीपालपुर, कंगणवाल और झबाल के इलाके शामिल थे।

जब ये पेशकश सिख नेताओं के सामने रखी गई, तो कोई भी नवाबी का ख़िताब लेने के लिए तैयार नहीं हुआ। सिख खुद को गुरु की बख़्शिश से आज़ाद खालसा मानते थे। वो किसी शाही पद को अपनी असली पहचान से बड़ा नहीं समझते थे। इसलिए सरबत खालसा ने नवाबी के ख़िताब के लिए नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) का नाम चुना। उस समय नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) संगत में पंखा झलने की सेवा कर रहे थे।

उनकी सादगी, ख़िदमत के जज़्बे और काबिलियत को देखते हुए पंथ ने उन्हें नवाबी का ख़िताब देने का फ़ैसला किया। मशहूर तारीख़ी बयानों के मुताबिक, उन्होंने नवाबी के निशानों को पांच प्यारों के चरणों से छुआकर इसे क़बूल किया। इसके बाद उनके नाम के साथ ‘नवाब’ जुड़ गया।

ख़ास बात ये थी कि नवाबी मिलने के बाद भी उन्होंने खुद को पंथ का सेवक ही माना। उनके लिए किसी पद की असली इज़्ज़त लोगों पर हुक्म चलाने में नहीं, बल्कि संगत और गुरु-पंथ की ख़िदमत करने में थी। यही सादगी और विनम्रता उन्हें सिख इतिहास के महान नेताओं में एक ख़ास जगह देती है। इसी दौर में फ़ैज़लपुर से जुड़े इलाक़ों में उनका असर बढ़ने लगा। बाद में उनकी मिसल को सिंहपुरिया या फ़ैज़लपुरिया मिसल के नाम से जाना जाने लगा।

बुड्ढा दल और तरुणा दल की स्थापना

साल 1734 में दीवान दरबारा सिंह जी के इंतकाल के बाद सिख पंथ की क़यादत की बड़ी ज़िम्मेदारी नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) पर आ गई। उस समय खालसा पंथ में शामिल होने वाले सिखों की तादाद बढ़ रही थी। इसलिए फ़ौज का इंतज़ाम करने, गुरुद्वारों की सेवा और देखभाल करने और सिख संगत की हिफ़ाज़त के लिए एक मज़बूत संगठन की ज़रूरत थी।

नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) ने खालसा फ़ौज को दो बड़े हिस्सों में बांटने का इंतज़ाम किया। इनमें पहला था बुड्ढा दल और दूसरा था तरुणा दल। बुड्ढा दल में तजुर्बेकार और उम्रदराज़ सिख शामिल थे। उनकी ज़िम्मेदारी गुरुद्वारों की सेवा और देखभाल करना, धार्मिक रीति-रिवाज़ों की हिफ़ाज़त करना, अमृत छकाना और संगत को सही राह दिखाना था। जंग के मुश्किल हालात में भी ये दल सिखों की धार्मिक और सामाजिक ज़िंदगी को बनाए रखने में मदद करता था।

वहीं, तरुणा दल में नौजवान और जंग के लिए तैयार सिख शामिल थे। उनका मुख्य काम ज़ुल्म का मुकाबला करना, दुश्मन की फ़ौज के ख़िलाफ़ कार्रवाई करना और सिख संगत की हिफ़ाज़त करना था। तरुणा दल में सिखों की बढ़ती तादाद को देखते हुए इसे अलग-अलग जत्थों में बांट दिया गया। इन जत्थों की क़यादत बाबा दीप सिंह जी और दूसरे प्रमुख सिख नेताओं ने की।

अलग-अलग इलाक़ों और परिवारों से आने वाले सिखों को एक संगठन के साथ जोड़ना नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) की शानदार क़यादत की मिसाल थी। इस इंतज़ाम से सिख एक तरफ़ अपने धार्मिक काम जारी रख सके और दूसरी तरफ़ हुकूमत के ज़ुल्म का मुकाबला भी कर सके। आगे चलकर बुड्ढा दल और तरुणा दल की परंपरा ने सिख संगठनों को मज़बूत बनाने में अहम किरदार निभाया।

नादिर शाह का हमला और सिखों की रणनीति

1739 ईस्वी में ईरान के बादशाह नादिर शाह ने भारत पर हमला किया। उसने दिल्ली में जमकर लूटपाट की और बहुत से लोगों का कत्ल करवाया। वापस लौटते वक़्त वो बड़ी तादाद में दौलत और कैदियों को अपने साथ लेकर पंजाब के रास्ते ईरान जा रहा था। इस दौरान सिख जत्थों ने उसकी फौज पर अचानक हमले किए। नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) की अगुवाई में सिखों ने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई। वो अचानक दुश्मन की फौज पर हमला करते और फिर इलाके की जानकारी का फायदा उठाकर सुरक्षित जगहों पर चले जाते थे।

इस तरह सिखों ने नादिर शाह की फौज को लगातार चुनौती दी। उन्होंने लूटे गए माल को छुड़ाने की भी कोशिश की। सिख इतिहास में नादिर शाह की वापसी के दौरान कैदियों को आज़ाद करवाने की घटनाओं को ख़ास अहमियत दी जाती है। सिख जत्थों ने कैद में रखी गई औरतों को आज़ाद करवाने और उन्हें सुरक्षित उनके घर पहुंचाने की कोशिश की। ये काम सिखों की इंसानियत, औरतों की इज़्ज़त और बेसहारा लोगों की हिफाज़त करने की सोच को दिखाता है।

नादिर शाह से जुड़ा एक मशहूर किस्सा भी सिखों की बहादुरी को बयान करता है। इस किस्से के मुताबिक, जब नादिर शाह ने सिखों के रहन-सहन के बारे में पूछा, तो उसे बताया गया कि उनके घर उनके घोड़ों की काठियां हैं। यानी सिख हमेशा सफ़र और जंग के लिए तैयार रहते हैं। इस किस्से में ये भी कहा जाता है कि आने वाले वक़्त में सिख पंजाब की सियासत में एक बड़ी ताकत बनेंगे। हालांकि, इस बातचीत के बारे में ऐतिहासिक किताबों में अलग-अलग बातें मिलती हैं, लेकिन ये किस्सा आज भी सिखों की बहादुरी और आज़ादी के जज्बे की निशानी माना जाता है।

छोटा घल्लूघारा और खालसा की बुलंद हिम्मत

नादिर शाह के हमले के बाद भी पंजाब में सिखों पर ज़ुल्म जारी रहे। मुग़ल अफ़सरों ने सिखों की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए सख्त मुहिम चलाई। 1746 ईस्वी में काहनूवान के छंभ में सिखों को चारों तरफ़ से घेर लिया गया और बड़े पैमाने पर उनका कत्लेआम किया गया। सिख इतिहास में इस घटना को ‘छोटा घल्लूघारा’ के नाम से जाना जाता है। इस घटना में सिखों को जान-माल का बहुत नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन इतने ज़ुल्म सहने के बाद भी उनका हौसला नहीं टूटा।

अपने धर्म पर उनका भरोसा और आज़ादी के लिए लड़ने का जज़्बा कायम रहा। नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) ने सिख जत्थों को एकजुट रखने और इस मुश्किल दौर से बाहर निकलने के लिए उनका हौसला बढ़ाने में अहम किरदार निभाया। ये दौर सिखों के लिए सिर्फ़ जंग लड़ने का नहीं, बल्कि अपनी पहचान और संगठन को बचाए रखने का भी था। मुश्किल हालात में सिखों ने एक-दूसरे का साथ दिया, मिलकर फैसले लिए और गुरुओं की शिक्षाओं पर भरोसा रखा। यही एकता, आपसी सहयोग और मज़बूत हौसला उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।

दल खालसा की स्थापना और जस्सा सिंह आहलूवालिया की अगुवाई

18वीं सदी के मध्य तक सिखों के कई छोटे-बड़े जत्थे अलग-अलग इलाकों में काम कर रहे थे। इन जत्थों ने मुग़ल हुकूमत के खिलाफ़ लड़ाई में अहम किरदार निभाया। लेकिन बड़े हमलों का मुकाबला करने के लिए सभी जत्थों को एक साथ लाने और एक सांझी कमान की ज़रूरत महसूस हो रही थी। 29 मार्च 1748 ईस्वी को बैसाखी के मौक़े पर श्री अकाल तख्त साहिब में सरबत खालसा का एक अहम इकट्ठ हुआ।

इस मौक़े पर सिख जत्थों को बेहतर तरीके से संगठित करने और उनकी सांझी फौजी ताकत बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए गए। दल खालसा की मज़बूती और मिसलों के विकास ने सिखों को एक ताकतवर सियासी और फौजी शक्ति के रूप में उभरने में मदद दी।

नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) ने अपनी दूरअंदेशी का सबूत देते हुए सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया जैसे काबिल और बहादुर नेता को आगे लाने में अहम किरदार निभाया। उन्होंने अपने पद और निजी फायदे को सिख पंथ के हितों से ऊपर नहीं रखा। यही वजह है कि जस्सा सिंह आहलूवालिया ने बाद में सिखों के संघर्ष और मिसलों के इतिहास में ख़ास जगह बनाई।

नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) की अगुवाई में सिंघपुरिया मिसल ने भी अपना असर बढ़ाया। मिसलों की व्यवस्था ने सिख सरदारों को अलग-अलग इलाकों में अपना इंतज़ाम चलाने और बाहरी हमलों का मुकाबला करने के लिए एक मज़बूत बुनियाद दी। नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) सिर्फ़ एक बहादुर जरनैल ही नहीं थे, बल्कि धर्म में यकीन रखने वाले और सेवा-भावना से जुड़े गुरसिख भी थे। उन्होंने अमृत संचार और गुरमत के प्रचार को ख़ास अहमियत दी। उनकी प्रेरणा से अलग-अलग सामाजिक तबकों के लोग खालसा पंथ से जुड़े।

जात-पात और ऊंच-नीच के खिलाफ़ आवाज़

सिख गुरुओं की शिक्षाओं के मुताबिक, जात-पात और समाज में ऊंच-नीच का विरोध करना, संगत-पंगत की मर्यादा बनाए रखना और हर इंसान को बराबर इज़्ज़त देना बहुत ज़रूरी है। नवाब कपूर सिंह जी ने इन सिद्धांतों को अपनी ज़िंदगी और पंथ की सेवा में ख़ास जगह दी। पटियाला रियासत के संस्थापक बाबा आला सिंह जी के साथ भी नवाब कपूर सिंह जी के संबंधों का ज़िक्र सिख इतिहास में मिलता है। कुछ प्रचलित किस्सों के मुताबिक, बाबा आला सिंह जी ने नवाब कपूर सिंह जी से अमृत छका था। ये प्रसंग सिख सरदारों के बीच धार्मिक जुड़ाव और आपसी सहयोग की भावना को दिखाता है।

नवाब कपूर सिंह जी का अकाल चलाना

नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) ने अपनी पूरी ज़िंदगी गुरु-पंथ की सेवा, सिखों की हिफाजत और सिख जत्थों को मज़बूत बनाने के लिए समर्पित कर दी। लगातार जंगों और संघर्षों की वजह से उनके शरीर पर कई ज़ख्मों के निशान होने का ज़िक्र भी इतिहास में मिलता है। उनकी ज़िंदगी सादगी, बहादुरी और पंथ के प्रति समर्पण की मिसाल थी। आमतौर पर माना जाता है कि नवाब कपूर सिंह जी का अकाल चलाना 1753 ईस्वी में अमृतसर में हुआ था। कुछ ऐतिहासिक विवरणों में 7 अक्टूबर और कुछ में 9 अक्टूबर की तारीख़ दर्ज है। उनकी अपनी कोई औलाद नहीं थी। उनके बाद सिंघपुरिया मिसल की अगुवाई उनके भतीजे सरदार खुशहाल सिंह ने संभाली।

नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) की सबसे बड़ी देन सिख जत्थों को एकजुट करना और पूरे पंथ में सांझी अगुवाई की भावना को मज़बूत करना था। उनकी कोशिशों से सिखों को अपनी फौजी ताकत और धार्मिक पहचान बनाए रखने में मदद मिली। आगे चलकर सिख मिसलों के उभार और महाराजा रणजीत सिंह के अधीन सिख राज की स्थापना के लिए जो माहौल बना, उसमें इस संगठन की अहम भूमिका रही।

जत्थेदार नवाब कपूर सिंह जी (Nawab Kapur Singh) सिख इतिहास के उन महान नेताओं में से थे, जिन्होंने बेहद मुश्किल वक़्त में खालसा पंथ को एकजुट करने और उसकी चढ़दी कला बनाए रखने के लिए लगातार कोशिशें की। उनकी बहादुरी ने सिखों को ज़ुल्म का मुकाबला करने की प्रेरणा दी। उनकी समझदारी ने सिख जत्थों को मज़बूत बनाया और उनकी नम्रता ने ये दिखाया कि सेवा का दर्जा किसी भी पद से बड़ा होता है।

उनकी ज़िंदगी हमें सिखाती है कि किसी भी कौम की असली ताकत उसकी एकता, अनुशासन, धर्म में पक्का यकीन और सांझे मकसद में होती है। नवाब का खिताब मिलने के बावजूद उन्होंने हमेशा खुद को पंथ का सेवक समझा। उन्होंने योग्य नेताओं को आगे लाने में भी कभी संकोच नहीं किया। नवाब कपूर सिंह जी की शख्स़ियत और उनके काम सिख इतिहास में हमेशा लोगों को प्रेरणा देते रहेंगे।

लेख: सविंदर कौर

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