आंध्र प्रदेश के पल्नाडु ज़िले में बसा एक छोटा-सा गांव दुर्गी। ये वो जगह है जहां मंदिरों की घंटियां, भजनों की गूंज और शिल्पकारों के हथौड़ों की आवाज़ एक साथ गूंजती है। ये गांव अपने अंदर एक ऐसी कला को संजोए हुए है जो सदियों पुरानी है, दुर्गी स्टोन कार्विंग। ये सिर्फ़ पत्थर तराशने का काम नहीं, बल्कि एक ऐसा हुनर है जिसमें मोहब्बत, मेहनत और रूहानियत की खुशबू बसी है।

इतिहास के पन्नों से-नागार्जुन कोंडा की दास्तान
इस कला की जड़ें 15वीं सदी में जाकर मिलती हैं, जब नागार्जुन कोंडा नाम के एक फेमस बौद्ध तीर्थस्थल पर लगभग 300 शिल्पकारों का एक समूह आकर बसा। ये वो दौर था जब बुद्ध की मूर्तियां और स्तूप बनाए जा रहे थे। उस वक़्त कारीगरों ने महंगे ग्रेनाइट की जगह नरम चूने के पत्थर (सॉफ्ट लाइमस्टोन) को चुना, जिसे लोकल लैंग्वेज में ‘सुद्दा राय’ कहा जाता है। ये पत्थर सिर्फ़ इसी इलाक़े में मिलता है और इसका रंग सफ़ेदी-मायल धूसर है। नरम होने की वजह से इसे तराशना आसान था और डिज़ाइनों की बारीकियां भी बख़ूबी उभरती थीं।
नागार्जुन कोंडा का नाम महायान बौद्ध धर्म के महान आचार्य नागार्जुन के नाम पर पड़ा, जो दूसरी सदी में हुए थे। कहा जाता है कि इस इलाक़े में बौद्ध धर्म की गतिविधियों के पीछे उन्हीं का हाथ था। यहां बनी बुद्ध की खड़ी मूर्तियां आज भी इस बात की गवाह हैं कि ये कला शुरू में बौद्ध परंपरा से गहराई से जुड़ी थी।

विस्थापन की कहानी और दुर्गी का जन्म
लेकिन वक़्त ने करवट ली। नागार्जुन सागर बांध के निर्माण और सिंचाई परियोजना की वजह से इन शिल्पकारों को अपना घर छोड़ना पड़ा। वो बिखर गए और आकर बस गए दुर्गी नाम के एक छोटे से गांव में, जो देवी दुर्गा का मंदिर होने की वजह से इस नाम से जाना जाता है। 1962 में यहां नागार्जुन स्टोन कार्विंग इंडस्ट्रियल कोऑपरेटिव सोसाइटी रजिस्टर्ड हुई और यही इस कला का मरकज़ बन गई। धीरे-धीरे दुर्गी में वेंकुगोपाल स्वामी और विरभद्र स्वामी जैसे मशहूर मंदिर बनाए गए। इस तरह एक विस्थापित समुदाय ने अपनी कला से एक नई जगह को पहचान दिला दी।

शिल्प शास्त्र और बारीक हुनर
दुर्गी की मूर्तियां शिल्प शास्त्र के नियमों के मुताबिक तराशी जाती हैं। आकार आधे फुट से लेकर 10 फुट तक के होते हैं। कारीगर आज भी पुराने औज़ार इस्तेमाल करते हैं। मेटना (मापने का पैमाना), कैवरम (गोलाई नापने का यंत्र), अकुराइस (रेती), सुट्टी (हथौड़ा) और नैत्रम (विभिन्न छेनियां)। लास्ट में इमरी पेपर से रगड़कर पत्थर को चमकाया जाता है। कुछ मूर्तियों को रंगों से सजाया भी जाता है।

वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट
आज दुर्गी स्टोन कार्विंग ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ पहल के तहत पहचानी जाती है। यहां के उत्पादों में भगवान कृष्ण और गणेश की मूर्तियां, तुलसी के गमले, उर्ली (कटोरे), फूलदान, बगीचे की मूर्तियां, पानी के फ़व्वारे, नाचती हुई मूर्तियां, लैंप शेड, ज्वैलरी बॉक्स, पेपर वेट और गिफ़्ट आइटम शामिल हैं। माचेरला से सिर्फ़ 10 किलोमीटर दूर बसा ये गांव एक ज़िंदा स्कूल है, जहां पीढ़ी-दर-पीढ़ी ये हुनर सिखाया जाता है।

एक सफ़र, जो दिल को छू जाए
दुर्गी आना सिर्फ़ एक गांव देखना नहीं, बल्कि आंध्र की कलात्मक विरासत से रूबरू होना है। यहां के पत्थरों में मिथक, इतिहास और रूहानियत इस तरह उतरी है कि हर मूर्ति एक जीती-जागती कहानी लगती है। ये कला सिर्फ़ अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि आने वाली नस्लों के लिए एक अनमोल तोहफ़ा है।
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