उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान की सबसे ख़ास क़व्वालियों में सबसे ख़ास क्षण वह होता है जब एक लम्बी तान में अपनी पुरपेच कला का जादू दिखाने के बाद वे मिनट-आधा मिनट को तबले के साथ अकेले रू-ब-रू होते हैं। कभी एक ताल खाली छोड़ते हैं कभी दो या तीन। उस खाली स्पेस को भरने के लिए संगतकारों की लयबद्ध तालियां होती हैं या सिर्फ तबला। तबले की वह खट्ट-खटक देर तक निर्वात में गूंजती है।
तमाम मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उस्ताद की गई क़व्वालियों के असंख्य ऑडियो-वीडियो उपलब्ध हैं। अलबत्ता उनकी संगत करने वाले कलाकारों के बारे में बहुत पुख्ता जानकारी खोजना बड़ा मुश्किल और जटिल काम है। अलग-अलग आयुवर्ग से ताल्लुक रखने वाले उस्ताद नुसरत के सहगायकों-संगतकारों के बारे में अधिक लिखा नहीं गया है। हाँ नुसरत के सगे छोटे भाई मरहूम फारूख फ़तेह अली खान और फारुख के बेटे राहत जरूर पहचान में आते हैं। अधिकतर लोग बाकी लोगों के नाम तक नहीं जानते। उम्र भर एक बहुत बड़े गायक की छाया में रह गए इन सहगायकों को जहाँ-जहां मौका मिला, उन्होंने अपने उस्ताद की गायकी में बट्टा नहीं लगने दिया। बल्कि बाज दफा तो वे नुसरत से बस उन्नीस रह जाते हैं।
नुसरत की क़व्वालियों के वीडियो देखते हुए एक पावर-इक्वेशन भी समझ में आती है जिसके भीतर तान खेंच रहे नौउम्र गवैये की तरफ बड़ी उम्र वाले सहगायक की आँख का उठना भर तक दर्ज हो जाता है। मुझे यह तसव्वुर करने में भी मजा आता है कि ये सहगायक अपने घरों में कैसे रहते होंगे, इनके दोस्त कौन लोग होंगे और एक शाम की संगत के इन्हें कितने पैसे मिलते होंगे।

नुसरत की तमाम कंसर्ट्स के वीडियो देख लीजिये आपको तबलची नजर आएगा ही नहीं। तमाम माइक्स वगैरह के पीछे सबसे पिछली कतार में कहीं उसे बैठने की जगह मुहैय्या कराई गयी होती है। सोचना दिलचस्प है कि इस न दिखाई देने वाले साधक के बगैर नुसरत का समूचा तिलिस्म कैसे मुकम्मल होता। फिलहाल ऐसा पिछले कुछ बरसों में हुआ है कि उस्ताद नुसरत के साथ तीस सालों तक जुगलबंदी करने वाले तबलानवाज उस्ताद दिलदार हुसैन साहब का नाम स्वतंत्र रूप से कुछ जगहों पर दिखाई देने लगा है।
पंजाब के कसूर इलाके से ताल्लुक रखने वाले दिलदार हुसैन ने उस्ताद अल्लारक्खा से शुरुआती सबक सीखे और कुल 12 साल की उम्र में भारत में अपनी पहली परफॉर्मेंस दी। दो साल बाद यानी 1971 में वे नुसरत साहब के ग्रुप से जुड़ गए। यह जुड़ाव 14 अगस्त 1997 को नुसरत की असमय मृत्यु तक चला। अमेरिका से आई जेसिका रिपर नाम की एक संगीतकार महिला ने साल 2001 के आसपास उस्ताद दिलदार हुसैन से इल्तजा की कि वे उसे तबला सिखाएं। जेसिका को हाल ही में कहीं से नुसरत फ़तेह अली खान की कव्वालियों का एक संग्रह हाथ लगा था जिसने उनके संगीत की दिशा ही बदल दी थी।
उस्ताद ने न सिर्फ जेसिका को तबला बजाना सिखाया, उसे अपने घर में रहने की जगह भी दी। उस समय को याद करते हुए जेसिका ने लिखा है, “ख़ान साहब के घर में रियाज़ के वे दिन आज भी यादआते हैं। वहाँ की दीवारों तक में उस्ताद की क़व्वाली और उनकी संगीत-साधना की ख़ुशबू सी हुई थी। लगता था, जैसे दीवारें भी मेरी आवाज़ सुनती हों। मैं अपने कमरे में बैठा उस्ताद की दी हुई तालीम को समझने और आत्मसात करने की कोशिश में इतना डूब जाता कि भूख-प्यास तक का होश नहीं रहता। तभी घर की महिलाएँ दबे पाँव कमरे में आतीं और चाय या कुछ खाने को देकर मुझे फिर रियाज़ में जुटे रहने का हौसला देतीं।”
जेसिका ने सूफी संगीत में अपने जीवन को डुबो दिया और इस्लाम धर्म स्वीकार कर अपना नाम अमीना चिश्ती रख लिया। दुनिया भर में नाम कमा चुकीं जेसिका उर्फ़ अमीना आज अपने एक कव्वाली-ग्रुप के साथ कंसर्ट्स में व्यस्त रहती हैं। जेसिका अपने उस्ताद को अपने साथ अमेरिका भी लेकर गईं। उनके दोनों बेटे अबरार और इसरार भी तबला बजाते हैं। कुछ समय पहले उन्होंने अबरार के साथ मिल कल क़व्वाली का एक अल्बम जारी किया था जिसका नाम है ‘सुर संगीत’.यह अल्बम बताता है कि खलीफा तबलची होने के साथ-साथ उस्ताद दिलदार हुसैन सिद्धहस्त शास्त्रीय गायक भी हैं।
26 मई, 2015 को कनागा सिस्टम क्रश रिकॉर्ड्स से रिलीज हुए इस अल्बम के ज़रिए उस्ताद दिलदार हुसैन ने इक्कीसवीं सदी की क़व्वाली को एक नया रूप दिया। इसमें परंपरा के प्रतिगहरी श्रद्धा तो है ही, साथ ही लय और बीट पर केंद्रित एक ताज़ा अंदाज़ भी है, जोअपनी सूफी-पंजाबी जड़ों से आगे की ओर छलाँग लगाता नज़र आता है। दिलदार कहते हैं, “संगीत को दिल और रूह को ऊँचा उठाना चाहिए। यही क़व्वाली का सार है. यह स्तुति है, महिमामंडन है। लेकिन ऐसा करने के लिए संगीत का संवाद करना ज़रूरी है, उसे लोगों तक पहुँचना चाहिए।”
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