गुजरात की खाड़ी के किनारे बसा खंभात (कैंबे) एक ऐसा शहर, जो सदियों से ताजिरों, सौदागरों और हुनरमंदों का ठिकाना रहा है। 15वीं सदी में जब दुनिया के बाज़ारों से व्यापारी यहां आए, तो उन्होंने पाया कि इस शहर की ज़मीन के सीने में छिपा है एक अनमोल ख़ज़ाना। अक़ीक़ के पत्थर,जिन्हें अंग्रेज़ी में Agate कहते हैं। ये सेमी-प्रेशियस पत्थर, जो असल में माइक्रोक्रिस्टलाइन क्वार्ट्ज़ हैं, अपने रंगों और नक़्शों से हर दिल को मोह लेते हैं।
ज़मीन के सीने से निकला जादू
कैंबे के अक़ीक़ की कहानी लाखों साल पुरानी है। ये पत्थर ज्वालामुखीय चट्टानों की गुफ़ाओं में पाए जाते हैं और अपने अनोखे रंगों-नक़्शों के लिए दुनिया भर में मशहूर हैं। नीले और गुलाबी के नाज़ुक भंवरों से लेकर गहरे लाल, नारंगी और भूरे रंगों तक। हर पत्थर अपने बैंड्स और तहों में वक़्त की एक कहानी समेटे हुए है। ये सिर्फ़ पत्थर नहीं, ज़मीन की सदियों पुरानी डायरी के पन्ने हैं।

तारीख़ का सफ़र
अक़ीक़ की तिजारत 15वीं-16वीं सदी में गुजरात के सुल्तानों के दौर में अपने उरूज पर पहुंची। कैंबे के बाज़ारों में मिडल ईस्ट, अफ़्रीका और यूरोप के सौदागर उमड़ पड़ते थे। 17वीं सदी में एक अबिसीनियाई ताजिर बाबा ग़ोर ने राजपीपला के पास लिमोदरा में अक़ीक़ की फैक्ट्री लगाई। यहां तक कि एक वक़्त ऐसा आया जब अक़ीक़ की अंगूठियां सोने से दोगुने वज़न के दाम पर बिकती थीं।
रंगों में बसी आस्था
आज भी खाड़ी देशों और अफ़्रीका में कैंबे की अक़ीक़ की ज़बरदस्त मांग है। कार्नेलियन (गहरा नारंगी/सिंदूरी) सबसे मुक़द्दस माना जाता है। इसे पांच तत्वों (मिट्टी, हवा, पानी, आग, आकाश) का प्रतीक कहा जाता है और धार्मिक-ज्योतिषीय मान्यताओं के लिए पहना जाता है। दूसरी क़िस्मों में कैमल (भूरा), ब्लड (गहरा लाल), लोई, व्हाइट किंग, ख़यालदार (स्लेटी), पीला, नवरंग, रेड जैस्पर, फैंसी, ब्लैक, स्फटिक और रोज़ क्वार्ट्ज़ शामिल हैं।

पत्थर से जवाहरात तक
इन पत्थरों को पहले धूप में तपाकर आग पर पकाया जाता है ताकि नमी निकल जाए। फिर शिंगाड़ी (भैंसे के सींग का हथौड़ा) से तराशा जाता है। चपटा, गोल, त्रिकोणीय, षट्कोणीय। इसके बाद कुरुंद (Emery) पहिये से घिसाई होती है। तैयार होते हैं हार, चूड़ियां, कानों की बालियां, कंगन, अंगूठियां, कफ़लिंक, तस्बीह, लॉकेट, की-चेन, फूलदान और ऐश-ट्रे यानी बेशुमार चीज़ें।

कहां देखें?
खंभात के समुद्र किनारे पत्थरों की तलाश में निकलें, खंभात अक़ीक़ मार्केट से ख़रीदारी करें, और अक़ीक़ म्यूज़ियम में जाकर इनकी बनावट और अहमियत को समझें। ये शहर आपको वो तजुर्बा देता है, जो ज़िंदगी भर याद रहता है।
कैंबे की अक़ीक़ न सिर्फ़ ज़मीन का करिश्मा, बल्कि गुजरात की रूह है। इसकी चमक में इतिहास की रोशनी है, और इसके रंगों में क़ुदरत की मेहरबानी।
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