मुंबई की सड़कों पर 35 रुपये महीने के लिए फिल्मों के पोस्टर पेंट करने वाला एक 13 साल का लड़का, जो रोज़ 8 किलोमीटर पैदल चलकर काम पर जाता था और बदले में सिर्फ एक वक्त का खाना पाता था। वही लड़का आगे चलकर भारतीय सिनेमा की वो आवाज़ बना, जिसके एक डायलॉग पर सिनेमाघर तालियों से गूंज उठते थे। नाना पाटेकर सिर्फ अभिनेता नहीं थे वो एक तूफ़ान थे, जो पर्दे पर आते ही सब कुछ अपने साथ बहा ले जाता था।

संघर्ष की आग में तपा लोहा
नाना पाटेकर की पैदाइश 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुद-जंजीरा में हुई थी। जब वे महज़ 13 साल के थे,तब पिता का बिजनेस पूरी तरह डूब गया और परिवार गरीबी के भयानक दौर में चला गया। टीनेज में ही उन्होंने मुंबई में फिल्मों के पोस्टर पेंट करने का काम शुरू किया, जिसके लिए उन्हें 35 रुपये महीना और दिन में सिर्फ एक वक्त का भोजन मिलता था। इसी संघर्ष ने उन्हें वक्त से पहले मज़बूत बना दिया। बाद में उन्होंने सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से एप्लाइड आर्ट में डिप्लोमा किया और थिएटर की दुनिया में कदम रखा, जहां उनके अभिनय का हुनर निखर कर सामने आया।

जब पर्दे पर आया ‘अन्ना’ का तूफ़ान
1978 में फिल्म ‘गमन’ से बॉलीवुड में कदम रखने वाले नाना को 1989 की ‘परिंदा’ ने रातों-रात स्टार बना दिया। इसमें उनके खतरनाक गैंगस्टर ‘अन्ना’ के किरदार ने उन्हें पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलाया। इसके बाद ‘क्रांतिवीर’ में प्रताप नारायण तिलक के किरदार के लिए उन्हें बेस्ट एक्टर का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और ‘अग्नि साक्षी’ के लिए तीसरा राष्ट्रीय पुरस्कार। ‘तिरंगा’ के इंस्पेक्टर वागले से लेकर ‘वेलकम’ के उदय शेट्टी तक, उन्होंने हर स्टाइल में महारत साबित की।

वो डायलॉग्स, जो अमर हो गए
नाना की असली ताकत उनके डायलॉग डिलीवरी में थी। ‘यशवंत’ का वो डायलॉग ‘एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है’ आज भी लोगों की जुबां पर है। ‘क्रांतिवीर’ का ‘आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने’ तो जैसे सिनेमा का सबसे तीख़ा तमाचा था, जो दर्शकों की उदासीनता पर पड़ता था। ‘तिरंगा’ में उन्होंने कहा ‘अपना तो उसूल है… पहले लात, फिर बात, उसके बाद मुलाकात’ और ‘गुलाम-ए-मुस्तफा’ में ‘बेहतर है तू अपना इरादा बदल दे,नहीं तो मैं तेरा नक्शा बदल दूंगा’।’वेलकम’ में उन्होंने कॉमेडी में भी रौब बनाए रखा ‘कंट्रोल उदय, कंट्रोल!’।

सेना से अटूट रिश्ता, सामाजिक जीवन में बेबाकी
नाना का सेना से लगाव सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं था। 1991 में उन्होंने बतौर निर्देशक ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ बनाई, जिसके लिए खुद मिलिट्री ट्रेनिंग ली । 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान वे खुद सीमा पर पहुंचे और जवानों के साथ वक्त बिताया। सामाजिक मोर्चे पर उन्होंने 2015 में ‘नाम फाउंडेशन’ की स्थापना की, जो महाराष्ट्र में किसान कल्याण और जल संरक्षण पर काम करता है। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी 1.5 करोड़ रुपये की लग्जरी कार का सपना छोड़कर वो पैसा किसानों के लिए लगा दिया।

फैमिली लाइफ: पर्दे के पीछे का दर्द
नाना ने 1978 में एक्ट्रेस नीलकंठी से शादी की। शुरुआती दिनों में नीलकंठी बैंक में अफसर थीं और नाना से ज्यादा कमाती थीं। नाना ने खुद कहा था “मैं सिर्फ इसलिए एक्टिंग कर पाया क्योंकि उसने मुझे सहारा दिया’। लेकिन किस्मत ने उन्हें सबसे बड़ा दर्द दिया, उनके बड़े बेटे दुर्वासा का सवा दो साल की उम्र में निधन हो गया। बेटे की मौत के बाद नाना दिन में 60 सिगरेट पीने लगे थे। छोटे बेटे मल्हार फिल्ममेकिंग से जुड़े हैं। नाना और नीलकंठी कई सालों से अलग रह रहे थे,लेकिन कभी तलाक नहीं हुआ।
अपनी रौबदार आवाज़, दमदार संवाद अदायगी और बेबाक तेवरों से नाना पाटेकर ने भारतीय सिनेमा पर अमिट छाप छोड़ी। वे अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ गए हैं, जिसे आने वाली पीढ़ियां शायद ही भुला पाएं। जैसे उन्होंने ‘क्रांतिवीर’ में कहा था ‘ऊपर वाले ने हाथ फैलाने के लिए और मुंह गिड़गिड़ाने के लिए नहीं दिया है, दांत सिर्फ खाने चबाने के लिए नहीं हैं, बल्कि काटने के लिए भी हैं’।
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