मिर्ज़ा मुहम्मद हादी, जो अदब में रुस्वा तख़ल्लुस से मशहूर हुए, उर्दू के उन अदीबों में हैं जिनका नाम एक ही नॉवेल ने अमर कर दिया। वह नॉवेल है “उमराव जान अदा”।
रुस्वा 1858 में लखनऊ में पैदा हुए। उनके बुज़ुर्ग मुग़ल दौर में हिंदुस्तान आए थे और उनके परदादा अवध में बस गए। शुरुआती तालीम उन्हें वालिद ने दी, ख़ासकर गणित का सबक़ उन्हीं से लिया। जब रुस्वा 16 साल के थे, तो वालिद का इंतिक़ाल हो गया। उसके बाद ख़ानदानी जायदाद से गुज़र-बसर होने लगी। पढ़ने का शौक़ बहुत था, इसलिए वे बराबर इल्म हासिल करने में लगे रहे। उन्होंने फ़ारसी, अरबी और दूसरे मज़ामीन में महारत हासिल की।
रोज़गार का सफ़र
रुस्वा ने कुछ वक़्त सहाफ़त (पत्रकारिता) की और दूसरी नौकरियां भी कीं, मगर किसी काम में दिल नहीं लगा। एक ज़माने में वे रसायनशास्त्र (केमिस्ट्री) के पीछे लग गए, पर उससे कोई फ़ायदा नहीं हुआ। फिर वे लखनऊ के एक स्कूल में उस्ताद बने और प्राइवेट तौर पर कई इम्तिहान भी पास किए। 1888 में क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ाने लगे। 1901 में हैदराबाद गए, लेकिन वहां सेहत ठीक न रही और वे लखनऊ लौट आए। 1919 में दोबारा हैदराबाद गए और दारुल-तर्जुमा से जुड़कर कई किताबों के अनुवाद किए। उन्होंने फ़लसफ़े (दर्शनशास्त्र) के तुलनात्मक अध्ययन पर भी एक किताब लिखी।
बहुमुखी शख़्सियत
रुस्वा अपने वक़्त के बहुत ज़हीन इंसान थे। फ़लसफ़ा, मन्तिक़ (तर्कशास्त्र), हिसाब, तिब (चिकित्सा), मज़हबी उलूम, केमिस्ट्री, संगीत और फ़लकियात (खगोल विज्ञान) तक उनकी पहुंच थी, और शायरी में भी उनकी दिलचस्पी थी। कहा जाता है कि उन्होंने शॉर्टहैंड और टाइप का बोर्ड भी तैयार किया था।
कम वक़्त में उन्होंने पांच नॉवेल लिखे:
- इफ़शा-ए-राज़ (1896)
- उमराव जान अदा (1899)
- ज़ात शरीफ़ (1900)
- शरीफ़ ज़ादा (1900)
- अख़्तरी बेगम (1924)
इनमें “उमराव जान अदा” सबसे ज़्यादा मशहूर है, और रुस्वा की शोहरत और अज़मत इसी पर टिकी है। “शरीफ़ ज़ादा” को उनकी अपनी आपबीती भी कहा जाता है, हालांकि उनकी पूरी ज़िंदगी उसमें नहीं है।
रुस्वा का नॉवेल के बारे में नज़रिया
रुस्वा चाहते थे कि नॉवेल अपने दौर की सच्ची तस्वीर पेश करे। किरदार सिर्फ़ बढ़ा-चढ़ाकर न दिखाए जाएं, उनमें हक़ीक़त हो, कहानी फ़न के तक़ाज़े पूरे करे और ज़बान किरदार के मुताबिक़ हो। “उमराव जान अदा” में वे कहते हैं कि लखनऊ में रहकर अहल-ए-ज़बान की असली बोल-चाल की ख़ूबी समझ आई, और तब बनावटी ज़बान और बेतुके क़िस्से दिल से उतर गए।
“उमराव जान अदा” की ख़ूबी
कुछ लोग इसे सिर्फ़ एक तवायफ़ की कहानी समझते हैं, मगर यह बहुत छोटा नज़रिया है। तवायफ़ की कहानी के पीछे रुस्वा ने अपने दौर के लखनऊ की पूरी तस्वीर खींची है। यह नॉवेल लखनऊ की ढलती हुई तहज़ीब की एक तस्वीर-गाह (चित्रशाला) है।
ख़्वाजा मुहम्मद ज़करिया के मुताबिक़ नॉवेल की शुरुआत अवध की एक ग़रीब बस्ती से होती है, फिर नवाबों की तहज़ीब सामने आती है। उमराव जान के भागने के बाद उस ज़माने के असुरक्षित रास्ते, चोर-डाकुओं की वारदातें, सियासी लापरवाही और फ़ौजों की बुज़दिली की तरफ़ साफ़ इशारे मिलते हैं। आख़िर में मध्यम तबक़े के घरों का नक़्शा सामने आता है। यानी अवध के ग़रीब, मध्यम और अमीर, सब तबक़ों की ज़िंदगी इसमें दिखती है।
किरदारनिगारी, नफ़सियाती गहराई और समाज की अक्कासी की वजह से इसे उर्दू के सबसे अहम नॉवेलों में गिना जाता है। “शरीफ़ ज़ादा” और “ज़ात शरीफ़” में वह असर नहीं है जो “उमराव जान अदा” में है।
रुस्वा अपने ज़माने के एक अज़ीम ज़हन (Genius) थे। उर्दू तारीख़ में उनकी जगह महफ़ूज़ है, और “उमराव जान अदा” आज भी उर्दू अदब की पहचान बना हुआ है।
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