उन्नीसवीं सदी के लखनऊ की तहज़ीब और अदब की बात हो, तो आगा हसन अमानत का नाम बड़े अदब से लिया जाता है। इनकी पैदाइश सन् 1815 में हुयी और वफ़ात 1858 में हुई। इनका असली नाम आगा हसन अली था, “अमानत” इनका तख़ल्लुस (शायराना नाम) था, इसीलिए इन्हें अमानत लखनवी या मिर्ज़ा अमानत के नाम से भी जाना जाता है।
ख़ानदानी पसमंज़र
अमानत का ख़ानदान असल में ईरान से ताल्लुक़ रखता था। इनके पुरखे ईरान से हिजरत करके 1815 के आसपास लखनऊ आ बसे। इनके वालिद का नाम सैयद अली मशहदी था। अमानत के दो बेटे हुए – सैयद आगा हसन फ़साहत और सैयद आगा हसन लताफ़त। लखनऊ उस दौर में इल्म, अदब और तहज़ीब का गढ़ था, और अमानत का ख़ानदान वहीं की मिट्टी में रच-बस गया।
नवाब वाजिद अली शाह का दरबार
अमानत को अवध के आख़िरी ताजदार नवाब वाजिद अली शाह के दरबार से गहरा नाता था। वाजिद अली शाह ख़ुद भी शेरो-शायरी और फ़नून-ए-लतीफ़ा (ललित कलाओं) के बड़े क़द्रदान थे, और उनके दरबार में शायरों, मौसीक़ारों और अदीबों की बड़ी क़दर होती थी। इसी माहौल ने अमानत की तख़लीक़ी सलाहियतों को परवान चढ़ाया।
कमसिनी से शायरी और बीमारी का दौर
अमानत ने बहुत कम उम्र से शेर कहना शुरू कर दिया था, मगर इन्हें असल शोहरत ड्रामा-निगारी यानी नाटक लेखन से मिली। 20 साल की उम्र में इन पर एक अजीब मुसीबत आई। इनकी आवाज़ चली गई, यानी ये गूंगे हो गए। बाद में कुछ हद तक आवाज़ वापस आई, मगर यह दौर इनकी ज़िंदगी का बड़ा कठिन मोड़ था। इसके बावजूद इन्होंने हार नहीं मानी और फ़ारसी-उर्दू में सैकड़ों ग़ज़लें और मर्सिए लिखे।
अमानत का सबसे बड़ा कारनामा है “इन्दर सभा” – जिसे उर्दू ज़बान का पहला स्टेज ड्रामा माना जाता है। यह नाटक 1853 में लिखा गया और इसमें परियों, इन्द्र देवता के दरबार और रूमानी क़िस्से का ख़ूबसूरत मेल है। इस ड्रामे में गीत, शेर और मुकालमे (डायलॉग) इस ख़ूबी से पिरोए गए कि यह सिर्फ़ अदब तक महदूद नहीं रहा, बल्कि बरसों तक स्टेज पर खेला जाता रहा और पारसी थिएटर व शुरुआती हिंदुस्तानी फ़िल्मों पर भी इसका गहरा असर पड़ा। माना जाता है कि उर्दू में “गीत” की रिवायत की शुरुआत भी अमानत ने ही की।
शायरी का रंग
अमानत की शायरी में इश्क़, हुस्न, दर्द-ए-दिल और तसव्वुफ़ाना (सूफ़ियाना) रंग एक साथ नज़र आता है। इनके अशआर में जहां मासूम मोहब्बत की शोख़ी है।
“बोसा आंखों का जो मांगा तो वो हंस कर बोले
देख लो दूर से खाने के ये बादाम नहीं”
वहीं दूसरी तरफ़ दर्द और जुदाई का गहरा एहसास भी मिलता है।
“किस क़दर दिल से फ़रामोश किया आशिक़ को
न कभी आप को भूले से भी मैं याद आया”
आगा हसन अमानत सिर्फ़ एक शायर नहीं, बल्कि उर्दू ड्रामा-निगारी के बानी (संस्थापक) माने जाते हैं। “इन्दर सभा” ने उर्दू अदब में जो रास्ता खोला, उस पर चलकर आगे कई ड्रामा-निगारों और फ़िल्मी गीतकारों ने अपनी राह बनाई। 1858 में इनका इंतक़ाल हुआ, मगर इनकी शायरी और “इन्दर सभा” आज भी उर्दू अदब के ख़ज़ाने का हिस्सा हैं।
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