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‘Baazi’: 1951 की वो फ़िल्म, जिसने हिंदी सिनेमा में Film Noir का नया अंदाज़ पेश किया

1951 में आई एक ऐसी फ़िल्म, जिसने सिर्फ़ देव आनंद के करियर को नई रफ़्तार नहीं दी, बल्कि हिन्दी सिनेमा में कहानी कहने का एक नया अंदाज़ भी पेश किया। नाम था Baazi (बाज़ी)। फ़िल्म के हीरो थे देव आनंद और डायरेक्टर थे गुरु दत्त। दिलचस्प बात ये है कि Baazi (बाज़ी) गुरु दत्त की बतौर डायरेक्टर पहली फ़िल्म थी।

देव आनंद खुद मानते थे कि Baazi (बाज़ी) उनके करियर का एक बड़ा मोड़ थी। फ़िल्म की कहानी एक ऐसे बेरोज़गार नौजवान की है, जो हालात के चलते जुर्म की दुनिया में कदम रखने पर मजबूर हो जाता है। यहां से शुरू होती है एक ऐसी कहानी, जिसमें प्यार, जुर्म, धोखा, लालच और मुश्किल हालात एक-दूसरे से जुड़ते चले जाते हैं।

शानदार टीम ने बनाई ‘बाज़ी’ को ख़ास

Baazi (बाज़ी) की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ़ इसकी कहानी नहीं थी। इसके पीछे उस दौर की कई बेहतरीन प्रतिभाएं एक साथ काम कर रही थी। फ़िल्म में देव आनंद लीड रोल में थे। कहानी और स्क्रीनप्ले से जुड़े थे बलराज साहनी, फ़िल्म के संगीत की ज़िम्मेदारी एस.डी. बर्मन ने संभाली, जबकि गीत लिखे साहिर लुधियानवी ने। फ़िल्म की कोरियोग्राफी ज़ोहरा सहगल ने की थी।

वहीं गुरु दत्त पहली बार डायरेक्टर की कुर्सी पर थे। यानी Baazi (बाज़ी) के पीछे एक ऐसी टीम थी, जिसमें सिनेमा के अलग-अलग हुनर एक साथ दिखाई दे रहे थे। फ़िल्म की कहानी में शहर की रातें, बार, जुर्म की दुनिया और वहां रहने वाले अलग-अलग किरदार अहम थे। मुंबई यहां सिर्फ़ एक जगह नहीं थी, बल्कि कहानी का एक ज़रूरी हिस्सा बनकर सामने आती है।

Source: IMDb 

हिंदी सिनेमा में आया Film Noir का अंदाज़

1951 में आई Baazi (बाज़ी) को भारत की शुरुआती crime noir फ़िल्मों में गिना जाता है। फ़िल्म की कामयाबी ने आगे चलकर 1950 और 60 के दशक में बनी कई crime और noir फ़िल्मों के लिए एक नया रास्ता खोला। मुंबई की रातों, अपराध की दुनिया और शहर की बदलती तस्वीर को जिस अंदाज़ में ‘बाज़ी’ ने पर्दे पर उतारा, उसे आगे चलकर ‘बॉम्बे नॉयर’ से जोड़ा गया। फ़िल्मफ़ेयर ने भी Baazi (बाज़ी) को 1950 के दशक की बेहतरीन बॉलीवुड नॉयर फ़िल्मों की अपनी सूची में शामिल किया था।

लेकिन आख़िर Film Noir क्या है? Film Noir सिर्फ़ क्राइम की कहानी नहीं होती। इसमें जुर्म के साथ-साथ धोखा, लालच, रहस्य, डर और इंसानी कमजोरियां भी कहानी का हिस्सा बनती हैं। यहां हीरो हमेशा पूरी तरह सही नहीं होता और कई बार हालात उसे ऐसे फैसले लेने पर मजबूर कर देते हैं, जहां सही और गलत के बीच का फर्क धुंधला पड़ जाता है। Film Noir की एक ख़ास पहचान इसका लाइट और शैडो का खेल भी है। कम रोशनी, गहरी परछाइयां, सुनसान सड़कें और अंधेरी गलियां पर्दे पर ऐसा माहौल बनाती हैं, जो कहानी के सस्पेंस और टेंशन को और बढ़ा देता है।

हॉलीवुड में ये अंदाज़ पहले ही अपनी पहचान बना चुका था। ‘The Maltese Falcon’ जैसी फ़िल्मों में जुर्म, रहस्य और अंधेरे माहौल को ख़ास तौर पर दिखाया गया। जॉन ह्यूस्टन की इस फ़िल्म में हम्फ्री बोगार्ट ने एक जासूस का किरदार निभाया था, जो जुर्म और रहस्य से भरी दुनिया में फंस जाता है।

‘बाज़ी’ ने इसी फ़िल्मी भाषा को भारतीय माहौल में ढाला। यहां मुंबई की गलियां, रातें, बार और जुर्म की दुनिया सिर्फ़ कहानी की पृष्ठभूमि नहीं रहे, बल्कि कहानी का अहम हिस्सा बन गए। यही वजह है कि ‘बाज़ी’ को बाद में ‘बॉम्बे नॉयर’ की शुरुआती और अहम फ़िल्मों में गिना गया।

Source: Wikimedia Commons

‘बॉम्बे नॉयर’ का बढ़ता असर

Baazi (बाज़ी) के बाद मुंबई की शहरी जिंदगी और जुर्म की दुनिया को लेकर कई फ़िल्में बनी। इनमें शहर की चमक के पीछे छिपी परेशानियां, अपराध की दुनिया, क्लब, कैबरे, पुलिस और रहस्यमय किरदार दिखाई दिए। गुरु दत्त ने बाद में ‘जाल’ और ‘आर-पार’ जैसी फ़िल्में बनाईं। उन्होंने ‘सीआईडी’ को प्रोड्यूस भी किया, जिसका डायरेक्शन उनके असिस्टेंट राज खोसला ने किया था।

इसके अलावा चेतन आनंद की ‘टैक्सी ड्राइवर’, प्रमोद चक्रवर्ती की ‘12 ओ’क्लॉक’, राज कपूर की ‘श्री 420’ और शक्ति सामंत की ‘हावड़ा ब्रिज’ और ‘चाइना टाउन’ जैसी फ़िल्मों में भी इस अंदाज़ की झलक दिखाई दी। इन फ़िल्मों में शहर सिर्फ़ कहानी की पृष्ठभूमि नहीं था। मुंबई की सड़कें, रातें, क्लब और अलग-अलग तबके के लोग कहानी को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते थे।

संगीत ने भी बनाई अलग पहचान

Baazi (बाज़ी) की कामयाबी में इसके संगीत का भी बड़ा हिस्सा था। एस.डी. बर्मन के संगीत और साहिर लुधियानवी के गीतों ने फ़िल्म को यादगार बना दिया। फ़िल्म के कई गाने आज भी लोगों को याद हैं। ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले’, ‘सुनो गजर क्या गाए’ और ‘ये कौन आया कि मेरी दुनिया में बहार आई’ जैसे गीतों ने फ़िल्म के माहौल को और ख़ास बनाया। ‘मेरे लबों पे चुप्पी’ जैसे गीत में किशोर कुमार की आवाज़ भी सुनाई दी। वहीं ‘शर्माए काहे, घबराए काहे’ और ‘आज की रात पिया’ जैसे गानों ने फ़िल्म के संगीत में एक अलग रंग जोड़ा।

Source: Wikimedia Commons

सिर्फ़ एक हिट फ़िल्म नहीं थी ‘बाज़ी’

Baazi (बाज़ी) की कामयाबी ने देव आनंद को एक नई पहचान दी। लेकिन इस फ़िल्म की अहमियत सिर्फ़ इतनी नहीं थी कि इसने एक कलाकार को स्टार बनाया। इस फ़िल्म ने ये भी दिखाया कि हिन्दी सिनेमा में शहर, जुर्म, रात, रहस्य और इंसानी कमजोरियों को एक अलग अंदाज़ में कहानी का हिस्सा बनाया जा सकता है। आज जब ‘बाज़ी’ को पीछे मुड़कर देखा जाता है, तो शायद 1950 के दशक की दुनिया हमें थोड़ी पुरानी लगे।

लेकिन फ़िल्म देखने से ये ज़रूर समझ आता है कि हिन्दी सिनेमा में कई ऐसे फ़िल्मी फॉर्मूले कहां से आए, जिन्हें बाद की फ़िल्मों ने अलग-अलग अंदाज़ में आगे बढ़ाया। Baazi (बाज़ी) इसलिए सिर्फ़ देव आनंद के स्टार बनने की कहानी नहीं है। ये गुरु दत्त की नई सोच, एस.डी. बर्मन और साहिर लुधियानवी के संगीत-सफ़र और हिंदी सिनेमा में एक नए फ़िल्मी अंदाज़ के जन्म की कहानी भी है।

ये भी पढ़ें: फ़िल्मों से फ़ैशन तक: Cannes Film Festival की 79 साल की शानदार दास्तान

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