1965 की भारत-पाकिस्तान जंग को छह दशक से ज़्यादा का वक़्त गुज़र चुका है। उस जंग के कई मोर्चे, कई फौजी कार्रवाइयां और अनगिनत जवानों की कुर्बानियां इतिहास का हिस्सा बन चुकी हैं। लेकिन जंग का असली चेहरा अक्सर उन जवानों की यादों में ज़िंदा रहता है, जिन्होंने पहाड़ों, बारिश, गोलियों और मौत के साए के बीच वो दिन गुज़ारे थे। Haji Pir (हाजी पीर) पास की लड़ाई भी 1965 की जंग का एक अहम हिस्सा थी। इस लड़ाई से जुड़ी अपनी यादें साझा करते हुए ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह उस दौर को याद करते हैं, जब वो एक नौजवान अफ़सर थे और अपनी कंपनी की कमान संभाल रहे थे।
जंग की शुरुआत और हाजी पीर की तरफ़ बढ़ते कदम
ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह के मुताबिक, 1965 की जंग से पहले पाकिस्तान की तरफ़ से कश्मीर में घुसपैठ की गई थी। इसके जवाब में भारतीय फौज ने Haji Pir (हाजी पीर) की तरफ़ कार्रवाई करने का फैसला किया। उस वक़्त उनकी बटालियन, 1 पैरा, अलग-अलग पिकेट्स संभाल रही थी। ब्रिगेडियर सिंह खुद एक नौजवान कंपनी कमांडर थे। तजुर्बा भले ही कम था, लेकिन जोश और देश के लिए कुछ करने का जज़्बा बहुत था। वो याद करते हैं कि जवानों के अंदर ये जज़्बा था कि पाकिस्तान की तरफ़ से शुरू की गई लड़ाई का जवाब देना है। हर कोई चाहता था कि उसे आगे बढ़कर कार्रवाई करने का मौक़ा मिले।
Haji Pir पास की अहमियत
Haji Pir (हाजी पीर) सिर्फ़ एक पहाड़ी दर्रा नहीं था। इसकी फौजी और भौगोलिक अहमियत बहुत ज़्यादा थी। ब्रिगेडियर सिंह बताते हैं कि हाजी पीर से होकर एक पुराना रास्ता पुंछ से उड़ी और आगे श्रीनगर की तरफ़ जाता था। ये रास्ता इसलिए भी अहम था क्योंकि पुंछ और उड़ी में मौजूद भारतीय फौजी ठिकानों के बीच आने-जाने और फौजी कार्रवाई के लिए ये रास्ता छोटा और आसान था। यही वजह थी कि Haji Pir (हाजी पीर) पर कब्ज़ा करना सिर्फ़ एक पहाड़ी इलाके पर कब्ज़ा करना नहीं था। इससे पूरे इलाके में फौज की आवाजाही और सुरक्षा की तस्वीर बदल सकती थी।
संख से हाजी पीर की तरफ़
Haji Pir (हाजी पीर) की तरफ बढ़ने के लिए पहला बड़ा टारगेट संख की पाकिस्तानी चौकी थी। ब्रिगेडियर सिंह बताते हैं कि जब तक इस चौकी पर कब्ज़ा नहीं किया जाता, तब तक आगे बढ़ना मुश्किल था। अगस्त का महीना था और कश्मीर के पहाड़ी इलाके में तेज़ बारिश हो रही थी। चिखल और फिसलन की वजह से पैदल चलना भी मुश्किल हो गया था। लेकिन फौजी कार्रवाई में मौसम हमेशा रास्ता नहीं रोक सकता।
संख पर हमला किया गया और चौकी पर कब्ज़ा करने के बाद भारतीय फौज पहाड़ी इलाके में आगे बढ़ी। संख के साथ दो और चौकियां भी कब्ज़े में ले ली गईं। इस बीच उनकी यूनिट का शुरुआती काम पूरा हो चुका था। अब अगली कार्रवाई के लिए दूसरी बटालियन के पहुंचने का इंतज़ार था।
दूरबीन से हम हाजी पीर को देखते रहें
इस दौरान ब्रिगेडियर सिंह और उनके साथी दूरबीन से Haji Pir (हाजी पीर) की तरफ़ नज़र रख रहे थे। कई घंटों तक उन्हें वहां कोई बड़ी हलचल दिखाई नहीं दी। Haji Pir (हाजी पीर) पर कब्ज़ा करना उनकी यूनिट का शुरुआती टास्क नहीं था। ये काम दूसरी बटालियन को करना था। लेकिन दूसरी यूनिट के पहुंचने में देर हो रही थी।
ऐसे में उन्होंने अपने कमांडिंग अफ़सर के ज़रिए ब्रिगेड हेडक्वार्टर को रिक्वेस्ट भेजी कि अगर उन्हें मौक़ा दिया जाए, तो वो Haji Pir (हाजी पीर) की तरफ़ आगे बढ़ सकते हैं। कुछ वक़्त बाद आदेश मिला—एक कंपनी के साथ आगे बढ़ो और Haji Pir (हाजी पीर) पर कब्ज़ा करो। इस तरह एक ऐसा टास्क, जो शुरुआत में उनकी यूनिट का हिस्सा नहीं था, अब उनकी कंपनी के सामने था।
बारिश, पहाड़ और रात भर का सफ़र
Haji Pir (हाजी पीर) की तरफ़ बढ़ना आसान नहीं था। जिस ऊंचाई पर वो मौजूद थे, वहां से पहले नीचे उतरना था और फिर दोबारा पहाड़ पर चढ़ना था। रास्ता करीब सात-आठ किलोमीटर का था, लेकिन लगातार बारिश की वजह से ज़मीन बहुत चिखल भरी हो चुकी थी। ये दूरी तय करने में दोपहर के बाद का पूरा वक़्त और करीब सारी रात लग गई। 28 अगस्त की सुबह मेजर रणजीत सिंह दयाल की अगुवाई में हाजी पीर पर हमला किया गया और पास पर कब्ज़ा कर लिया गया। अगले दिन ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह को वहां पहुंचकर फौज को और मदद देने का आदेश मिला। वो 29 अगस्त की सुबह Haji Pir (हाजी पीर) पास पहुंचे।
कब्ज़े के बाद भी जंग ख़त्म नहीं होती
किसी इलाके पर कब्ज़ा कर लेना जंग का अंत नहीं होता। उसके बाद उस जगह को दोबारा तैयार करना और दुश्मन के हमले से बचाने के लिए इंतज़ाम करना भी उतना ही ज़रूरी होता है। ब्रिगेडियर सिंह बताते हैं कि Haji Pir (हाजी पीर) पहुंचने के बाद इलाके की रेकी की गई। आसपास दुश्मन की मौजूदगी और उसकी अगली तैयारी के बारे में पता लगाने की कोशिश की गई। 29 अगस्त की रात एक छोटी पेट्रोल पार्टी भेजी गई। कुछ वक़्त बाद वापस आए जवानों ने बताया कि इलाके में दुश्मन की नई फौजी हलचल दिखाई दे रही है और मोर्चे तैयार किए जा रहे हैं।
इसके बाद ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह ने अपने सीनियर अफ़सर मेजर रणजीत सिंह दयाल से बात की और आगे जाकर हालात का जायज़ा लेने का फैसला किया। वो मुकाबला जिसने सब कुछ बदल दिया जब वो अपनी कंपनी के साथ आगे बढ़े तो सुबह होने लगी थी। दुश्मन ऊंची जगह पर था, जबकि भारतीय फौज नीचे की तरफ थी। इसके बाद जोरदार मुकाबला शुरू हुआ।
ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह बताते हैं कि उस वक़्त वो अपनी कंपनी की कमान संभाल रहे थे। उनके जवानों ने नारे लगाते हुए हमला किया और लड़ाई हाथापाई तक पहुंच गई।
इस मुकाबले में उनकी कंपनी के 9 जवान शहीद हुए और 22 जवान घायल हुए। खुद ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह भी घायल हुए। उनकी टांग की मांसपेशी को काफी नुकसान पहुंचा, लेकिन लड़ाई जारी रही।
आठ-दस घंटे तक ज़ख्मी जवानों के साथ
पहाड़ी इलाके में दिन के वक़्त ज़ख्मी जवानों को वहां से निकालना बहुत ख़तरनाक था। वो इलाका पेड़ों की सीमा से ऊपर था और कोई भी हलचल दूर से दिखाई दे सकती थी। इस वजह से ज़ख्मी जवानों को कई घंटे तक वहीं रहना पड़ा। ब्रिगेडियर सिंह याद करते हैं कि करीब 8 से 10 घंटे तक ज़ख्मी जवान वहीं मौजूद रहे। शाम को जब अंधेरा हुआ, तब उन्हें वहां से निकालना मुमकिन हो सका। इसके बाद उन्हें उड़ी और फिर श्रीनगर इलाज के लिए भेजा गया। ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह खुद करीब चार महीने अस्पताल में रहे। पूरी तरह ठीक होने में उन्हें इससे भी ज़्यादा वक़्त लगा।
परिवार से संपर्क—चिट्ठियों के सहारे
1965 की जंग का एक और पहलू आज की पीढ़ी के लिए शायद हैरान करने वाला है। उस वक़्त मोबाइल फोन तो दूर, आम टेलीफोन से बात करना भी आसान नहीं था। उस समय ब्रिगेडियर सिंह अभी कुंवारे थे और उनकी उम्र करीब 24-25 साल थी। परिवार से बात करने का सबसे बड़ा ज़रिया चिट्ठियां थी। एक चिट्ठी घर से फौजी मोर्चे तक पहुंचने में कई दिन लग जाते थे और उसका जवाब वापस आने में भी उतना ही वक़्त लगता था। यानी जंग के दौरान परिवार और मोर्चे के बीच दूरी सिर्फ मीलों की नहीं थी। ख़बर पहुंचने और जवाब आने में लगने वाला वक़्त इस दूरी को और बड़ा बना देता था।
जंग के बाद का एक मुश्किल दौर
1965 की जंग के बाद सीजफायर हुआ। इसके बाद ताशकंद समझौते के तहत दोनों देशों की फौजों को जंग से पहले वाली जगहों पर वापस जाना पड़ा। ब्रिगेडियर सिंह के लिए ये निजी तौर पर एक मुश्किल पल था। वो बताते हैं कि जिन इलाकों पर भारतीय फौज ने जंग के दौरान कब्ज़ा किया था, उन्हें वापस करना पड़ा। जंग ख़त्म हो गई, लेकिन उसके निशान उनकी ज़िंदगी में लंबे वक्त तक रहे। जख्मों से पूरी तरह उबरने में उन्हें कई साल लगे।
छह दशक बाद भी यादें ताज़ा
आज 1965 की जंग को छह दशक से ज़्यादा का वक़्त हो चुका है। लेकिन ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह के लिए Haji Pir (हाजी पीर) की यादें सिर्फ़ इतिहास का एक पन्ना नहीं हैं। ये वो दौर था जब नौजवान अफ़सरों और जवानों ने कम तजुर्बे के बावजूद बड़ी जिम्मेदारियां संभालीं। मुश्किल पहाड़ी रास्तों और ख़राब मौसम के बीच आगे बढ़े और अपने साथियों को खोया। उनके लिए ये यादें उन जवानों की भी कहानी हैं, जो अपने परिवारों से दूर मोर्चे पर खड़े थे।
नौजवान पीढ़ी के लिए संदेश
जंग की यादें साझा करने के बाद ब्रिगेडियर सिंह की बात आज के पंजाब और नौजवान पीढ़ी की तरफ मुड़ती है। उनके मुताबिक पंजाब के सामने आज अलग तरह की चुनौतियां हैं। वो ख़ास तौर पर नशे और शिक्षा से जुड़ी समस्याओं का ज़िक्र करते हैं। वो नौजवानों से पढ़ाई पर ध्यान देने, नशे और गलत आदतों से दूर रहने और अपने देश और पंजाब का नाम रोशन करने की अपील करते हैं। उनका संदेश सीधा है—पढ़ो, लिखो, आगे बढ़ो और अपने देश और पंजाब का नाम रोशन करो।
Haji Pir (हाजी पीर) की पहाड़ियों में लड़ी गई वो जंग भले ही अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी है, लेकिन उसमें शामिल जवानों की यादें आज भी हमें बहुत कुछ समझने का मौक़ा देती हैं। जंग सिर्फ़ नक्शे पर खींची गई सरहदों या फौजी कार्रवाइयों के नाम नहीं होती। इसके पीछे नौजवान ज़िंदगियां होती हैं, परिवारों की लंबी इंतज़ार भरी रातें होती हैं, साथियों की कुर्बानियां होती हैं और ऐसे ज़ख्म होते हैं, जिनकी याद कई दशकों तक साथ रहती है।
लेख: रिचा अहूजा
इस लेख को पंजाबी में पढ़ें
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