पंजाब की लोक-संस्कृति में कई ऐसे त्योहार और रिवाज़ हैं, जो सदियों से हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा रहे हैं। ऐसी ही एक ख़ूबसूरत और पाक परंपरा है सांझी माता (Sanjhi Mata) की पूजा। अस्सू महीने के नवरात्रों में मनाई जाने वाली ये परंपरा ग्रामीण पंजाब की कला, गहरी अकीदत और बेटियों के चावों-उमंगों का ख़ूबसूरत मेल है। सांझी माता (Sanjhi Mata) को घर में सुख-शांति, ख़ुशहाली और हरियाली लाने वाली देवी माना जाता है। यही वजह है कि पूरे पंजाब के साथ-साथ उत्तर भारत के कई दूसरे इलाक़ों में भी इस परंपरा को बड़े शौक़ और अकीदत के साथ निभाया जाता है।
इतिहास और पुराना ज़िक्र
लोक-मान्यताओं के मुताबिक, सांझी माता (Sanjhi Mata) की पूजा की परंपरा बहुत पुरानी है। इसकी जड़ें उत्तर भारत की लोक-श्रद्धा और माता की पूजा से जुड़ी परंपराओं में मिलती हैं। माना जाता है कि सांझी माता (Sanjhi Mata), देवी दुर्गा का ही एक लोक-रूप हैं। वहीं, कुछ कहानियों में उन्हें माता पार्वती या उमा का रूप भी माना गया है। ‘सांझी’ शब्द का रिश्ता शाम से भी जुड़ा है, क्योंकि उनकी पूजा शाम के वक़्त की जाती है। वहीं, सांझी का एक मतलब आपसी मेल-जोल और मिल-जुलकर रहने से भी जुड़ता है। इस तरह, ये परंपरा सिर्फ़ अकीदत ही नहीं, बल्कि आपसी एकता और साथ मिलकर रहने का पैग़ाम भी देती है।
नवरात्रों से गहरा रिश्ता
अस्सू महीने के शारदीय नवरात्रों के पहले दिन घरों की दीवारों पर सांझी माता (Sanjhi Mata) की आकृति बनाई जाती है। पहले नवरात्रे से लेकर नौवें नवरात्रे तक लड़कियां और औरतें हर शाम एक जगह इकट्ठा होती हैं। वो सांझी माता की पूजा करती हैं और पारंपरिक गीत गाती हैं। इस दौरान घी का दीया जलाया जाता है और माता से अपनी मुरादें पूरी होने की दुआ मांगी जाती है।
मान्यता है कि सांझी माता (Sanjhi Mata) की पूजा करने से मनचाहा जीवनसाथी मिलता है और शादीशुदा ज़िंदगी में ख़ुशहाली आती है। नवरात्रों की आख़िरी शाम या दशहरे के दिन सांझी माता की आकृति को पूरी अकीदत के साथ दीवार से उतारा जाता है। इसके बाद रीति-रिवाज़ों के मुताबिक, उसे किसी नहर या नदी में विसर्जित कर दिया जाता है।
मिट्टी से मूर्ति बनाने की कला
सांझी माता (Sanjhi Mata) की आकृति तैयार करना पंजाब की घरेलू लोक-कला की एक ख़ूबसूरत मिसाल है। पहले नवरात्रे से कुछ दिन पहले ही लड़कियां बड़े चाव से चिकनी मिट्टी इकट्ठा करती हैं। इस मिट्टी से बड़ी सफ़ाई और हुनर के साथ सांझी माता का चेहरा, हाथ, पैर और अलग-अलग गहने बनाए जाते हैं। इनमें टीका, नथ, हार और चूड़ियां शामिल हैं। मिट्टी से बने इन हिस्सों को पहले सुखाया जाता है और फिर कुदरती रंगों से ख़ूबसूरती के साथ सजाया जाता है।
इसके बाद घर की दीवार पर गोबर और मिट्टी का लेप किया जाता है और इन सभी हिस्सों को कलात्मक ढंग से दीवार पर चिपकाया जाता है। सांझी माता की आकृति के आसपास सूरज, चांद, तारे और पहरेदारों की आकृतियां भी बनाई जाती हैं। ये सभी चीज़ें मिलकर सांझी माता की तस्वीर को और भी ख़ूबसूरत बनाती हैं और इस लोक-कला की ख़ास पहचान को सामने लाती हैं।
जौ बोने की पाक रस्म
सांझी माता (Sanjhi Mata) की स्थापना के वक़्त एक टोकरी या मिट्टी के बर्तन में साफ़ मिट्टी डालकर जौ के बीज बोने की भी एक पाक रस्म होती है। इसे ‘खेत्री’ कहा जाता है। नवरात्रों के नौ दिनों तक इन जौ को रोज़ पानी दिया जाता है। नौवें दिन तक जब जौ हरे-भरे होकर लहलहाने लगते हैं, तो इसे परिवार की आर्थिक ख़ुशहाली और अच्छी फ़सल का शुभ संकेत माना जाता है। ये रस्म हरियाली, तरक़्क़ी और घर में बरकत आने की उम्मीद से भी जुड़ी हुई है।
सांस्कृतिक अहमियत और धीरे-धीरे ख़त्म होती परंपरा
सांझी माता (Sanjhi Mata) की पूजा सिर्फ़ एक धार्मिक रस्म नहीं है, बल्कि ये गांव के लोगों के आपसी मेल-जोल, कला और एकता की भी पहचान रही है। इस परंपरा के ज़रिए लड़कियां मिट्टी से कलाकारी करना सीखती थी। वहीं, सबके साथ मिलकर पूजा करने और गीत गाने से आपसी प्यार भी बढ़ता था।
लेकिन बदलते वक़्त, शहरों के बढ़ते फैलाव और पक्के मकानों के चलन के साथ दीवारों पर मिट्टी से सांझी माता बनाने की ये परंपरा अब गांवों में भी धीरे-धीरे ख़त्म होती जा रही है। पंजाब की ये ख़ूबसूरत लोक-परंपरा हमारी सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है। इसे सहेजकर रखना बेहद ज़रूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इसके बारे में जान सकें और इस विरासत से जुड़ी रह सकें।
लेख: मनमीत कौर
इस लेख को पंजाबी में पढ़ें
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