उर्दू अदब में तंज़-ओ-मज़ाह की बात हो और मुजतबा हुसैन का नाम न आए, यह मुमकिन नहीं। वे उन चुनिंदा क़लमकारों में थे जिन्होंने हंसी को सिर्फ़ दिल बहलाने का ज़रिया नहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाज का आईना बना दिया। उनकी करीब दो दर्जन किताबें छपीं और उनकी तहरीरों को हिंदी और उर्दू, दोनों ज़बानों के पढ़ने वालों ने एक जैसी मोहब्बत से पढ़ा। यही वजह है कि उनका नाम आज भी बड़े अदब से लिया जाता है।
पैदाइश और ख़ानदानी माहौल
मुजतबा हुसैन 15 जुलाई 1936 को हैदराबाद में पैदा हुए। यह वही शहर है जिसकी तहज़ीब, नफ़ासत और ज़बान की मिठास पूरे हिंदुस्तान में मशहूर है। उनके बड़े भाई इब्राहीम जलीस भी अपने ज़माने के मशहूर मज़ाह-निगार थे, जो तक़सीम-ए-हिंद (भारत विभाजन) के बाद पाकिस्तान चले गए। इस तरह घर में ही अदब और हंसी-मज़ाक़ की फ़िज़ा मौजूद थी, और शायद यहीं से मुजतबा हुसैन के अंदर लिखने का हुनर पला-बढ़ा।
कौनैन तक समेट लिए हैं ग़िलाफ़ में
टुकड़े जिगर के टांक दिए हैं ग़िलाफ़ में
अदबी सफ़र और तसानीफ़
मुजतबा हुसैन ने अपनी पूरी ज़िंदगी क़लम के नाम कर दी। उन्होंने कई किताबें लिखीं और मज़ाहिया सहाफ़त (हास्य पत्रकारिता) की पंद्रह से ज़्यादा जिल्दें तैयार कीं। उनकी किताबों में “अपनी याद में” (जो उनकी अपनी ज़िंदगी पर तंज़िया दास्तान है), “उर्दू के शहर उर्दू के लोग”, “बहर-हाल”, “सफ़र लख़्त-लख़्त” और “मेरा कॉलम” ख़ास तौर पर मशहूर हुईं। इन किताबों में कहीं सफ़र की यादें हैं, कहीं शहरों और लोगों का ज़िक्र, और कहीं रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर चुटीली बातें, मगर हर जगह उनका अपना अलग अंदाज़ झलकता है।
रात-भर दीदा-ए-नमनाक में लहराते रहे
साँस की तरह से आप आते रहे जाते रहे
दूसरी ज़बानों में तर्जुमे
उनकी तहरीरों की मक़बूलियत सिर्फ़ उर्दू तक महदूद नहीं रही। उनके मज़ामीन के तर्जुमे हिंदी, अंग्रेज़ी, जापानी और हिंदुस्तान की कई इलाक़ाई ज़बानों में हुए। उनकी ज़िंदगी और फ़न पर भी किताबें लिखी गईं, जैसे “मुजतबा हुसैन: जैसा देखा जैसा पाया” और “मुजतबा हुसैन आईनों के बीच”। इसके अलावा उर्दू रोज़नामा “सियासत” ने उनके नाम पर एक ख़ास वेबसाइट बनाई, जहां उनकी 25 किताबें, यानी साढ़े छह हज़ार से ज़्यादा सफ़हात, ऑनलाइन पढ़ी जा सकती हैं। यह उनकी क़द्र-ओ-क़ीमत की एक बड़ी मिसाल है।
चमन दर चमन है ग़िलाफ़ आइए तो
ज़रा इसपे आराम फ़रमाइए तो
मशहूर तंज़िया मज़ामीन
मुजतबा हुसैन के कई मज़मून लोगों की ज़बान पर चढ़ गए। इनमें “तकिया कलाम”, “मुशायरे और मुजरे का फ़र्क़” और “दीमकों की मलिका से एक मुलाक़ात” बहुत मशहूर हुए। इन मज़ामीन की ख़ास बात यह है कि इनमें हंसी भी है और गहरी बात भी। पढ़ने वाला मुस्कुराता है, लेकिन मज़मून ख़त्म होने पर उसे महसूस होता है कि बात सिर्फ़ मज़ाक़ की नहीं थी।
एज़ाज़ात और एहतिजाज
उर्दू अदब में उनकी ख़िदमात के एतराफ़ में भारत सरकार ने उन्हें 2007 में पद्मश्री से नवाज़ा, जो मुल्क का चौथा सबसे बड़ा शहरी एज़ाज़ है। मगर 2019 में जब नागरिकता संशोधन क़ानून के बाद पूरे मुल्क में एहतिजाज और नफ़रत का माहौल बना, तो उन्होंने अपना पद्मश्री अवॉर्ड लौटाने का एलान कर दिया। यह क़दम इस बात की गवाही था कि वे सिर्फ़ हंसाने वाले अदीब नहीं, बल्कि समाज के बारे में फ़िक्र करने वाले इंसान भी थे।
ख़्वाब हाय दिल-नशीं का इक जहां आबाद हो
तकिया जन्नत भी उठा लाए अगर इरशाद हो
उर्दू तंज़-ओ-मज़ाह का यह रौशन सितारा 27 मई 2020 को हैदराबाद में हमेशा के लिए ख़ामोश हो गया। उनके जाने से उर्दू अदब को बड़ा नुक़सान पहुंचा, मगर उनकी किताबें और उनके मज़ामीन आज भी ज़िंदा हैं।
मुजतबा हुसैन ने हंसी को हथियार बनाकर समाज, सियासत और ख़ुद उर्दू वालों की कमज़ोरियों पर बेबाक चोट की। उनकी तहरीरें पढ़कर चेहरे पर मुस्कुराहट आती है, लेकिन दिल में एक सवाल भी जागता है कि क्या हम अपनी ज़बान और अपनी किताबों की सचमुच क़द्र कर रहे हैं। यही सवाल उनकी तहरीरों को आज भी ताज़ा रखता है।
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