हिमाचल प्रदेश के उत्तर में बर्फ़ से ढकी हिमालय की ऊंंची चोटियों के बीच बसा लाहौल घाटी एक ऐसी हुनरमंद परंपरा का गहवारा है, जिसे दुनिया ‘लाहौली बुने मोज़े और दस्ताने’ (Lahauli knitted socks and gloves) के नाम से जानती है। ये केवल कपड़े नहीं, बल्कि इस वादी की रूह, उसकी संस्कृति और सदियों पुरानी कारीगरी का ज़िंदा सबूत हैं। हर एक टांका एक कहानी बयां करता है, जिसमें रिवायत और फ़न्न का हसीन इम्तिज़ाज मौजूद है। अपने अनोखे डिज़ाइन, चमकीले रंगों और बेमिसाल कारीगरी की वजह से ये न सिर्फ़ आंखों को भाते हैं, बल्कि दिलों को भी छू लेते हैं।

बुनाई की विरासत: इतिहास के झरोखे से
लाहौली मोज़ों और दस्तानों की दास्तान बहुत पुरानी है। इसकी जड़ें औपनिवेशिक दौर से जुड़ी हैं, जब मोरावियन मिशनरी लाहौल पहुंचे। उनका मक़सद धर्म प्रचार था, लेकिन तब्दीली में कामयाबी कम ही मिली। हालांकि, मिशनरी औरतों ने 1862 में एक बुनाई स्कूल क़ायम किया, जहां लाहौली औरतों को जर्मन अंदाज़ के दस्ताने और मोज़े बुनना सिखाया गया। इस पहल ने स्थानीय महिलाओं को न सिर्फ़ हुनर दिया, बल्कि उन्हें अपने देसी नक़्शों और डिज़ाइनों को बाज़ार तक पहुंचाने का मौक़ा भी दिया। आज यही हुनर लाहौली औरतों के हुनरमंद हाथों से वुजूद पाकर दुनिया भर में मशहूर है।

ऊन से फ़ैशन तक का सफ़र
लाहौली मोज़े और दस्ताने देसी भेड़ की ऊन से तैयार होते हैं, जिसे लाहौल के चरवाहे रिवायती तरीक़े से कातते हैं। इन्हें चार दोधारी सुइयों (Double-pointed Needles) से टुकड़ों में बुना जाता है। मोज़ों में आठ तक रंग इस्तेमाल होते हैं और इन्हें बुमचांग, लारी ज़िलदान, कुरु, थिंगमा और क्योग जैसे नक़्शों से सजाया जाता है, जिनका अपना स्थानीय महत्व है। पहले कफ़, पैर और एड़ी अलग-अलग बुनी जाती है, फिर पंजे के ऊपरी हिस्से पर ‘दशी’ के पेचीदा नक़्शे बनाए जाते हैं, जिनमें सात-आठ तक मोटिफ़ होते हैं। आख़िर में तल्ला तैयार होने पर सब हिस्सों को जोड़कर मोज़ा या दस्ताना वुजूद में आता है। यही है लाहौली हुनर की असली ख़ूबसूरती।

GI Tag से बाज़ार तक
ये बुनी हुई चीज़ें सदियों पुराने हुनर और इस इलाक़े की पहचान की अलामत हैं। जैसे-जैसे देसी-विदेशी सैलानियों की तादाद बढ़ रही है, कारीगरों को बाज़ार तक रसाई मिल रही है, जिससे न सिर्फ़ उत्पादन को हौसला मिलता है, बल्कि यह हुनर भी महफ़ूज़ रहता है। 2014 में लाहौली बुने मोज़ों और दस्तानों को जियोग्राफ़िकल इंडिकेशन (GI Tag) का दर्जा मिला, जो उनकी असलियत और मियार की गवाही देता है। सैलानी इन्हें लाहौल घाटी, केलांग और हिमाचल के अन्य बाज़ारों, कोऑपरेटिव्स और कारीगरों की वर्कशॉप्स से ख़रीद सकते हैं।
यूं कहें तो लाहौली मोज़े और दस्ताने सिर्फ़ गर्माहट देने वाली चीज़ें नहीं, बल्कि हिमालय की गोद में पली एक ऐसी दास्तान हैं, जो हर सर्दी में महसूस होती है और हर पहनने वाले को वादी की मिट्टी से जोड़ देती है।
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