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Farrukhabad Prints: हज़ार साल पुरानी कला, जो आज भी दुनिया के दिलों पर राज करती है

जब बात हिंदुस्तान की हस्तनिर्मित विरासत की होती है, तो फ़र्रुख़ाबाद प्रिंट्स (Farrukhabad Prints) का नाम बड़े एहतराम से लिया जाता है। ये सिर्फ़ कपड़े पर छपे नक़्श नहीं, बल्कि मुग़लिया दौर की वो दास्तान हैं जो आज भी ज़िंदा हैं। फ़र्रुख़ाबाद, उत्तर प्रदेश का वो शहर जिसे 1714 में नवाब मोहम्मद ख़ान बंगश ने बसाया। लेकिन इसकी कहानी यहीं से शुरू नहीं होती। माना जाता है कि यहां कपड़ों की छपाई की परंपरा लगभग एक हज़ार साल पुरानी है। नवाब के दौर में कैलिको प्रिंटर्स के लिए अलग मोहल्ले बनाए गए, जहां उस्तादों की पूरी पीढ़ियां इस फ़न को संवारती रहीं। 

2013 में इसे भारत सरकार से GI tag (Geographical Indication) हासिल हुआ। यानी ये कला अब सरकारी तौर पर भी मान्यता प्राप्त धरोहर है।

Image- Social Media

कैसे बनता है ये जादू?

ये प्रिंट्स लकड़ी या पीतल की छापों से बनाए जाते हैं। सेमल, आम या आबनूस की लकड़ी पर बारीकी से नक़्श उकेरे जाते हैं। नक़्क़ाशी के लिए ‘कलम’ नाम की लोहे की पतली छड़ें इस्तेमाल होती हैं।

डिज़ाइन की बात करें तो बूटी (पैसले), कैरी (आम) और ‘ट्री ऑफ़ लाइफ़’ सबसे मशहूर हैं। हैरानी की बात ये है कि अकेले ‘ट्री ऑफ़ लाइफ़’ के करीब पंद्रह अलग-अलग पैटर्न कारीगरों ने विकसित किए हैं।

रंगों की बात करें तो सब कुछ क़ुदरती है। हल्दी और टेसू के फूलों से पीला, लोहे के बुरादे और गुड़ से काला, नील से नीला, गेंदे की पंखुड़ियों से सरसों, मेंहदी की पत्तियों से सुनहरा और अनार के छिलके व दही से हरा।

Image- Social Media

सिर्फ़ कपड़ा नहीं, पहचान है

स्कार्फ़, स्टोल, बेडशीट, पर्दे, कुशन ये प्रिंट्स हर जगह हैं। अब तो ये आर्ट गैलरीज़ की शोभा भी बढ़ा रहे हैं। फ़र्रुख़ाबाद जाएं तो आप ख़ुद देख सकते हैं कि कैसे कारीगर लकड़ी के ठप्पों से कपड़े पर जान डाल देते हैं। ये नज़ारा किसी भी कला-प्रेमी के लिए दिलकश से कम नहीं।

Image- Social Media

उम्मीद की लौ

मशीनी छपाई के इस दौर में ये हुनर ख़त्म होने के कगार पर है। लेकिन कुछ आर्ट स्कूल और संस्थाएं नई पीढ़ी को ये हुनर सिखा रही हैं और कारीगरों के हक़ की हिफ़ाज़त के लिए भी काम हो रहा है ।

अगर आप भी चाहते हैं कि ये हज़ार साल पुरानी विरासत ज़िंदा रहे, तो फ़र्रुख़ाबाद प्रिंट्स का एक टुकड़ा अपने कलेक्शन में ज़रूर शामिल करें। ये सिर्फ़ एक ख़रीद नहीं, बल्कि एक उस्ताद के हुनर को सलाम है।

ये भी पढ़ें-ज़रदोज़ी: जब सुनहरे तारों की कढ़ाई ने लखनऊ की तहज़ीब को लाफानी कर दिया!

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