हसन नईम ने अपनी शायरी के ज़रिए ज़िंदगी के गहरे एहसासात को आसान अल्फ़ाज़ में बयान किया। उनकी शायरी में मोहब्बत, वफ़ा, ग़म, तन्हाई और इंसानी ज़िंदगी के तजुर्बों की झलक दिखाई देती है। उन्होंने अपने कलाम में सिर्फ़ जज़्बात का इज़हार नहीं किया, बल्कि ज़िंदगी को देखने और समझने का एक अलग नज़रिया भी पेश किया।
हसन नईम की पैदाइश 6 जनवरी, 1927 को बिहार के पटना में एक पढ़े-लिखे और मज़हबी रुझान रखने वाले ख़ानदान में हुयी थी। उनके दादा सैयद ग़ुलाम हुसैन क़ासिम, राजगीर में पीर इमामुद्दीन की ख़ानक़ाह के मुतवल्ली थे। वहीं, उनके वालिद ने आधुनिक तालीम हासिल की थी और वह बैरिस्टर के तौर पर काम करते थे। इस तरह हसन नईम को बचपन से ही इल्म और अदब से जुड़ा माहौल मिला।
ग़म से बिखरा न पाएमाल हुआ
मैं तो ग़म से ही बे-मिसाल हुआ
हसन नईम ने अपनी शुरुआती तालीम शेख़पुरा में हासिल की। साल 1943 में उन्होंने पटना के मोहम्मडन एंग्लो-अरेबिक स्कूल से मैट्रिक का इम्तिहान पास किया। इसके बाद उन्होंने बी.एन. कॉलेज, पटना से अपनी आगे की तालीम हासिल की। साल 1946 में वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पहुंचे, जहां उन्होंने बैचलर ऑफ़ साइंस की पढ़ाई शुरू की।
अलीगढ़ में रहते हुए हसन नईम का जुड़ाव प्रगतिशील लेखक आंदोलन यानी Progressive Writers’ Movement से हुआ। इस आंदोलन ने उर्दू साहित्य में समाज, इंसान और ज़िंदगी से जुड़े सवालों को अहमियत दी। हसन नईम भी इस तहरीक से जुड़े, लेकिन उनकी शायरी में नारेबाज़ी के बजाय फ़िक्र, एहसास और अदबी नफ़ासत को ख़ास जगह मिली। पटना लौटने के बाद उन्होंने वहां प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव के तौर पर भी काम किया।
इतना रोया हूं ग़म-ए-दोस्त ज़रा सा हंस कर
मुस्कुराते हुए लम्हात से जी डरता है
अपने पेशेवर सफ़र की शुरुआत में हसन नईम ने कलकत्ता और पटना में शिक्षक के रूप में काम किया। बाद में उन्होंने सरकारी महकमों में अहम ज़िम्मेदारियां निभाईं। रिटायरमेंट के बाद वह दिल्ली के ग़ालिब इंस्टीट्यूट के निदेशक बने। इस ज़िम्मेदारी के ज़रिए उन्हें उर्दू अदब की ख़िदमत करने का एक और मौक़ा मिला।
हसन नईम के दो प्रमुख काव्य-संग्रह ‘अशआर’ और ‘दबिस्तान’ के नाम से प्रकाशित हुए। उनके शेरों में ग़म और मुश्किलों के सामने टूट जाने के बजाय उनसे अपनी पहचान बनाने का हौसला मिलता है।
ग़म से बिखरा न पामाल हुआ
मैं तो ग़म से ही बे-मिसाल हुआ।
इन दो मिसरों में शायर ज़िंदगी के एक अहम सच को बयान करते हैं। उनका कहना है कि ग़म हमेशा इंसान को कमज़ोर नहीं करता, बल्कि कई बार वही मुश्किलें उसे पहले से ज़्यादा मज़बूत और बेमिसाल बना देती हैं।
मैं एक बाब था अफ़साना-ए-वफ़ा का मगर
तुम्हारी बज़्म से उठा तो इक किताब बना।
यहां शायर अपने तजुर्बों को एक नई पहचान मिलने की बात करते हैं। कभी इंसान किसी कहानी का एक हिस्सा होता है, लेकिन वक़्त और हालात उसे एक मुकम्मल किताब की तरह तजुर्बों से भर देते हैं।
हसन नईम की शायरी की ख़ूबी यही थी कि वह ज़िंदगी के दर्द, रिश्तों की पेचीदगियों और इंसान के अंदर चलने वाली कशमकश को सादगी के साथ बयान करते थे। उनके यहां ग़म सिर्फ़ उदासी का नाम नहीं, बल्कि ख़ुद को पहचानने और अपने वजूद को समझने का ज़रिया भी बन जाता है।
22 फ़रवरी, 1991 को हसन नईम इस दुनिया से रुख़्सत हो गए। हालांकि उनका सफ़र ख़त्म हो गया, लेकिन उनके अशआर आज भी उर्दू शायरी के चाहने वालों को ज़िंदगी, मोहब्बत और इंसानी जज़्बात पर ग़ौर करने का मौक़ा देते हैं।
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