डॉ. सुरजीत पातर (Dr. Surjit Patar) आधुनिक पंजाबी साहित्य के ऐसे चमकते सितारे थे, जिन्होंने पंजाबी कविता और ग़ज़ल को आम लोगों की आवाज़ बनाया। उनकी शायरी में सोच की गहराई और ख़ूबसूरती का एक नया अंदाज़ देखने को मिलता है। उनकी कविताएं सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का मेल नहीं, बल्कि पंजाब के लोगों के दर्द, तकलीफ़ों, उम्मीदों और अपनी मां-बोली पंजाबी से गहरे प्यार की आवाज़ हैं। अपनी बेमिसाल संवेदनशीलता और ख़ास अंदाज़ की बदौलत डॉ. सुरजीत पातर (Dr. Surjit Patar) ने पंजाबी साहित्य को दुनिया भर में पहचान और इज़्ज़त दिलाई।
शुरुआती ज़िंदगी और तालीम
डॉ. सुरजीत पातर (Dr. Surjit Patar) की पैदाइश 14 जनवरी, 1945 को जालंधर ज़िले के पातर कलां गांव में हुई थी। उन्होंने अपने गांव के नाम पर ही अपना नाम ‘पातर’ रखा। शुरुआती पढ़ाई गांव के स्कूल से पूरी करने के बाद उन्होंने कपूरथला के रणधीर कॉलेज में आगे की तालीम हासिल की। इसके बाद पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से पंजाबी में मास्टर डिग्री ली। डॉ. पातर ने गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (GNDU), अमृतसर से पीएचडी की। उनकी रिसर्च का विषय था ‘गुरु नानक वाणी में लोक-साहित्य का बदलाव’। उनकी तालीम और रिसर्च ने पंजाब के लोक-साहित्य, उसकी रिवायतों और रूहानी विरासत को समझने में उनकी सोच को और गहराई दी।

तालीम और साहित्य के लिए काम
पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. सुरजीत पातर (Dr. Surjit Patar) ने लुधियाना की पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (PAU) में पंजाबी के प्रोफ़ेसर के तौर पर काम किया। साल 2004–2005 में वो इस पद से रिटायर हुए। पढ़ाने के साथ-साथ उन्होंने साहित्य और कला को आगे बढ़ाने में भी अहम किरदार निभाया। वो लुधियाना की पंजाबी साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और चंडीगढ़ की पंजाब आर्ट्स काउंसिल के चेयरमैन भी रहे। उनकी अगुवाई में ‘पंजाब कला भवन’ सिर्फ़ एक दफ़्तर बनकर नहीं रहा, बल्कि ऐसा ख़ास मरकज़ बन गया, जहां पंजाब भर के लेखक, शायर, कलाकार और विचारक मिलकर साहित्य और कला पर बातचीत करते थे।

शायरी की किताबें और साहित्यिक सफ़र
डॉ. सुरजीत पातर (Dr. Surjit Patar) ने 1960 के दशक के आख़िरी सालों में लिखना शुरू किया। ग़ज़ल लिखने के उनके ख़ास अंदाज़ ने पंजाबी कविता को एक नई राह दिखाई। उनकी कुछ अहम किताबें हैं:
हवा विच लिखे हरफ़ (1979): ये उनकी पहली किताब थी। इसमें उनके ग़ज़ल लिखने का अनोखा अंदाज़ देखने को मिला और पंजाबी साहित्य की दुनिया में उन्हें एक अलग पहचान मिली।
बिरखा अर्ज़ करे (1992): इस किताब की कविताओं में इंसान के जज़्बात और क़ुदरत के बीच के रिश्ते को ख़ूबसूरती से पेश किया गया।
हनेरे विच सुलगदी वर्णमाला (1992): इस किताब में पंजाब के दर्द, तकलीफ़ों और समाज में हो रहे बदलावों की झलक देखने को मिलती है।
लफ़्ज़ां दी दरगाह (2003): इस किताब में अल्फ़ाज़ की अहमियत और एक लेखक की ज़िम्मेदारी को गहराई से बयान किया गया है।
पतझड़ दी पैंजब और सुर-ज़मीन: इन किताबों में भी उनकी गहरी सोच और अल्फ़ाज़ के ज़रिए जज़्बात बयां करने का ख़ास अंदाज़ देखने को मिलता है।
डॉ. सुरजीत पातर की कुछ पंक्तियां लोगों के दिलों में आज भी ज़िंदा हैं।
“अगर मैं कुछ कहूं, तो अंधेरा इसे कैसे बर्दाश्त करेगा? अगर मैं ख़ामोश रहूं, तो शमादान क्या कहेंगे?
मैं रास्तों पर नहीं चलता, जब चलता हूं तो रास्ते बन जाते हैं“
उनकी इन पंक्तियों में सच कहने का हौसला, ख़ामोशी का दर्द और अपनी अलग राह बनाने का जज़्बा साफ़ नज़र आता है।

शायरी का ख़ास अंदाज़
डॉ. सुरजीत पातर (Dr. Surjit Patar) की शायरी की सबसे बड़ी ख़ासियत थी उनके अल्फ़ाज़ की मिठास और उनमें बसी संगीत जैसी लय। जब वो कवि सम्मेलनों में अपनी ग़ज़लें सुनाते थे, तो उनकी सुरीली आवाज़ सुनने वालों को बांध लेती थी। उनकी आवाज़ में बांसुरी जैसी मिठास और एक अपनापन था। उन्होंने अपनी शायरी में गांव की ज़िंदगी, पेड़-पौधों, परिंदों, नदियों और मौसम के रंगों को इतनी ख़ूबसूरती से पिरोया कि उनके सीधे-सादे अल्फ़ाज़ भी दिल को छू जाते थे और गहरी बात कह जाते थे। उनकी शायरी में मायूसी के आगे हार मानने के बजाय, अंधेरे में भी रौशनी तलाशने का जज़्बा नज़र आता है।
मां-बोली पंजाबी के लिए दर्द
डॉ. सुरजीत पातर (Dr. Surjit Patar) मां-बोली पंजाबी के सच्चे रखवाले थे। जब नई पीढ़ी धीरे-धीरे अपनी ज़बान से दूर होती जा रही थी, तब उनकी कलम से निकले अल्फ़ाज़ हर पंजाबी के दिल का दर्द बयां करते थे। “मेरी ज़बान हर लफ़्ज़ के साथ मर रही है, मेरी ज़बान हर जुमले के साथ मर रही है।” डॉ. पातर लगातार इस बात को लेकर आगाह करते रहे कि अगर कोई क़ौम अपनी ज़बान खो देती है, तो उसके साथ उसका इतिहास, तहज़ीब और उसकी पहचान भी धीरे-धीरे मिटने लगती है।
उन्होंने ऐसे आंदोलनों को अपनी सोच और आवाज़ से ताक़त दी, जो घरों, स्कूलों और सरकारी कामकाज में पंजाबी ज़बान को उसका सही मुक़ाम दिलाने की मांग कर रहे थे। उनके लिए पंजाबी सिर्फ़ एक ज़बान नहीं, बल्कि पंजाब की पहचान, उसकी तहज़ीब और उसकी रूह थी।

तर्जुमे और सिनेमा में योगदान
डॉ. सुरजीत पातर (Dr. Surjit Patar) ने सिर्फ़ शायरी ही नहीं की, बल्कि दुनिया के बेहतरीन अदबी काम को पंजाबी ज़बान तक पहुंचाने में भी अहम किरदार निभाया। उन्होंने स्पेन के मशहूर नाटककार फेदेरिको गार्सिया लोर्का के नाटकों Blood Wedding और Yerma का पंजाबी में तर्जुमा और रूपांतरण किया। Blood Wedding को पंजाबी में अग्ग दे कलीरे और Yerma को सियो नी मैं और अंत-हीन तरकलां के नाम से पेश किया गया।
इसके अलावा, उन्होंने बर्टोल्ट ब्रेख्त की नज़्मों और जीन गिरोदू के नाटकों का भी पंजाबी में तर्जुमा किया। पंजाबी सिनेमा में भी उनका काम काफ़ी अहम रहा। उन्होंने फ़िल्म शहीद उधम सिंह के डायलॉग लिखे। वहीं, मशहूर फ़िल्मकार दीपा मेहता की अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म Heaven on Earth (विदेश) के पंजाबी डायलॉग भी उनकी कलम से निकले। इस तरह डॉ. सुरजीत पातर (Dr. Surjit Patar) ने अपनी शायरी, तर्जुमों और फ़िल्मों के ज़रिए पंजाबी ज़बान और अदब को नई पहचान दिलाई।
समाज के लिए आवाज़ और ज़मीर की पुकार
डॉ. सुरजीत पातर (Dr. Surjit Patar) सिर्फ़ किताबों में लिखने वाले शायर नहीं थे, बल्कि लोगों के हक़ और उनके हक़ की लड़ाई में भी अपनी आवाज़ उठाते थे। साल 2015 में देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में उन्होंने अपना साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटा दिया। वहीं, 2020–21 के ऐतिहासिक किसान आंदोलन के दौरान किसानों के साथ एकजुटता दिखाते हुए उन्होंने अपना प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान लौटाने का फ़ैसला किया। उनके इन क़दमों से ये साफ़ ज़ाहिर हुआ कि उनके लिए लोगों की भलाई, इंसाफ़ और उसूल किसी भी सरकारी सम्मान से ज़्यादा मायने रखते थे।

सम्मान और अवॉर्ड
डॉ. सुरजीत पातर (Dr. Surjit Patar) को पंजाबी साहित्य में उनके शानदार काम के लिए कई बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड से नवाज़ा गया। इनमें से कुछ अहम सम्मान हैं:
पंजाब साहित्य अकादमी अवॉर्ड (1979): पंजाबी साहित्य में उनके काम के लिए।
साहित्य अकादमी अवॉर्ड (1993): उनकी किताब हनेरे विच सुलगदी वर्णमाला के लिए।
पंजनद अवॉर्ड (1999): कोलकाता की भारतीय भाषा परिषद की तरफ़ से।
अनद काव सम्मान (2007–2008): उनकी साहित्यिक ख़िदमात के लिए।
सरस्वती सम्मान (2009): के. के. बिरला फ़ाउंडेशन की तरफ़ से।
गंगाधर राष्ट्रीय कविता अवॉर्ड (2009): ओडिशा की संबलपुर यूनिवर्सिटी की तरफ़ से।
पद्मश्री (2012): साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके अहम योगदान के लिए भारत सरकार की तरफ़ से।
कुसुमाग्रज राष्ट्रीय साहित्य अवॉर्ड (2014): साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए।
इन सम्मानों ने पंजाबी साहित्य में डॉ. सुरजीत पातर (Dr. Surjit Patar) के काम और उनकी शायरी की अहमियत को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
आख़िरी विदाई और हमेशा ज़िंदा रहने वाले अल्फ़ाज़
11 मई 2024 को लुधियाना में दिल का दौरा पड़ने से डॉ. सुरजीत पातर (Dr. Surjit Patar) का इंतक़ाल हो गया। उनके जाने से पंजाबी साहित्य को ऐसा नुक़सान हुआ, जिसकी भरपाई करना मुश्किल है। अपनी मीठी आवाज़ और दिल को छू लेने वाली शायरी के ज़रिए उन्होंने पंजाबी ज़बान की जो ख़िदमत की, उसे आने वाली नस्लें भी याद रखेंगी। उनके अल्फ़ाज़ हमेशा पंजाब की रूह में ज़िंदा रहेंगे और लोगों को रास्ता दिखाते रहेंगे।
लेख: मनमीत कौर
इस लेख को पंजाबी में पढ़ें
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