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जिनके आगे राज कपूर ने भी झुकाया सिर,लोककला को नई पहचान देने वाली ‘तमाशा साम्राज्ञी’ विठाबाई नारायणगावकर

 ‘ईठा’ का टीज़र आया और सबको फिर से याद आ गई महाराष्ट्र की वो महान कलाकार जिसने अपनी कला के लिए सब कुछ क़ुर्बान कर दिया। ये कहानी है विठाबाई नारायणगावकर (Vithabai Narayangaonkar) की, जिन्हें लोग ‘तमाशा साम्राज्ञी’ (‘Tamasha Empress’) कहते थे।

कौन थीं विठाबाई ?

विठाबाई (Vithabai Narayangaonkar) की पैदाइश 1 जुलाई 1935 को महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के पंढरपुर में हुई। उनका पूरा परिवार तमाशा से जुड़ा था। उनके दादा नारायण खुडे ने एक तमाशा मंडली बनाई थी, जो बाद में उनके पिता भाऊ बापू और दूसरे लोग चलाने लगे।

ऐसे माहौल में बड़ी होने की वजह से विठाबाई को बचपन से ही लावणी, गावलाण और भेडिक जैसी कलाओं को जाना और सीखा। उन्हें कहीं से नाटक की शिक्षा नहीं मिली, लेकिन रंगमंच पर उनकी कला ऐसी थी कि पूरा महाराष्ट्र उनका स्कूल बन गया। हजारों लोगों के सामने खड़ा होना ही उनकी पढ़ाई थी।

Image- Wikipedia

 ‘तमाशा साम्राज्ञी’ कैसे बनीं ?

विठाबाई की जिंदगी में एक बड़ा मोड़ आया जब मशहूर मराठी नाटककार मामा वरेरकर ने उन्हें देखा। उन्होंने विठाबाई की एक्टिंग से प्रभावित होकर उन्हें इसमें आगे बढ़ने के लिए बहुत बढ़ावा दिया। उन्होंने उनकी कला को निखारने में मदद की।

विठाबाई (‘Tamasha Empress’) की आवाज़, रंगमंच पर उनका दबदबा और लोगों से जुड़ने का उनका अंदाज ने उन्हें महाराष्ट्र की सबसे बड़ी लोककलाकार बना दिया। उनके प्रशंसकों ने उन्हें “तमाशा साम्राज्ञी” का ताज दिया। ये इज्ज़त उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से हासिल की।

बच्चा पैदा करने की वो हैरान करने वाली कहानी !

विठाबाई की जिंदगी में एक कहानी इतनी मशहूर है कि उसे सुनकर आपको यकीन नहीं होगा। वो नौ महीने की गर्भवती थीं और तमाशा कर रही थीं। अचानक उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हो गई।

सोचिए..एक औरत रंगमंच पर खड़ी है, सैंकड़ों लोग उसे देख रहे हैं, और उसे बच्चे की तकलीफ हो रही है।  लेकिन विठाबाई ने अपनी हिम्मत नहीं खोई। उन्होंने शो बंद नहीं किया, बल्कि स्टेज से नीचे उतरीं, पीछे गईं, और वहीं उन्होंने अपनी बच्ची को जन्म दिया। इतना ही नहीं, बल्कि एक पत्थर से नाल काटकर वो फिर से रंगमंच पर लौटने को तैयार हो गईं। 

जब लोगों को ये बात पता चली, तो उन्होंने तुरंत शो रोक दिया और विठाबाई को आराम करने को कहा। ये घटना उनकी कला के प्रति समर्पण की सबसे बड़ी निशानी बन गई। आज ‘ईठा’ के टीज़र में इसी पल को फिर से दिखाया गया है।

Image-Shraddha Kapoor/Instagram

फिल्मों का ऑफर क्यों ठुकराया ?

विठाबाई इतनी मशहूर हो गईं कि बॉलीवुड से भी उन्हें ऑफर आने लगे। ख़ुद राज कपूर जैसे बड़े कलाकार ने उन्हें फिल्म में काम करने का मौका देना चाहा। लेकिन विठाबाई ने ये ऑफर ठुकरा दिया।

उन्होंने तमाशा और लोककला को ही अपनी जिंदगी बना लिया। वो अपनी मंडली के साथ गांव-गांव घूमती रहीं, लोगों के सामने अपनी कला पेश करती रहीं। जब नए-नए मनोरंजन के साधन आ रहे थे, तब विठाबाई ने इस पुरानी और पारंपरिक कला को जिंदा रखा।

 क्या-क्या सम्मान मिले ?

विठाबाई की कला को पूरे देश ने सराहा। राष्ट्रपति ने उन्हें 1957 और 1990  में पदक देकर सम्मानित किया। 1062 की जंग में उन्होंने सीमा पर जाकर भारतीय सैनिकों का मनोरंजन किया और उनका हौसला बढ़ाया।

महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें ‘तमाशा साम्राज्ञी’ की उपाधि दी। 2006 में उनके नाम पर ‘विठाबाई नारायणगावकर जीवनगौरव पुरस्कार’ शुरू किया गया, जो आज भी लोककलाकारों को सम्मान देता है।

Image-IMDB

विठाबाई की याद और ‘ईठा’ का पैगाम

15 जनवरी 2002 को विठाबाई ने 66 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कहा। लेकिन उनकी याद आज भी तमाशा और लावणी की हर महफिल में जिंदा है।

एक्ट्रेस श्रद्धा कपूर फिल्म  ‘ईठा’ में उनकी कहानी को नई पीढ़ी तक पहुंचा रही हैं। इस किरदार में जान फूंक रही हैं और ये फिल्म विठाबाई के त्याग, प्यार और मजबूती का आईना होगी।

विठाबाई नारायणगावकर की कहानी सिर्फ एक कलाकार की कहानी नहीं, बल्कि एक औरत की वो ताकत है जो मुश्किलों से लड़कर अपनी मंजिल तक पहुंची। उन्होंने साबित किया कि सच्चा कलाकार किसी भी मुश्किल में अपनी कला का साथ नहीं छोड़ता।

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