आज जब हम अंबानी, अडानी या दुनिया के किसी और अरबपति की बात करते हैं, तो उनकी दौलत अरबों में गिनी जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ऐसा हुक्मरान हुआ है, जिसके पास इतनी दौलत थी कि वो अमेरिका की कुल अर्थव्यवस्था (GDP) का लगभग 2 फीसदी अकेले अपने ख़ज़ाने में समेटे थे?
जी हां, हम बात कर रहे हैं हैदराबाद के आखिरी निज़ाम, मीर उस्मान अली ख़ान (The Last Nizam of Hyderabad, Mir Osman Ali Khan) की। 1937 में TIME मैगज़ीन ने जब उन्हें दुनिया का सबसे अमीर शख्स (The world’s richest man) करार दिया, तो पूरी दुनिया हैरान रह गई थी। आइए, आपको ले चलते हैं उसी सुनहरे और नायाब अंदाज़ में, जहां हीरे पत्थर की तरह बिखरे थे और रोल्स-रॉयस सड़कों पर नहीं, बल्कि शाही गैरेज की शान थीं।

कौन थे मीर उस्मान अली ख़ान?
मीर उस्मान अली ख़ान (Nizam of Hyderabad, Mir Osman Ali Khan) की पैदाइश 1886 में हुआ। सिर्फ़ 25 साल की उम्र में, 1911 में वे हैदराबाद के सातवें निज़ाम बने। उस समय हैदराबाद रियासत ब्रिटिश भारत की सबसे बड़ी रियासत थी, जो आज के तेलंगाना, महाराष्ट्र और कर्नाटक के बड़े हिस्सों पर फैली थी। उनके पास वो गोलकुंडा की खानें थीं, जिनसे दुनिया के सबसे बेहतरीन हीरे निकलते थे।
दौलत के वो किस्से, जिन्हें सुनकर आप यकीन नहीं करेंगे
1940 के दशक में उनकी संपत्ति का आंकड़ा लगभग 2 अरब डॉलर लगाया गया था। आज के हिसाब से ये करोड़ों-अरबों नहीं, बल्कि लाखों करोड़ रुपये के बराबर होगा। उनके पास एक अलग ख़ज़ाना था, जिसमें 100 मिलियन यूरो की सोने-चांदी की ईंटें और 400 मिलियन यूरो के जेवरात थे।
लेकिन सबसे चर्चित है जैकब डायमंड (Jacob Diamond)। ये 184.75 कैरेट का विशाल हीरा, जिसकी कीमत आज लगभग 1000 करोड़ रुपये है, निज़ाम अपने कागजातों पर रखने के लिए पेपरवेट (कागज दबाने का पत्थर) की तरह इस्तेमाल करते थे, जी हां, जिस हीरे को देखने के लिए दुनिया की बड़ी-बड़ी सल्तनतें तरसती थीं, वो उनकी मेज पर एक आम चीज़ की तरह रखा रहता था। ये हीरा आज भी मुंबई की RBI (Reserve Bank of India) की तिजोरी में मौजूद है।

रोल्स-रॉयस के दीवाने
निज़ाम को लग्ज़री कारों से बेहद प्यार था। वे Rolls-Royce के ऐसे दीवाने थे कि उनके पास कम से कम 50 Rolls-Royce थीं। इनमें सबसे ख़ास थी सिल्वर घोस्ट थ्रोन कार। उनका गैरेज दुनिया के सबसे शानदार शाही कार संग्रहों में गिना जाने लगा।
दिल के बादशाह: जो दौलत के साथ-साथ इंसान भी थे
लेकिन निज़ाम सिर्फ दिखावे के धनी नहीं थे। इतिहास उन्हें ‘The Architect of Modern Hyderabad’ भी कहता है। उन्होंने हैदराबाद शहर को बाढ़ से बचाने के लिए उस्मान सागर और हिमायत सागर (Osman Sagar and Himayat Sagar) जैसी बड़ी झीलें बनवाईं।
उनके शासनकाल में ही उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद हाई कोर्ट, उस्मानिया जनरल हॉस्पिटल और बेगमपेट एयरपोर्ट (जो ब्रिटिश भारत का पहला एयरपोर्ट था) (Osmania University, the Hyderabad High Court, Osmania General Hospital, and Begumpet Airport (which was the first airport in British India).) बने। उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU), अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस जैसे संस्थानों को भारी दान दिया।

आखिरी निज़ाम: ताज से तख़्त तक का सफ़र
जब 1947 में भारत आज़ाद हुआ, तो निज़ाम पहले भारत में शामिल नहीं होना चाहते थे। वे हैदराबाद को एक अलग रियासत रखना चाहते थे या पाकिस्तान से जुड़ना चाहते थे। लेकिन जब रज़ाकारों का आतंक बढ़ा और तेलंगाना में विद्रोह हुआ, तो 1948 में भारत सरकार ने ‘ऑपरेशन पोलो’ चलाकर हैदराबाद को भारत में मिला लिया। इसके बाद निज़ाम ने 1950 से 1956 तक राजप्रमुख के तौर पर काम किया।
अंदाज़ ए बयां
निज़ाम उस्मान अली खान की एक और खासियत थी उनकी सादगी भरी शान। वे अक्सर फीज़ी टोपी और सादा लिबास पहनते थे, लेकिन उनके पास मोतियों और हीरों के वो टुकड़े थे, जिनकी कीमत पूरे यूरोप के किसी बैंक से भी ज्यादा थी।

1967 में जब वे दुनिया छोड़कर गए, तो उनके पीछे सिर्फ दौलत के ढेर नहीं, बल्कि एक मिसाल छोड़ गए कि एक बादशाह कैसे डेवलपमेंट भी कर सकता है, दान भी कर सकता है और अपने शौक में भी ‘दुनिया का सबसे अमीर’ हो सकता है।
मीर उस्मान अली खान सिर्फ एक निज़ाम नहीं थे, वो एक कहानी थे, जिसमें हीरे पेपरवेट थे, रोल्स-रॉयस गाड़ियां थीं, और दिल में इतनी उदारता थी कि पूरा हैदराबाद आज भी उन्हें याद करता है। उनकी ज़िदगी हमें बताता है कि सच्ची शान दिल में होती है, चाहे ताज सिर पर हो या ना हो।
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