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एवरेस्ट से ऊंची जुन्को ताबेई

दूसरे विश्वयुद्ध का दौर जापान के लिए अभाव और भुखमरी का दौर था। उस समय पैदा हुए असंख्य बच्चों की तरह 1939 में फुकुशिमा में जन्मी जुन्को ताबेई भी कुपोषण का शिकार रही. उसका कद जीवन भर चार फीट नौ इंच से आगे नहीं बढ़ पाया। स्कूल में उसके छोटे और दुबले शरीर का मजाक उड़ाया जाता था, लेकिन यही नन्ही-सी लड़की अपने भीतर एक ऐसा साहस छिपाए हुए थी जिसकी कल्पना उसके सहपाठी नहीं कर सकते थे। दस वर्ष की आयु में उसने स्कूल के एक पर्वतारोहण अभियान में भाग लिया और उसे सफलतापूर्वक पूरा करके पहली बार पहाड़ों से अपना रिश्ता जोड़ा।

कॉलेज में उसने अंग्रेजी और अमेरिकी साहित्य की पढ़ाई की। उसकी पीढ़ी की अधिकांश जापानी युवतियों की तरह उसका सपना भी अध्यापिका बनने का था, लेकिन पहाड़ों का आकर्षण उसके भीतर लगातार बना रहा। मौका मिलते ही वह किसी नई चोटी की ओर निकल पड़ती और कुछ ही वर्षों में जापान की अनेक महत्वपूर्ण चोटियों पर पहुँच चुकी थी।

लेकिन उस समय पर्वतारोहण की दुनिया पुरुषों का गढ़ मानी जाती थी। यह एक ऐसा क्षेत्र था जहाँ स्त्रियों के लिए जगह लगभग नहीं थी। उनसे उम्मीद की जाती थी कि वे घर, रसोई और बच्चों तक सीमित रहें. कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद 23 वर्ष की आयु में जुन्को ने इन सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देने का फैसला किया। वह पुरुष पर्वतारोहियों के दलों में अकेली महिला सदस्य के रूप में शामिल होने लगी। उसके छोटे कद और स्त्री होने को लेकर उसका मजाक बनाया जाता था। कुछ पुरुष तो केवल इस कारण अभियान से हट जाते कि वे किसी महिला के साथ चढ़ाई नहीं करना चाहते थे।

इन बाधाओं ने उसके इरादों को और मजबूत किया। सत्ताईस वर्ष की आयु तक वह माउंट फूजी सहित जापान की लगभग सभी प्रमुख चोटियाँ जीत चुकी थी। माउंट तानीकावा के अभियान के दौरान उसकी मुलाकात पर्वतारोही मासानोबू ताबेई से हुई। दोनों ने विवाह किया और उनके दो बच्चे हुए। मासानोबू ने उस दौर के समाज से अलग जाकर जुन्को के सपनों का साथ दिया और कई बार उसके अभियानों के दौरान बच्चों की जिम्मेदारी स्वयं संभाली।

पुरुष वर्चस्व से तंग आकर जुन्को ने 1969 में जापान का पहला महिला पर्वतारोहण क्लब स्थापित किया। अगले ही वर्ष इस समूह ने हिमालय की अन्नपूर्णा-तीन चोटी पर सफलता प्राप्त की। इसके बाद उसका अगला सपना संसार की सबसे ऊँची चोटी एवरेस्ट था।

एवरेस्ट अभियान के लिए अनुमति तो मिल गई, लेकिन उसकी बारी आने में चार वर्ष लग गए. उससे भी बड़ी समस्या धन की थी. प्रायोजक महिलाओं के इस अभियान पर पैसा लगाने को तैयार नहीं थे. अंततः जब एक मीडिया संस्था ने सहायता दी भी, तो उसने पर्वतारोहियों की पूरी फीस देने से इनकार कर दिया. जुन्को ने हार नहीं मानी. उसने बच्चों को पियानो और अंग्रेजी सिखाकर पैसे जुटाए. अपने लिए पर्वतारोहण के कपड़े और दस्ताने तक पुराने परदों और कार के कवर से स्वयं तैयार किए.

मई 1975 में पंद्रह महिलाओं का दल उसकी अगुवाई में एवरेस्ट के लिए रवाना हुआ। छह शेरपाओं की सहायता से उन्होंने वही मार्ग चुना जिससे हिलेरी और तेनजिंग पहली बार शिखर तक पहुँचे थे। लगभग 27 हजार फीट की ऊँचाई पर उनके शिविर पर एक भयानक हिमस्खलन हुआ। जुन्को और उसकी चार साथिनों का तंबू बर्फ के नीचे दब गया। उन्हें बड़ी कठिनाई से बाहर निकाला गया। वह घायल थी और कई दिनों तक ठीक से चल भी नहीं सकी, लेकिन उसने अभियान छोड़ने से इनकार कर दिया।

आखिर 16 मई 1975 को जुन्को ताबेई ने एवरेस्ट की चोटी पर कदम रखा और ऐसा करने वाली दुनिया की पहली महिला बनी. पूरी दुनिया में उसकी चर्चा हुई, लेकिन वह हमेशा कहती रही कि उसे पहली महिला नहीं बल्कि एवरेस्ट पर पहुँचने वाले छत्तीसवें इंसान के रूप में याद किया जाए। उसने अपनी सफलता का श्रेय अपने शेरपा साथी आंग शेरिंग के साथ साझा किया।

जीवन भर उसने पर्वतारोहण को कभी व्यवसाय नहीं बनाया. वह भाषणों और बच्चों को पढ़ाने से अपने अभियानों का खर्च जुटाती रही. अगले वर्षों में उसने सातों महाद्वीपों की सर्वोच्च चोटियों को फतह करने वाली पहली महिला बनने का गौरव भी प्राप्त किया.

2012 में उसे पेट के कैंसर का पता चला, लेकिन बीमारी भी उसकी जिजीविषा को नहीं तोड़ सकी। मृत्यु से कुछ महीने पहले 2016 में उसने एक बार फिर युवा पर्वतारोहियों के साथ माउंट फूजी की चढ़ाई की। उसी वर्ष अक्टूबर में उसका निधन हो गया।

दुनिया को नाटी दिखाई देने वाली वह स्त्री अपने जीवन में इतनी ऊँचाई तक पहुँच चुकी थी कि 2019 में प्लूटो ग्रह की एक पर्वत श्रृंखला का नाम उसके सम्मान में ताबेई मॉन्टेस रखा गया. यह उस छोटे कद वाली स्त्री की सबसे बड़ी विजय थी, जिसकी ऊँचाई किसी पैमाने से नहीं नापी जा सकती।

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Ashok Pande
Ashok Pandehttp://kabaadkhaana.blogspot.com
अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। उनका प्रकाशित उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।

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