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असल ज़िंदगी से फ़िल्मी पर्दे तक: लोंगेवाला के असली हीरो ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी

भारतीय सेना का इतिहास बहादुरी और कुर्बानी की अनगिनत दास्तानों से भरा हुआ है । लेकिन जब भी 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध का ज़िक्र होता है, तो लोंगेवाला की लड़ाई और ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी का नाम सबसे पहले याद किया जाता है। ये वो जंग थी जिसमें मुट्ठीभर भारतीय जवानों ने दुश्मन की बड़ी फौज और और टैंकों का घमंड चूर-चूर कर दिया था।

1971 युद्ध का बैकग्राउंड

साल 1971 में पाकिस्तान एक साथ दो बड़े संकटों का सामना कर रहा था। पूर्वी पाकिस्तान (जो आज बांग्लादेश है) में शेख़ मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में बगावत शुरू हो चुकी थी। मुक्ति वाहिनी के लड़ाके भारतीय सेना के समर्थन से आज़ादी की जंग लड़ रहे थे।

हालात लगातार बिगड़ रहे थे, इसलिए पाकिस्तानी फौज ने भारत की पश्चिमी सरहद, ख़ासकर राजस्थान और पंजाब में हमला करने की योजना बनाई। उसका मक़सद भारत का ध्यान पूर्वी मोर्चे से हटाकर पश्चिमी मोर्चे की तरफ लगाना था। पाकिस्तानी रणनीतिकारों को उम्मीद थी कि भारत अपनी फौज का बड़ा हिस्सा पूर्वी इलाके से हटाकर पश्चिम में भेज देगा।

Pic Credit: The Statesman

लोंगेवाला पोस्ट पर दुश्मन का हमला

4 और 5 दिसंबर 1971 की रात इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गई। जब पूरा देश गहरी नींद में था, तब राजस्थान के थार रेगिस्तान में स्थित लोंगेवाला पोस्ट पर पंजाब रेजिमेंट की 23वीं बटालियन के सिर्फ 120 जवान तैनात थे। उनकी कमान मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के हाथों में थी।

रात के सन्नाटे में अचानक टैंकों की गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी। सामने दुश्मन की बहुत बड़ी फौज थी। पाकिस्तान के पास 2,000 से ज़्यादा सैनिक, 50 शेरमन और टी-59 टैंक, साथ ही भारी हथियार मौजूद थे।

ऐसे मुश्किल हालात में मेजर चांदपुरी और उनके जवानों के सामने सिर्फ़ दो रास्ते थे। पहला, जैसलमेर के रामगढ़ की तरफ पीछे हट जाना। दूसरा, आख़िरी सांस तक दुश्मन का मुकाबला करना। एक सच्चे पंजाबी योद्धा की तरह मेजर चांदपुरी ने पीछे हटने के बजाय लड़ाई का रास्ता चुना। उन्होंने अपने जवानों का हौसला बढ़ाया और दुश्मन के सामने डटकर खड़े रहने का फैसला किया।

Pic Credit: Zee News

मेजर चांदपुरी की रणनीति

मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी अच्छी तरह जानते थे कि उनके जवान सीधे टैंकों से मुकाबला नहीं कर सकते। इसलिए उन्होंने जल्दबाज़ी करने के बजाय एक समझदारी भरी रणनीति बनाई। उन्होंने दुश्मन के टैंकों को पोस्ट के काफी करीब आने दिया। जब टैंक करीब 100 मीटर की दूरी पर पहुंच गए, तब भारतीय जवानों ने कंधे से चलाए जाने वाले एंटी-टैंक हथियारों से हमला शुरू कर दिया।

पहले ही हमले में पाकिस्तान के दो टैंक आग की लपटों में घिर गए, जबकि कई दूसरे टैंक रेगिस्तान की रेत में फंस गए। इससे दुश्मन की रफ्तार धीमी पड़ गई और उसका मनोबल भी कमज़ोर हुआ। मेजर चांदपुरी की एक और चाल भारत के हक में साबित हुई। भारतीय जवानों ने पोस्ट के चारों तरफ कांटेदार तार लगा रखी थी। अंधेरे में पाकिस्तानी फौज ने उसे बारूदी सुरंगों वाला इलाका समझ लिया। इस डर की वजह से पाकिस्तानी सैनिक करीब दो घंटे तक आगे नहीं बढ़ सके। यही दो घंटे भारतीय जवानों के लिए बहुत अहम साबित हुए और उन्हें अपनी पोजीशन मज़बूत करने का मौक़ा मिल गया।

Pic Credit: TOI

जब भारतीय वायुसेना ने पलटवार किया

सुबह होते ही भारतीय वायुसेना ने मोर्चा संभाल लिया। खुले रेगिस्तान में पाकिस्तानी टैंकों और गाड़ियों के पास छिपने की कोई जगह नहीं थी। ऐसे में वो भारतीय विमानों के लिए आसान निशाना बन गए। करीब छह घंटे तक चले इस ज़बरदस्त मुकाबले में पाकिस्तान को भारी नुकसान उठाना पड़ा। उसके 36 टैंक, 100 से ज़्यादा वाहन और बड़ी तादाद में सैनिक तबाह हो गए।

भारतीय सेना और वायुसेना के संयुक्त हमले के सामने पाकिस्तानी फौज ज़्यादा देर तक टिक नहीं सकी और आख़िरकार उसे पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। लोंगेवाला की ये जंग पूरी दुनिया में बहादुरी, हिम्मत और शानदार रणनीति की मिसाल बन गई। इस लड़ाई ने साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों और योजना सही हो, तो छोटी ताकत भी कहीं बड़ी फौज को शिकस्त दे सकती है।

Pic Credit: The Print

‘बॉर्डर’ फ़िल्म और अमर हो गई कहानी

साल 1997 में निर्देशक जे.पी. दत्ता ने लोंगेवाला की इस ऐतिहासिक जंग पर फ़िल्म बॉर्डर बनाई। फ़िल्म में अभिनेता सनी देओल ने मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी का किरदार निभाया। उनकी दमदार अदाकारी ने इस कहानी को देश के हर घर तक पहुंचा दिया। फ़िल्म के ज़रिए नई पीढ़ी को लोंगेवाला के असली हीरो के बारे में जानने का मौक़ा मिला।

ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी का जन्म 22 नवंबर 1940 को मोंटगोमरी (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। मद्रास की ऑफ़िसर्स ट्रेनिंग अकादमी से प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्हें साल 1963 में भारतीय सेना में कमीशन मिला। उन्होंने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी पश्चिमी मोर्चे पर अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा वो गाज़ा में संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की इमरजेंसी फोर्स के साथ भी तैनात रहे। उन्होंने मध्य प्रदेश स्थित इन्फैंट्री स्कूल में दो बार कॉम्बैट ट्रेनिंग इंस्ट्रक्टर के तौर पर भी अपनी सेवाएं दी।

Pic Credit: Muslim Mirror

देश के लिए दिखाई गई उनकी बहादुरी और शानदार नेतृत्व के लिए भारत सरकार ने उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया, जो देश का दूसरा सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार है। लंबी फौजी सेवा के बाद कुलदीप सिंह चांदपुरी ब्रिगेडियर के पद से रिटायर हुए। रिटायरमेंट के बाद वो चंडीगढ़ में बस गए और वहीं अपनी ज़िंदगी बिताई। 18 नवंबर 2018 को उनका निधन हो गया। आज भले ही ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी बहादुरी, हौसले और देशभक्ति की कहानी आने वाली कई पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

स्टोरी– मनमीत कौर

इस लेख को पंजाबी और अंग्रेज़ी में पढ़ें

ये भी पढ़ें: “अगर सौ जन्म मिलें, तो हर बार एयरफोर्स चुनूंगा”: AVM Hilal Ahmed Rather (Retd)

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