हर सिलाई एक कहानी कहती है, हर टांका एक जज्बात बयां करता है। यही तो है कांथा जो महज़ कढ़ाई नहीं, बल्कि बांग्ला की रूह है, भारतीय नारी की पहचान है, और सदियों की संस्कृति का आईना है।
आज 21वीं सदी में जब दुनिया फैशन के नए-नए शौक़ में डूबी है तब करीब 50,000 महिलाएं अपने घरों में बैठकर इसी कांथा कढ़ाई (Kantha Embroidery) को जिंदा रखे हुए हैं। ये महिलाएं इसे ‘घोरे बोसा कााज’ यानी घरेलू काम कहती हैं, मगर ये काम उनकी जिंदगी बदल रहा है। आर्थिक ताकत दे रहा है, सामाजिक मुकाम बख़्श रहा है, और क्रिएटिविटी को नई उड़ान दे रहा है।

हड़प्पा से लेकर आज तक का सफर
पुरातात्विक खोजों से पता चलता है कि हड़प्पा सभ्यता की खुदाई में जो सुइयां मिली हैं, वो इस बात की गवाह हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप पर कढ़ाई की कला हजारों साल पुरानी है।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी मां से बेटी तक ये हुनर पहुंचा। हर मोटिफ़ (बूटी), हर टांका, हर रंग अपने आप में एक सिंबल था, कोई दुआ थी तो कोई सुरक्षा का तावीज़, किसी ने प्यार का पैगाम भेजा तो किसी ने समाज पर तंज़ कसा।
बिना अक्षर जाने, बिना किताब पढ़े, इन सिलाइयों ने एक विज़ुअल ज़ुबान बनाई, जो बताती थी कि ये किस ज़मीन की है, किस समाज की है, किस संस्कृति की है।

जब फटे कपड़े बन गए क़ीमती धरोहर
कांथा (Kantha Embroidery) का जन्म एक ज़रूरत से हुआ, जब पुरानी साड़ियों और धोतियों को फेंकने की बजाय उन्हें परत-दर-परत बिछाकर, टांके से बांधकर, रज़ाई, चादर या ओढ़ने बनाए गए। कहीं इसे गुड़री कहते हैं, तो कहीं रल्ली, कहीं बिहार की सुजनी।
ये रिपरपज़िंग (Repurposing) की वो मिसाल है जो पर्यावरण को भी बचाती है और कला को भी। ख़ास बात ये कि जिन कपड़ों को इस्तेमाल किया जाता था, वो अक्सर किसी जाने-माने या मोहतरम शख्सियत के होते थे, जिससे उन कांथाओं की आध्यात्मिक कद्र और बढ़ जाती थी।

रवींद्रनाथ टैगोर की कविता में कांथा
विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी कविता ‘एबार फिराओ मोरे’ में लिखा है कि प्रभु बुद्ध, राजकुमार सिद्धार्थ, अपना शाही ठाठ-बाट छोड़कर, केवल एक “छिन्न कांथा” (फटी-पुरानी कांथा) ओढ़कर सत्य की खोज में निकल पड़े।
यानी ये जो कांथा है, ये वैराग्य की निशानी है, सादगी की मिसाल है, और आध्यात्मिकता का प्रतीक भी है। प्राचीन साहित्य में भी ‘जीर्ण कंथा’ की बात आती है, जो एक सादी, परत-दर-परत सिली हुई ओढ़नी मात्र है। मगर उसकी हैसियत कितनी बड़ी है।

कांथा की ज़मीन और उसका बंटवारा
कांथा कढ़ाई का मूल इलाक़ा अविभाजित बंगाल था जो आज के पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में बंटा हुआ है। लेकिन कंथा न सिर्फ इन दोनों इलाक़ों में जिंदा है, बल्कि अपनी पहचान भी बनाए हुए है।
लेकिन एक अफ़सोसनाक बात ये है कि कांथा की सबसे पुरानी मिसालें 19वीं सदी के आसपास ही उपलब्ध हैं। और इसकी एक बड़ी वजह ये है कि इन कांथाओं को इतना इस्तेमाल किया जाता था कि वो नाजुक (फ्रैजाइल) हो गईं, और बंगाल की गरम-नम जलवायु ने इनके संरक्षण में कोई मदद नहीं की। फिर भी, गुरुसादय दत्त (एक अंग्रेज़ अफ़सर जिसे देहाती कलाओं से गहरा लगाव था) और स्टेला क्रामरिश (मशहूर इंडोलॉजिस्ट) ने इन्हें इकट्ठा करके कांथा को सहेजा।

आज की महिलाएं, नया अफ़साना
आज कांथा सिर्फ एक पुरानी कला नहीं है, ये घरेलू उद्योग (होम-बेस्ड इंडस्ट्री) बन चुका है, जो देश और विदेश में अपनी पहचान बना रहा है। 50,000 महिलाएं इसके ज़रिए आत्मनिर्भर हो रही हैं।
कांथा अब उनकी मजबूरी नहीं, मुकाम है। उनके अंदर की रचनात्मकता नई बूटियां, नए डिज़ाइन, नई थीम्स गढ़ रही है। वो सिर्फ पुराने को दोहरा नहीं रहीं, बल्कि नए को जन्म दे रही हैं।

कांथा में बसती है दस्तान
कांथा सिखाती है कि कुछ भी बेकार नहीं है, हर टुकड़े में कहानी है, हर धागे में प्यार है, हर टांके में जज़्बा है। ये कढ़ाई नहीं, एक ज़ुबान है जो बिना बोले सब कुछ कह देती है। ये व्यापार नहीं, एक मुहब्बत है जो पीढ़ियों से सिली जा रही है।
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