समर चन्द ने अदब की दुनिया में “क़ैस जालंधरी” के तख़ल्लुस से शोहरत पाई। साल 1904 में पैदा हुए क़ैस साहब पंजाब के उन गिने-चुने शाइरों में शुमार होते हैं जिन्होंने बहुत कम उम्र में ही अपनी पहचान बना ली थी। उनकी शाइरी सिर्फ़ इश्क़-मोहब्बत के जज़्बात तक महदूद नहीं रही, बल्कि उसमें वतन-परस्ती, हक़ीक़त-पसंदी और गहरी फ़िक्र भी नज़र आती है।
शुरुआती ज़िंदगी
क़ैस जालंधरी नौजवानी ही में अदबी हलक़ों में मशहूर हो गए थे। उन्होंने शाइरी की बारीकियां दो बड़े उस्तादों से सीखीं।
आज़र जालंधरी: जालंधर के जाने-माने उस्ताद शाइर, जिनके शागिर्दों में उस दौर के कई नामी शाइर शामिल थे।
जोश मल्सियानी: पंजाब के मशहूर उस्ताद-शाइर, जो अपने ज़ोरदार अंदाज़-ए-बयां के लिए जाने जाते थे।
इन दोनों उस्तादों की सोहबत ने क़ैस साहब के कलाम को वो सलीक़ा और मियार बख़्शा, जो आगे चलकर उनकी पहचान बना।
सहाफ़त और आज़ादी की जद्दोजहद
क़ैस जालंधरी सिर्फ़ शाइर ही नहीं, एक सरगर्म सहाफ़ी (पत्रकार) भी थे। उस दौर में जब हिंदुस्तान अंग्रेज़ी हुकूमत की ग़ुलामी में जकड़ा था, बहुत-से शाइर और अदीब अपनी क़लम को आज़ादी की जंग का हथियार बना चुके थे। क़ैस साहब भी इसी क़तार में खड़े नज़र आते हैं। उन्होंने पत्रकारिता के ज़रिए भी आज़ादी की तहरीक से अपना नाता जोड़े रखा।
एक दिलचस्प बात यह भी है कि क़ैस जालंधरी सिर्फ़ उर्दू ही नहीं, अंग्रेज़ी ज़बान में भी शाइरी करते थे। यानी दो ज़बानों पर उनकी यकसां गिरफ़्त थी।
उनकी शाइरी का रंग
क़ैस जालंधरी के कलाम में तीन अलग-अलग रंग नज़र आते हैं, जो नीचे मौजूद तीन नज़्मों/अशआर में झलकते हैं।
1. वतन से मोहब्बत — “पंजाब हमारा” इस नज़्म में क़ैस साहब अपनी सरज़मीन पंजाब की तारीफ़ में डूब जाते हैं। वो कहते हैं कि पंजाब न सिर्फ़ तहज़ीब का रहनुमा और इल्म का सरचश्मा है, बल्कि यह जगह उनके लिए जन्नत से भी बढ़कर है। रब्त, इरफ़ान और फ़न — हर ऐतबार से पंजाब को वो सबसे ऊंचा दर्जा देते हैं।
तहज़ीब का रहबर है ये पंजाब हमारा
हर इल्म का मसदर है ये पंजाब हमारा
हर फ़न में मुअक़्क़र है ये पंजाब हमारा
इरफ़ां से मुनव्वर है ये पंजाब हमारा
जन्नत से भी बरतर है ये पंजाब हमारा
2. जोश और अलम-बरदारी का पैग़ाम दूसरे टुकड़े में लहजा बदल जाता है यह जंगी और हौसला-अफ़ज़ा अंदाज़ में लिखा गया है। शाइर अपनी क़ौम या फ़ौज को मुख़ातिब करते हुए कहता है कि अभी हथियार म्यान में रखने का वक़्त नहीं आया, दुश्मन का काम अभी तमाम नहीं हुआ, इसलिए वतन के मुहाफ़िज़ों को अभी आराम करने की इजाज़त नहीं। यह हिस्सा साफ़ ज़ाहिर करता है कि क़ैस साहब की शाइरी सिर्फ़ जज़्बाती नहीं, बल्कि मक़सद और जिद्दोजहद से भी जुड़ी थी।
न रख नियाम में रहने दे बे-नियाम अभी
तू इस को हाथ में कुछ देर और थाम अभी
3. फ़लसफ़ियाना अंदाज़ — हक़ीक़त और वहम का फ़र्क़ तीसरा हिस्सा एक गहरी, सोच में डुबो देने वाली बात कहता है। हर छोटी चीज़ में शाइर को पूरी कायनात का अक्स नज़र आता है, एक क़तरे में दरिया समाया दिखता है। मगर जब आंख खुलती है (यानी होश आता है), तो जो वहम लगता था वही असल हक़ीक़त निकलता है, और जो हक़ीक़त समझा गया था वो महज़ फ़रेब साबित होता है। यह शेर सूफ़ियाना और फ़लसफ़ियाना रंग लिए हुए है, जो इंसान की सोच और हक़ीक़त के दरमियान के उलझे हुए रिश्ते की तरफ़ इशारा करता है।
हर शय में मुझे कुल का तमाशा नज़र आया
क़तरा लिए आग़ोश में दरिया नज़र आया
पंजाब की उर्दू शाइरी में उनका मक़ाम
बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में जालंधर उर्दू अदब का एक अहम मरकज़ था। यहीं से हफ़ीज़ जालंधरी जैसे बड़े नाम भी उभरे, जिन्होंने आगे चलकर पाकिस्तान का क़ौमी तराना लिखा। क़ैस जालंधरी उसी अदबी माहौल की पैदावार थे, जहां शाइरी, सहाफ़त और सियासत एक-दूसरे से गुंथी हुई थीं। उनके उस्ताद आज़र जालंधरी और जोश मल्सियानी की शागिर्दी ने उन्हें उस रिवायत से जोड़ा जो क्लासिकी उर्दू शाइरी की तर्ज़ पर आधुनिक ख़यालात को भी जगह देती थी।
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