Monday, August 31, 2026
34 C
Delhi

Raksha Bhandan पर क्रोशिया राखियां बनाती निज़ामुद्दीन बस्ती की महिलाएं

Raksha Bhandan (रक्षाबंधन) पर आपने बाज़ारों में तरह-तरह की राखियां देखी होंगी। मोतियों और धागों से सजी राखियां और अलग-अलग डिज़ाइन वाली राखियां। लेकिन दिल्ली के निज़ामुद्दीन की बस्ती में तैयार होने वाली क्रोशिया राखियों की कहानी थोड़ी अलग है। राखियों का हर धागा सिर्फ़ भाई-बहन के रिश्ते की निशानी नहीं, बल्कि हुनर, मेहनत और आत्मनिर्भरता की कहानी भी कहता है।

इन्हें तैयार करने वाली महिलाओं के लिए ये राखियां सिर्फ़ एक प्रोडक्ट नहीं हैं। इनके ज़रिए उन्हें अपनी काबिलियत दिखाने, कमाई करने और अपनी ज़िंदगी से जुड़े फैसले ख़ुद लेने का मौक़ा मिला है। इन महिलाओं की इस कहानी का नाम है ‘Insha-e-Noor’ (इंशा-ए-नूर), जिसका मतलब है ‘रौशनी की रचना’ या creation of Light.

Source: Insha-e-Noor/IG

जहां विरासत के साथ बदली महिलाओं की ज़िंदगी

दिल्ली का निज़ामुद्दीन सिर्फ़ एक इलाका नहीं, बल्कि करीब 700 साल पुरानी तहज़ीब, संस्कृति और विरासत की पहचान है। यहां की गलियों, पुरानी इमारतों, खान-पान और दस्तकारी में इस इलाके की लंबी तारीख़ की झलक मिलती है। इसी विरासत के बीच निज़ामुद्दीन की महिलाओं के लिए एक नई शुरुआत हुई। साल 2007 में आगा ख़ान ट्रस्ट फॉर कल्चर (AKTC) ने निज़ामुद्दीन अर्बन रिन्यूअल इनिशिएटिव शुरू किया।

इसका मक़सद इलाके की पुरानी विरासत को बचाने के साथ-साथ स्थानीय लोगों की ज़िंदगी को बेहतर बनाना था। लेकिन इस दौरान एक और बड़ी ज़रूरत सामने आई। निज़ामुद्दीन बस्ती की सिर्फ़ 9 फ़ीसदी महिलाओं के पास अपनी कमाई का कोई ज़रिया था। कम तालीम, घर से बाहर जाने की सीमित आज़ादी और रोज़गार के कम मौकों की वजह से महिलाओं के लिए आर्थिक तौर पर अपने पैरों पर खड़ा होना आसान नहीं था।

Source: Insha-e-Noor/IG

कैसे हुई Insha-e-Noor की शुरूआत?

इस बीच सवाल था कि महिलाओं के लिए ऐसा कौन-सा रास्ता तैयार किया जाए, जो उनके माहौल और संस्कृति के मुताबिक हो और आगे चलकर उन्हें आत्मनिर्भर बनने में मदद करे। इसी सोच के साथ 2008 में कढ़ाई और सिलाई का ट्रेनिंग सेंटर शुरू किया गया। यहां महिलाओं को ऐसे हुनर सिखाए गए, जिनसे वो घर से ही काम करके कमाई कर सकें। कुछ सालों बाद जब कई महिलाएं इन हुनर में माहिर हो गई, तो उनके मन में एक नई ख़्वाहिश पैदा हुई—जो सीखा है, उससे कमाई भी की जाए।

यहीं से ‘Insha-e-Noor’ (इंशा-ए-नूर) के सफ़र की शुरुआत हुई। साल 2011 के दूसरे हिस्से में महिलाओं ने अपने हुनर से कमाई करने के लिए प्रोडक्ट बनाना शुरू किया। पहली बार वो करीब ₹40,000 का सामान लेकर दस्तकार नेचर बाज़ार पहुंची, जहां आधे से ज़्यादा प्रोडक्ट्स बिक गए। ये उनके लिए बड़ी खुशी और अपने हुनर पर भरोसे का पहला कदम था।

इसके बाद उन्हें बड़े रिटेल स्टोर्स और डिज़ाइन हाउस से ऑर्डर मिलने लगे। महिलाओं ने पेपर कटिंग मशीन चलाने, नोटबुक की बाइंडिंग और लैंप बनाने जैसे नए काम भी सीखे। धीरे-धीरे वो सिर्फ़ कारीगर नहीं रहीं, बल्कि बिज़नेस के फैसलों में भी अपनी हिस्सेदारी रखने लगीं। कोविड के दौरान कुछ मुश्किलें आई, लेकिन ‘Insha-e-Noor’ (इंशा-ए-नूर) का सफ़र जारी रहा। 2019 में इसे Producer Company के तौर पर रजिस्टर किया गया, जिसमें महिला कारीगर ही शेयरहोल्डर और डायरेक्टर हैं। आज इंशा-ए-नूर एक माइक्रो-एंटरप्राइज के तौर पर काम कर रहा है।

Source: Insha-e-Noor/IG

राखी में सिर्फ़ धागे नहीं, एक कहानी भी है

आज ‘Insha-e-Noor’ (इंशा-ए-नूर) में महिलाएं सांझी, आरी कढ़ाई और क्रोशिया जैसे पारंपरिक हुनर से कपड़े और कागज़ के ख़ूबसूरत प्रोडक्ट तैयार करती हैं। इनके डिज़ाइन में निज़ामुद्दीन की सदियों पुरानी संस्कृति और वास्तुकला की झलक दिखाई देती है। Raksha Bhandan (रक्षाबंधन) पर इन्हीं हाथों से तैयार होती हैं खूबसूरत क्रोशिया राखियां। एक-एक धागे को हाथ से जोड़ना, उसे सही शक्ल देना और फिर एक खूबसूरत राखी तैयार करना। ये पूरा काम हुनर और सब्र मांगता है।

लेकिन जब यही राखी किसी भाई की कलाई पर बंधती है, तो उसके साथ उस महिला कारीगर की मेहनत और उम्मीद भी उस रिश्ते का हिस्सा बन जाती है। इन राखियों की ख़ासियत सिर्फ़ उनका डिज़ाइन नहीं है। इनकी असली खूबसूरती उस कहानी में है, जो इनके पीछे छिपी है। कभी जिन महिलाओं के पास अपनी कमाई का कोई ज़रिया नहीं था, आज वही महिलाएं अपने हुनर से एक बिज़नेस चला रही हैं। वो प्रोडक्ट बना रही हैं, ऑर्डर पूरा कर रही हैं और अपने कारोबार से जुड़े फैसले भी ले रही हैं।

Source: Insha-e-Noor/IG

विरासत से आत्मनिर्भरता तक

‘Insha-e-Noor’ (इंशा-ए-नूर) का मक़सद सिर्फ़ हैंडीक्राफ्ट तैयार करना नहीं है। इसका असल मक़सद निज़ामुद्दीन की महिलाओं के लिए सम्मानजनक और लगातार बनी रहने वाली आमदनी का ज़रिया तैयार करना है। ये कहानी बताती है कि किसी इलाके की विरासत सिर्फ़ उसकी पुरानी इमारतों में नहीं होती। उसकी असली रूह वहां रहने वाले लोगों के हुनर, उनकी मेहनत और उनकी कहानियों में भी होती है।

निज़ामुद्दीन की इन महिलाओं ने अपने हुनर के धागों से सिर्फ़ राखियां नहीं बुनी, बल्कि अपने लिए एक नई पहचान भी बुनी है। इस Raksha Bhandan (रक्षाबंधन) जब किसी भाई की कलाई पर इंशा-ए-नूर की राखी बंधेगी, तो उसके साथ एक बहन का प्यार ही नहीं, बल्कि एक महिला कारीगर की मेहनत, उम्मीद और आत्मनिर्भरता की कहानी भी बंधेगी। यही है इंशा-ए-नूर की असली रौशनी एक ऐसी रौशनी, जो हुनर से पैदा हुई और अब कई ज़िंदगियों को रोशन कर रही है।

ये भी पढ़ें: कश्मीर की सायका राशिद: पेशे से इंजीनियर दिल से कैलीग्राफी आर्टिस्ट

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

इफ़्तिख़ार आरिफ़: शायरी में हिजरत, मोहब्बत और रूहानियत की दास्तान

उर्दू शायरी में कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जो...

असग़र गोंडवी: शायरी में मोहब्बत, तसव्वुफ़ और ज़िंदगी की रौशन फ़िक्र

उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ शायर ऐसे होते...

बेग़म अख़्तर का शायर

श्रीनगर में अप्रैल 1969 की एक दोपहर जब बरसात...

जमीलुद्दीन आली: दोहों से उर्दू अदब को नया रंग देने वाले शायर

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ शायर ऐसे गुज़रे...

Topics

बेग़म अख़्तर का शायर

श्रीनगर में अप्रैल 1969 की एक दोपहर जब बरसात...

जमीलुद्दीन आली: दोहों से उर्दू अदब को नया रंग देने वाले शायर

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ शायर ऐसे गुज़रे...

मुनीर शिकोहाबादी: 1857 की क्रांति और शायरी की बुलंद आवाज़

उत्तर प्रदेश के फिरोज़ाबाद ज़िले में बसा शिकोहाबाद सिर्फ़...

Related Articles

Popular Categories