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कालीघाट पेंटिंग: जब ब्रश ने समाज का आईना बनकर इतिहास लिखा

कलकत्ता (कोलकाता) के कालीघाट मंदिर (The Kalighat Temple in Kolkata) के आस-पास 19वीं सदी में जन्मी कालीघाट पेंटिंग (Kalighat painting) ने भारतीय लोककला को एक नई पहचान दी। पटुआ कहलाने वाले कलाकार,जो पहले गांव-गांव घूमकर पोथियां (Long scroll painting) दिखाते थे, अब शहर आकर बस गए। उन्होंने अपनी कला को बदलते ज़माने के हिसाब से ढाला। लंबी कहानियों की जगह एक ही फ्रेम में कम शब्दों में बड़ी बात कहने की कला सीखी। 

Image-Wikipedia

इसकी सबसे ख़ास बात ये है कि ये पेंटिंग उस दौर की बेहद तेज़ी से बनती थीं। एक कलाकार लाइन खींचता, तो दूसरा रंग भरता। इस तरह एक घंटे में 200-300 पेंटिंग बन जाती थीं।  

कला की ज़बान

कालीघाट पेंटिंग की सबसे बड़ी ख़ासियत है इसकी सादगी और गहराई। गहरे रंगों की मोटी लकीरें, खाली पृष्ठभूमि, और कुछ ही रंगों का इस्तेमाल। यही इस शैली की पहचान है। कलाकारों ने अपनी पेंटिंग्स में देवी-देवताओं के साथ-साथ रोज़मर्रा की ज़िंदगी, सामाजिक बुराइयां और बदलते संस्कारों को भी उतारा।

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महिलाएं: कला का सेंटर

कालीघाट पेंटिंग में महिलाओं की मौजूदगी बेहद अहम है। एक तरफ दुर्गा,काली, सरस्वती जैसी देवियां हैं, तो दूसरी तरफ आम औरतें, कहीं वे अपने श्रृंगार में मशगूल हैं, तो कहीं हुक्का पीती नज़र आती हैं। ये तस्वीरें 19वीं सदी के बंगाल में महिलाओं की बदलती हैसियत की गवाह हैं।

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व्यंग्य और मौज-मस्ती

कालीघाट पेंटिंग सिर्फ गंभीर विषयों तक सीमित नहीं थी। कलाकारों ने बाबू संस्कृति पर जमकर चोट की। वे नए-नए अंग्रेज़ी ढंग अपनाने वाले बंगाली बाबुओं का मज़ाक उड़ाते थे। एक तस्वीर में बिल्ली को झींगा चुराते दिखाया गया है, जो ‘झूठे साधु’ पर एक करारा व्यंग्य है।

कलाकार: जिन्होंने इतिहास रचा

इन पेंटिंग्स के ज़्यादातर कलाकार गुमनाम रहे, लेकिन कुछ ने अपनी पहचान बनाई। जैसे निबारन चंद्र घोष और काली चरण घोष। इन भाइयों ने 19वीं सदी के आख़िर में कालीघाट शैली को नई ऊंचाई दी।

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दुनिया भर में कालीघाट

आज कालीघाट पेंटिंग्स दुनिया भर के बड़े म्यूज़ियम की शान हैं। लंदन का Victoria and Albert Museum अपने 645 पेंटिंग्स के कलेक्शन के लिए मशहूर है।ऑक्सफोर्ड, मॉस्को, प्राग, फिलाडेल्फिया। हर जगह इन कलाकृतियों को सहेज कर रखा गया है।

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कालीघाट पेंटिंग सिर्फ कला नहीं, बल्कि एक जमाने का आईना है। इसमें हमें उस दौर की धड़कनें सुनाई देती हैं। जब भारत बदल रहा था, जब पुरानी और नई संस्कृतियां आमने-सामने थीं, और जब औरतों की हैसियत पर बहस छिड़ी हुई थी। ये कला हमें सिखाती है कि कैसे आम लोग अपनी ज़बान में इतिहास लिख सकते हैं, और कैसे एक मंदिर के बाहर बैठे अनजान कलाकारों ने कला की दुनिया में एक मिसाल क़ायम की।

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