जब पूरा देश अपनी आज़ादी की 80वीं सालगिरह मनाने को बेकरार है, तब कोलकाता (Kolkata) के दो बड़े म्यूज़ियम (Museum) ने अपनी तिजोरियां खोल दी हैं। ये महज़ इमारतें नहीं, बल्कि हमारी माटी की आवाज़ हैं, जो हमें बताती हैं कि हम कहां से आए और कैसे बने। इंडियन म्यूज़ियम और विक्टोरिया मेमोरियल हॉल (Indian Museum and Victoria Memorial Hall) ने दो अनोखी एग्ज़िबिशन लगाई हैं, जो एक तरफ हमारी 5000 साल पुरानी सभ्यता को तो दूसरी तरफ आज़ादी की जंग को सलाम करती हैं।
भारत भाग्य विधाता: भूमि, विरासत और जीवित परंपरा
पहली एग्ज़िबिशन का नाम है ‘भारत भाग्य विधाता: भूमि, विरासत और जीवित परंपरा’। ये प्रदर्शनी हमें सिंधु घाटी की गलियों में ले जाती है, जहां हड़प्पा के लोग नालियां, ईंटें और व्यापार के पक्के रास्ते बना चुके थे। वहां से ये सफ़र बुद्ध के ज्ञान की ओर मुड़ता है, फिर शैव और शाक्त परंपराओं की उस गहराई में जाता है, जहां देवी-देवताओं के साथ आम आदमी की बस्तियां जुड़ी थीं। ये प्रदर्शनी किसी एक लीनियर नैरेटिव पर नहीं चलती, बल्कि भारत को एक लिविंग हेरिटेज के तौर में पेश करती है, जहां सैकड़ों समुदाय, बोलियां और धाराएं मिलकर एक महासागर बन गईं। ये वो क़ाया है जिसमें हर क़ौम, हर जाति और हर ख़्याल ने अपनी रूह डाली है।

भारत: एक राष्ट्र का निर्माण
लेकिन अगर आप मैदान पार करके विक्टोरिया मेमोरियल हॉल पहुंचें, तो वहां एक अलग ही दास्तान सुनाई देती है। ‘भारत: एक राष्ट्र का निर्माण’। ये प्रदर्शनी वो बात करती है, जो हमारी किताबों में भी शायद ही हो। इसमें वो चीज़ें पहली बार दिख रही हैं, जो VMH के रिज़र्व कलेक्शन में बंद थीं। यहां रवि वर्मा प्रेस की एक ओलियोग्राफ़ (Printed artwork) है, जिसमें छत्रपति शिवाजी महाराज घोड़े पर सवार हैं और उनकी सेना पीछे। ये तस्वीर अपने आप में ‘बहादुरी और इंकलाब’ की ज़िंदा मिसाल है। इसी बगल में ‘भारत माता’ का वो चित्र है,जो एक हाथ में तिरंगा लिए खड़ी हैं और उनके साथ शेर और हाथी हैं। यानी ‘शक्ति और साहस’ का वो पैग़ाम, जो क़ौम को जगाता है।
इंकलाबी और रोशन ख़्यालों से तर कलाकृतियां
इस प्रदर्शनी की ख़ास बात तीन वो कलाकृतियां हैं, जो आत्मनिर्भर कलाकार अतुल बोस ने बनाईं। उनमें एक पेंसिल स्केच है राजा राममोहन राय का, जिन्होंने सामाजिक क्रांति की नींव रखी। फिर नेताजी सुभाष चंद्र बोस का वो पेंसिल पोर्ट्रेट, जिनकी आंखों में आज़ादी की चिंगारी थी, और स्वामी विवेकानंद की 1952 में बनी छाती तक ऑइल पेंटिंग। ये तीनों ही उस दौर के इंकलाबी और रोशन ख़्यालों की अलामत हैं।
इन दोनों अजायबघरों को जोड़ने वाली एक रस्सी है ‘हर घर तिरंगा’ अभियान। इस साल वंदे मातरम को 150 साल हो चुके हैं, और इन प्रदर्शनियों में वंदे मातरम का ज़िक्र ऐसे किया गया है जैसे वो महज़ एक गाना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना की आवाज़ है। भारतीय संग्रहालय तो एक हफ़्ते भर के कार्यक्रम भी चला रहा है, जिसमें ‘संथाल बिद्रोह’ पर ख़ास परफ़ॉर्मेंस होगी, पार्टीशन हॉरर्स को याद किया जाएगा, और स्कूली बच्चों से बातचीत होगी। ताकि ये तारीख़ उनके ज़हन में हमेशा बसी रहे।

डॉ. सयान भट्टाचार्य, जो इंडियन म्यूज़ियम के डायरेक्टर और VMH के सेक्रेटरी ने मीडिया को बताया कि ‘ये प्रदर्शनियां और उनसे जुड़ी गतिविधियां उन यादों, ख़्यालों और साझा विरासत को फिर से खोजने का ज़रिया हैं, जो हमें एक सूत्र में पिरोती हैं।’
सदियों पुराना चेहरा दिखाने वाला आइना
तो ये महज़ प्रदर्शनी नहीं, बल्कि एक ‘एहसास’ है। एक ऐसा आईना, जिसमें हम अपना ‘सदी-पुराना चेहरा’ देख सकते हैं, और साथ ही, उस ‘नए भारत’ को भी जो इन्हीं जड़ों से उगकर आसमान छू रहा है। आज़ादी के 80 साल मायने रखते हैं, लेकिन ये अजायबघर हमें बताते हैं कि हमारी आज़ादी महज़ 1947 में नहीं, बल्कि सिंधु की मिट्टी में दबे हुए हड़प्पा के हर कंकड़ में और विक्टोरिया मेमोरियल की हर पेंटिंग में बसी है।
ये है हमारी असली ‘जंग-ए-आज़ादी’, जो कभी ख़त्म नहीं होती, बस नए रूपों में ज़िंदा रहती है। ये दीदार हर हिंदुस्तानी को करना चाहिए ताकि अपने अतीत के उस मेले में शामिल हो सकें, जहां हर शख़्स, हर ख़्याल और हर इंक़लाब एक साथ मौजूद है।
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