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ग़ालिब की ग़ज़ल से गुरु नानक की बाणी तक, सुरों में समाया पूरा हिंदुस्तान- कौन थी M.S. Subbulakshmi?

महज़ 10 साल की उम्र में पहली सॉन्ग रिकॉर्डिंग। उस छोटी-सी बच्ची को शायद तब अंदाज़ा भी नहीं रहा होगा कि उसकी आवाज़ एक दिन पूरे हिंदुस्तान के दिलों में उतर जाएगी। एक ऐसी आवाज़, जिसमें सुरों की मिठास थी, भक्ति की गहराई थी और संगीत के लिए एक अनोखा जज़्बा था। ये कहानी है M.S. Subbulakshmi (एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी) की, जिन्हें लोग प्यार से ‘एमएस अम्मा’ भी कहते थे। वो पहली भारतीय थीं जिन्होंने 1966 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संगीत का जादू बिखेरा था।

16 सितंबर 1916 को तमिलनाडु के मदुरै में पैदा हुई मदुरै शनमुखावदिवु M.S. Subbulakshmi (एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी) ने बहुत छोटी उम्र में संगीत की दुनिया में कदम रखा। महज़ 5 साल की उम्र में उन्होंने शास्त्रीय संगीत की तालीम शुरू कर दी थी। 8 साल की उम्र में मंच पर गाना शुरू किया और 10 साल की उम्र में अपनी पहली रिकॉर्डिंग कराई। इतनी कम उम्र में उनकी आवाज़ ने लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचना शुरू कर दिया था। लेकिन ये तो उनके लंबे और यादगार सफ़र की शुरुआत भर थी।

जिस आवाज़ को किसी ने देवी कहा, किसी ने आठवां सुर

M.S. Subbulakshmi (एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी) का संगीत सिर्फ़ गाने तक महदूद नहीं था। उनके लिए सुर एक एहसास थे, एक साधना थी। उन्होंने कर्नाटक शास्त्रीय संगीत को अपनी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बनाया और धीरे-धीरे अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनकी गायकी में ऐसी मिठास थी, जो सुनने वाले को अपने साथ बहा ले जाती थी। चाहे सामने संगीत का कोई जानकार हो या फिर कोई आम शख़्स, उनकी आवाज़ हर किसी के दिल तक पहुंचती थी। यही वजह थी कि देश के बड़े-बड़े संगीतकारों और कलाकारों ने उनकी गायकी का लोहा माना।

Source: Matrka/ T.M. Krishna

उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान ने उन्हें ‘शुद्ध स्वरों की देवी’ कहा। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें ‘संगीत की रानी’ के ख़िताब से नवाज़ा। वहीं, लता मंगेशकर ने उन्हें ‘तपस्विनी’ कहा। किशोरी आमोनकर ने उनकी आवाज़ को ‘आठवां सुर’ बताया। ये उपाधियां सिर्फ़ तारीफ़ के शब्द नहीं थीं, बल्कि उनके संगीत के असर की एक झलक थी।

जब सुरों की दुनिया से सिनेमा तक पहुंची

एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी की पहचान सिर्फ़ एक गायिका के तौर पर नहीं बनी। उन्होंने अभिनय की दुनिया में भी अपनी जगह बनाई। साल 1938 में आई तमिल फ़िल्म ‘सेवासदन’ से उन्होंने अपने फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने 1940 में ‘शकुंतला’ और 1941 में ‘सावित्री’ जैसी फ़िल्मों में काम किया। साल 1945 में आई फ़िल्म ‘मीरा’ ने उन्हें देशभर में एक नई पहचान दिलाई। ‘मीरा’ की लोकप्रियता को देखते हुए साल 1947 में इसका हिंदी रूप ‘मीराबाई’ बनाया गया।

इस फ़िल्म के ज़रिए सुब्बुलक्ष्मी की आवाज़ और अभिनय हिन्दी भाषी दर्शकों तक भी पहुंची। लेकिन फ़िल्मी दुनिया की शोहरत के बीच सुब्बुलक्ष्मी ने एक अहम फ़ैसला लिया। उन्होंने तय किया कि अब वो अपना पूरा ध्यान संगीत को देंगी। बड़े पर्दे की चमक-दमक से दूर होकर उन्होंने कर्नाटक संगीत को अपनी ज़िंदगी का मक़सद बना लिया।

Source: Msstribute.org

फ़िल्म की कमाई से शुरू हुई एक पत्रिका

M.S. Subbulakshmi (एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी) का सफ़र सिर्फ़ मंच और स्टूडियो तक नहीं था। उनकी ज़िंदगी में संगीत के साथ सामाजिक ज़िम्मेदारी और दूसरों के लिए कुछ करने की भावना भी दिखाई देती है। साल 1941 में सदाशिवम और कल्कि कृष्णमूर्ति ने अपनी पत्रिका ‘कल्कि’ शुरू करने का फ़ैसला किया। लेकिन पत्रिका के प्रकाशन के लिए पैसों की ज़रूरत थी। ऐसे वक्त में M.S. Subbulakshmi (एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी) ने अपनी फ़िल्म से मिली उनकी कमाई का इस्तेमाल ‘कल्कि’ पत्रिका शुरू करने के लिए किया गया। ये घटना दिखाती है कि उनके लिए कला सिर्फ़ अपनी पहचान बनाने का ज़रिया नहीं थी। वो अपनी कला और मेहनत से ऐसे कामों का हिस्सा भी बनना चाहती थी, जिसका असर समाज पर पड़े।

आज़ादी के दौर में जब उनकी आवाज़ ने निभाई ज़िम्मेदारी

जब देश आज़ादी की लड़ाई के दौर से गुज़र रहा था, तब M.S. Subbulakshmi (एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी) ने अपने संगीत के ज़रिए कई सामाजिक और चैरिटी कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। साल 1944 में उन्होंने कस्तूरबा गांधी नेशनल मेमोरियल ट्रस्ट के लिए फंड जुटाने वाले कार्यक्रमों में गाया। उन्होंने ऐसे कई कार्यक्रमों में अपनी आवाज़ दी, जिनका मक़सद लोगों की मदद के लिए पैसे जुटाना था। उनका संगीत किसी एक भाषा या एक परंपरा तक महदूद नहीं था।

उन्होंने मीराबाई, तुकाराम और गुरु नानक की रचनाओं को भी अपनी आवाज़ दी। कहा जाता है कि मशहूर गायिका बेगम अख़्तर ने उन्हें मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल ‘इशरत-ए-क़तरा’ सिखाई थी। सुब्बुलक्ष्मी ने बाद में इसे अपने अंदाज़ में पेश किया। ये उनके संगीत की उस ख़ूबसूरती को दिखाता है, जिसमें अलग-अलग भाषाओं, परंपराओं और भावनाओं के लिए जगह थी।

Source: Msstribute.org

पहली रिकॉर्डिंग से भारत रत्न तक

M.S. Subbulakshmi (एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी) को अपने संगीत के लिए देश और दुनिया के कई बड़े सम्मान मिले। रेमन मैग्सेसे पुरस्कार पाने वाली वो पहली भारतीय संगीतकार हैं। साल 1954 में उन्हें पद्मभूषण, 1956 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 1968 में संगीत कलानिधि से नवाज़ा गया। इसके अलावा 1975 में पद्म विभूषण और 1990 में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार भी मिला। साल 1998 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाज़ा गया। साल 2005 में सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया। 11 दिसंबर

2004 को 88 साल की उम्र में M.S. Subbulakshmi (एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी) इस दुनिया से रुख़सत हुई। लेकिन उनकी आवाज़ आज भी संगीत प्रेमियों के बीच ज़िंदा है। एक बच्ची, जिसने 10 साल की उम्र में पहली रिकॉर्डिंग की थी, आगे चलकर हिंदुस्तान की संगीत परंपरा का ऐसा हिस्सा बनी, जिसे भुला पाना आसान नहीं। सुब्बुलक्ष्मी का सफ़र हमें याद दिलाता है कि जब हुनर के साथ लगन, सादगी और दूसरों के लिए कुछ करने का जज़्बा जुड़ जाए, तो आवाज़ सिर्फ़ सुनी नहीं जाती वो लोगों के दिलों में बस जाती है।

ये भी पढ़ें- बेगम रुक़ैया सख़ावत हुसैन: मुस्लिम महिलाओं के लिए स्कूल खोलने वाली महिला

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