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राज कुमार पथरिया: फ़िज़िक्स का उस्ताद, जिसके अंदर छिपा बैठा था एक शायर

राज कुमार पथरिया एक ऐसे फ़िज़िक्स के उस्ताद थे, जिनके अंदर एक शायर भी छिपा बैठा था। 30 मार्च 1933 को अमृतसर में, एक मामूली मिडिल-क्लास पंजाबी घर में उनका जन्म हुआ। मां-बाप थे रामजी दास पथरिया और मेला देवी। मोहल्ले के स्कूल से पढ़ाई शुरू हुई, फिर अमृतसर के हिंदू कॉलेज में दाख़िला लिया, जहां 1950 में ही उनका नाम ‘ऑनर लिस्ट’ में आ गया था। यानी शुरू से ही ज़हीन थे।

1953 और 1954 में पंजाब यूनिवर्सिटी, होशियारपुर से बी.एससी. और एम.एससी. ऑनर्स की डिग्रियां लीं। इसके फ़ौरन बाद प्रोफ़ेसर एफ़.सी. औलक के बुलावे पर दिल्ली यूनिवर्सिटी पहुंचे और पीएच.डी. की, जो मार्च 1957 में पूरी हुई। 1958 में वहीं लेक्चरर बने और सिर्फ़ तीन साल में रीडर बन गए। फिर 1964 में कनाडा चले गए- हैमिल्टन शहर की मैकमास्टर यूनिवर्सिटी में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर बनकर। यहीं से एक सिलसिला शुरू हुआ जो पूरी ज़िंदगी चला। कभी हिंदुस्तान लौटना, कभी वापस कनाडा जाना। 1967 में चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी में थ्योरेटिकल फ़िज़िक्स के प्रोफ़ेसर बने, फिर 1969 में दोबारा कनाडा गए, जहां वाटरलू और विंडसर यूनिवर्सिटी में पढ़ाया।

दिल्ली में उनका असल विषय था स्टैटिस्टिकल मैकेनिक्स, मगर उसी दौर में उन्हें रिलेटिविटी से भी लगाव हो गया, और 1963 में उन्होंने अपनी पहली किताब ‘द थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी’ लिखी। किताब को ख़ूब सराहा गया, ख़ासकर इस विषय के मशहूर आलिम प्रोफ़ेसर विलियम मैक्क्रे ने तारीफ़ की। 1974 में ऑक्सफ़ोर्ड के पर्गामन प्रेस ने इसका दूसरा एडिशन निकाला, और 2003 में न्यूयॉर्क के मशहूर डोवर पब्लिकेशंस ने इसे अपनी फ़ेहरिस्त में शामिल किया। जो अपने आप में एक बड़ा सम्मान माना जाता है।

लेकिन जिस किताब ने उनका नाम हमेशा के लिए दर्ज कर दिया, वो थी 1972 में छपी ‘स्टैटिस्टिकल मैकेनिक्स’। आसान लफ़्ज़ों में समझें तो ये विषय बताता है कि जब किसी जगह करोड़ों-अरबों छोटे-छोटे ज़र्रे इकट्ठा हों  जैसे किसी बर्तन में पानी या गैस। तो उनका मिलाजुला मिज़ाज कैसे समझा जाए, यानी पानी उबलकर भाप क्यों बनता है, या कोई धातु गर्म होकर अपना मक़नातीसी गुण क्यों खो बैठती है। यह किताब आज भी दुनिया भर में एम.एससी. और पीएच.डी. के छात्रों के लिए बुनियादी किताब मानी जाती है। नब्बे के दशक में नए पब्लिशर ने दूसरा एडिशन निकलवाया, जिसमें उनके पुराने शागिर्द सुरजीत सिंह ने साथ दिया, और 1996 में यह एडिशन भी ख़ूब चला। 1998 में वाटरलू से रिटायर होने के बाद वे अमरीका गए और सैन डिएगो की यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया में 2010 तक पढ़ाते रहे। 2011 में तीसरा और 2021 में, यानी 88 साल की उम्र में, चौथा एडिशन भी छपवाया।

अपने करियर में उन्होंने 110 से ज़्यादा रिसर्च पेपर लिखे, जिनमें तरल हीलियम में सुपरफ़्लुइडिटी, फ़ेज़ ट्रांज़िशन में फ़ाइनाइट-साइज़ इफ़ेक्ट्स, और रिलेटिविटी-कॉस्मोलॉजी जैसे विषय शामिल हैं। 1976 में अमेरिकन फ़िज़िकल सोसाइटी की फ़ेलोशिप मिली, और वाटरलू यूनिवर्सिटी ने उन्हें ‘डिस्टिंग्विश्ड टीचर अवॉर्ड’ (1977) और ‘डिस्टिंग्विश्ड प्रोफ़ेसर एमेरिटस’ (1999) के ख़िताब से नवाज़ा।

निजी ज़िंदगी में उनकी शादी अपनी ही पुरानी शागिर्द राज कुमारी (गुलाटी) से हुई थी। उनके दो बेटियां, एक बेटा और पांच नाती-पोते थे, हालांकि 2011 में उनकी छोटी बेटी का कैंसर से इंतक़ाल हो गया था, जो एक गहरा सदमा रहा।

सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि बचपन से उर्दू शायरी के माहौल में पले पथरिया ने ख़ुद शायरी लिखना तक़रीबन 1993 में, यानी रिटायरमेंट के क़रीब जाकर शुरू किया। उन्होंने तख़ल्लुस रखा ‘क़ैस’ — वही नाम जो लैला के आशिक़ मजनूं का असली नाम था और उनकी ग़ज़लों का संग्रह ‘सहरा सहरा’ के नाम से मशहूर हुआ। एक तरफ़ ज़र्रों का हिसाब लगाने वाला दिमाग़, दूसरी तरफ़ दिल की बात कहने वाला क़लम  दोनों में उन्होंने बराबर कमाल दिखाया।

7 जनवरी 2026 को, 92 साल की उम्र में, राज कुमार पथरिया का निधन हो गया। पीछे छोड़ गए एक किताब जो आज भी पढ़ाई जाती है, और एक शायरी का संग्रह जो आज भी पढ़ा जाता है।

ये भी पढ़ें: राबिया बसरी: मोहब्बत-ए-इलाही की पहली सूफ़ी शायरा 

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