Tuesday, September 1, 2026
33 C
Delhi

राबिया बसरी: मोहब्बत-ए-इलाही की पहली सूफ़ी शायरा 

तसव्वुफ़ की तारीख़ में अगर किसी एक नाम को सबसे ज़्यादा एहतिराम (सम्मान) के साथ लिया जाता है, तो वह नाम है राबिया बसरी का। एक ऐसी औरत, जो पैदा हुई थी ग़रीबी की गोद में, पली-बढ़ी ग़ुलामी की क़ैद में, मगर जिसने अपनी रूहानियत की बुलंदी से पूरी दुनिया को हैरान कर दिया। कहा जाता है कि इश्क़-ए-इलाही (ईश्वर के प्रति प्रेम) का जो फ़लसफ़ा आगे चलकर पूरे तसव्वुफ़ की बुनियाद बना, उसकी शुरुआत करने वाली शख़्सियत राबिया ही थीं।

कासनी रंग के ख़्वाबों से निकल आई हूं
मीठे पानी के सराबों से निकल आई हूं

पैदाइश और मुश्किलों भरा बचपन

राबिया बसरी की पैदाइश तक़रीबन 717 ईसवी में इराक़ के शहर बसरा में हुई। वो अपने मां-बाप की चौथी औलाद थीं, और यही वजह है कि उनका नाम “राबिया” रखा गया, जिसका मतलब होता है “चौथी”।

तू ने जाते हुए इक बार भी देखा न उसे
वो जो कहती थी अज़ाबों से निकल आई हूं

उनका बचपन बेहद तक़लीफ़देह गुज़रा। कम उम्र में ही उनके मां-बाप का इंतक़ाल हो गया, और उसी दौरान बसरा में एक भयंकर अकाल पड़ा, जिसकी वजह से वो अपनी बहनों से भी बिछड़ गईं। बाद में उन्हें ग़ुलाम के तौर पर बेच दिया गया। रवायत के मुताबिक़, दिन में वो अपने मालिक के घर का काम करतीं और रात होते ही ख़ुदा की इबादत में मशग़ूल हो जातीं। एक रात उनके मालिक ने उन्हें एक अनोखे नूर (रोशनी) से घिरा हुआ इबादत करते देखा। इस मंज़र ने उसे इतना मुतास्सिर किया कि अगली ही सुबह उसने राबिया को आज़ाद कर दिया।

तुझे मीरास में हिजरत मिली है
तभी तो ला-मकानी है संभल जा

दुनिया से बेनियाज़, ख़ुदा से बेइंतिहा मोहब्बत

आज़ादी के बाद राबिया ने अपनी पूरी ज़िंदगी सिर्फ़ इबादत और ख़ुदा की याद में गुज़ार दी। उन्होंने कभी शादी नहीं की। उनके पास शादी के कई पैग़ाम आए, मगर उन्होंने हर बार यही जवाब दिया कि उनके पास अपने ख़ुदा के अलावा किसी और चीज़ के लिए वक़्त ही नहीं। उनकी मोहब्बत इतनी गहरी थी कि वो कहा करती थीं उनके दिल में ख़ुदा के इश्क़ ने इतनी जगह ले ली है कि शैतान से नफ़रत करने के लिए भी कोई गुंजाइश नहीं बची।

राबिया की ज़िंदगी हमेशा फ़क़ीराना ही रही। जब 80 साल की उम्र में उनका इंतक़ाल हुआ, तो उनकी कुल जायदाद में एक टूटी चटाई, एक मिट्टी का घड़ा और एक साधारण बिस्तर था यही उनकी इबादत और ज़िंदगी का सरमाया था।

तसव्वुफ़ में उनका मक़ाम

राबिया को इराक़ की पहली महिला सूफ़ी संत माना जाता है। उन्होंने अपने दौर के मर्द सूफ़ियों की भी आलोचना करने से गुरेज़ नहीं किया और आने वाली नस्लों की औरत सूफ़ियों के लिए एक नया रास्ता खोला। इतिहासकारों के मुताबिक़, उनकी सबसे बड़ी देन यह मानी जाती है कि उन्होंने इबादत को डर या इनाम की उम्मीद से नहीं, बल्कि ख़ालिस मोहब्बत से जोड़ा। यही फ़लसफ़ा बाद में “इश्क़-ए-इलाही” के नाम से मशहूर हुआ।

कान लगा के सुनती क्या है
क्या दीवार में दर रक्खा है

अब बात करते हैं उस पहलू की, जिसे लेकर अक्सर उलझन रहती है राबिया की शायरी।

तारीख़ी तहक़ीक़ (रिसर्च) बताती है कि आज जो भी अशआर या कलाम राबिया के नाम से मशहूर हैं, उनमें से ज़्यादातर के असल स्रोत का कोई पुख़्ता सुबूत मौजूद नहीं। मुहक़्क़िक़ रक़िया एलारौई कॉर्नेल के मुताबिक़, आज तक कोई भी तहरीर (लिखित रचना) निर्णायक तौर पर ख़ुद राबिया से नहीं जोड़ी जा सकी। उनकी मशहूर कहानियां और क़ौल ज़्यादातर उनके तक़रीबन चार सदियों बाद के सूफ़ी शायर फ़रीदुद्दीन अत्तार की तहरीरों के ज़रिए हम तक पहुंचे।

हम तेरे सामने बेबसी की हदों से निकलते हुए
बस यही कह सके
अपने प्यारों से ऐसा रवय्या मुनासिब नहीं

फिर भी, सदियों से राबिया से मंसूब कुछ जुमले तसव्वुफ़ी अदब में बेहद मक़बूल रहे हैं। मसलन, जब उनसे पूछा गया कि वो रोज़ाना हज़ार बार सजदा क्यों करती हैं, तो उनका जवाब था कि वो इसके बदले कोई इनाम नहीं चाहतीं। उनकी सबसे मशहूर तशबीह यह भी है कि अगर पूरी दुनिया किसी एक शख़्स की मिल्कियत भी बन जाए, तो भी वो उसे हक़ीक़त में अमीर नहीं बना सकती, क्योंकि यह दुनिया फ़ानी (नाशवान) है।

इसलिए जब हम “राबिया की शायरी” की बात करते हैं, तो असल में हम उस रूहानी फ़िक्र और अंदाज़-ए-बयान की बात कर रहे होते हैं, जो सदियों से उनके नाम से रिवायत होती आई है न कि किसी तस्दीक़शुदा (प्रमाणित) दीवान की।

आज भी ज़िंदा एक विरासत

राबिया बसरी की कहानी सिर्फ़ इस्लामी दुनिया तक महदूद नहीं रही। तुर्की सिनेमा में उन पर फ़िल्में बन चुकी हैं, इंडोनेशियाई और स्पैनिश संगीतकारों ने अपने गानों में उनके फ़लसफ़े को जगह दी है, और आज भी दुनिया भर की औरतें उन्हें रूहानी ताक़त और हौसले की मिसाल मानती हैं।

राबिया की असल विरासत यही है  यह सबक़ कि सच्ची दौलत माली नहीं, बल्कि रूहानी होती है, और सबसे बड़ी इबादत वो है जो बिना किसी लालच या डर के, सिर्फ़ मोहब्बत से की जाए।

ये भी पढ़ें: अमृता प्रीतम: मोहब्बत, तन्हाई और बंटवारे के दर्द की आवाज़

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

अमजद हैदराबादी: दर्द को रुबाई में ढालने वाले शायर

उर्दू अदब की दुनिया में अमजद हैदराबादी का नाम...

इफ़्तिख़ार आरिफ़: शायरी में हिजरत, मोहब्बत और रूहानियत की दास्तान

उर्दू शायरी में कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जो...

Topics

अमजद हैदराबादी: दर्द को रुबाई में ढालने वाले शायर

उर्दू अदब की दुनिया में अमजद हैदराबादी का नाम...

बेग़म अख़्तर का शायर

श्रीनगर में अप्रैल 1969 की एक दोपहर जब बरसात...

जमीलुद्दीन आली: दोहों से उर्दू अदब को नया रंग देने वाले शायर

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ शायर ऐसे गुज़रे...

Related Articles

Popular Categories