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1904 से 1947 तक: ऐसे बना भारत का तिरंगा, जो आज हमारी पहचान है

भारत का 80वें स्वतंत्रता दिवस 2026 के जश्न के बीच, जब तिरंगा हवा में लहराता है, तो हमारे दिल में देश के लिए मोहब्बत और गर्व का एहसास होता है। तीन रंगों वाला ये झंडा आज भारत की सबसे बड़ी पहचान में से एक है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज़ादी से पहले भारत का झंडा कई बार बदला था? भारतीय तिरंगे का इतिहास सिर्फ़ उसके रंगों और डिज़ाइन के बदलने की कहानी भर नहीं है। ये भारत की आज़ादी की लड़ाई, एकता और अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की कहानी भी है।

1904: सिस्टर निवेदिता ने तैयार किया शुरुआती झंडा

भारतीय झंडे के शुरुआती सफ़र की बात करें तो साल 1904 का ज़िक्र मिलता है। माना जाता है कि स्वामी विवेकानंद की शिष्या सिस्टर निवेदिता ने एक झंडे का डिज़ाइन तैयार किया था। इसमें लाल और पीले रंग का इस्तेमाल किया गया था, जो जीत और ताक़त को दर्शाते थे। इस पर बंगाली में ‘वन्दे मातरम्’ भी लिखा हुआ था। ये झंडा आगे चलकर भारत के राष्ट्रीय झंडे के लंबे सफ़र की शुरुआती कड़ी बना।

1906: कलकत्ता में फहराया गया पहला राष्ट्रीय झंडा

साल 1906 में स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन के दौरान कलकत्ता में एक झंडा फहराया गया। ये आज के तिरंगे से काफी अलग था। इसमें नीले, पीले और लाल रंग की तीन पट्टियां थीं। नीली पट्टी पर सितारे बनाए गए थे, जबकि लाल पट्टी पर सूरज और चांद-सितारे के निशान थे। और बीच की पीली पट्टी पर वन्देमातरम् लिखा था। इसी साल झंडे के डिज़ाइन में एक और बदलाव हुआ। अब इसमें हरा, पीला और लाल रंग शामिल किए गए। इस झंडे पर कमल के फूल, ‘वन्दे मातरम्’ और चांद-सूरज के निशान बनाए गए थे। उस दौर में ये झंडे अंग्रेज़ी हुक़ूमत के खिलाफ़ बढ़ती आवाज़ और स्वदेशी आंदोलन की पहचान बन रहे थे।

1907: भारत की आज़ादी की आवाज़ विदेशों तक पहुंची

साल 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने विदेश की ज़मीन पर भारत की आज़ादी का झंडा फहराकर एक अहम इतिहास बनाया। उन्होंने जर्मनी के स्टटगार्ट में आयोजित एक इंटरनेशनल सम्मेलन में भारतीय झंडा फ़हराया। इसके ज़रिए उन्होंने दुनिया के सामने भारत की आज़ादी की मांग को मज़बूती से रखा। इस दौर के झंडे के डिज़ाइन से श्यामजी कृष्ण वर्मा और वीर सावरकर का नाम भी जोड़ा जाता है।

1917: होम रूल आंदोलन का झंडा

इसके बाद साल 1917 में होम रूल आंदोलन के दौरान एक और झंडा सामने आया। इस आंदोलन की अगुवाई एनी बेसेंट और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक कर रहे थे। इस झंडे में पांच लाल और चार हरे रंग की पट्टियां थी। इसमें सात सितारे बनाए गए थे, जिन्हें सप्तर्षि से जोड़ा गया। एक कोने में चांद-तारा भी बना था। इसके ऊपर यूनियन जैक भी मौजूद था। हालांकि, ये झंडा आम लोगों के बीच ज़्यादा मक़बूल नहीं हो पाया।

1921: पिंगली वेंकैया ने दिया तिरंगे को नया रूप

साल 1921 भारतीय झंडे के इतिहास में बेहद अहम रहा। इसी साल पिंगली वेंकैया ने एक ऐसे झंडे का डिज़ाइन तैयार किया, जो आज के तिरंगे के काफी करीब था। इसमें अलग-अलग रंगों के ज़रिए भारत की अलग-अलग कौमों और समुदायों के बीच एकता का पैग़ाम देने की कोशिश की गई थी। इसके बीच में चरखा बनाया गया था। उस दौर में चरखा सिर्फ़ सूत कातने का ज़रिया नहीं था। ये स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और अंग्रेज़ी सामान के बहिष्कार की निशानी बन चुका था।

1931: केसरिया, सफेद और हरे रंग को मिली जगह

साल 1931 में भारतीय झंडे के सफ़र में एक और बड़ा बदलाव आया। इस दौर में केसरिया, सफेद और हरे रंग वाले तिरंगे को अपनाया गया। इसके बीच में चरखा मौजूद था। इन रंगों को अलग-अलग भावनाओं और विचारों से जोड़ा गया—

केसरिया — हिम्मत और क़ुर्बानी

सफेद — अमन और सच्चाई

हरा — हरियाली, तरक़्क़ी और ख़ुशहाली

ये झंडा आज़ादी की लड़ाई के दौरान लोगों को एक साथ जोड़ने वाली बड़ी निशानी बन गया।

1947: चरखे की जगह आया अशोक चक्र

भारत की आज़ादी का दिन करीब आ रहा था और इसी के साथ राष्ट्रीय झंडे को भी आख़िरी शक्ल दी जा रही थी। चरखे की जगह अशोक चक्र को शामिल किया गया। इसे सारनाथ में मौजूद अशोक स्तंभ के सिंह शीर्ष से लिया गया है। अशोक चक्र में 24 तीलियां हैं। ये लगातार आगे बढ़ते रहने और सही रास्ते पर चलते रहने का पैग़ाम देता है। आख़िरकार 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने मौजूदा स्वरूप वाले तिरंगे को भारत के राष्ट्रीय झंडे के तौर पर मंज़ूरी दे दी। इसके कुछ ही हफ्तों बाद आया वो दिन, जिसका इंतज़ार पूरे देश को था। 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ और तिरंगा आज़ाद भारत की नई पहचान बना।

Source: PIB

तिरंगे के इस लंबे सफ़र से जुड़ी एक ख़ास याद आज भी चेन्नई के Fort St. George Museum में महफ़ूज़ है। म्यूज़ियम की Indian Independence Gallery में करीब 12 फीट लंबा और 8 फीट चौड़ा रेशमी तिरंगा रखा हुआ है। ये उन ऐतिहासिक झंडों में से एक है, जिन्हें 15 अगस्त 1947 के आसपास आज़ाद भारत के शुरुआती दिनों में फहराया गया था। 1904 से 1947 तक तिरंगे का ये सफ़र बताता है कि हमारा राष्ट्रीय झंडा सिर्फ़ एक कपड़ा नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की आज़ादी और उसकी पहचान की पूरी दास्तान है।

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