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शाहिद अहमद देहलवी: दिल्ली की तहज़ीब और उर्दू अदब के अमीन

उर्दू अदब की दुनिया में शाहिद अहमद देहलवी का नाम एक बेहतरीन नस्र-निगार, सहाफ़ी और अदबी शख़्सियत के तौर पर लिया जाता है। उनकी पैदाइश 22 मई 1906 को दिल्ली में हुई। वह मशहूर उर्दू उपन्यासकार मौलवी नज़ीर अहमद के पोते और मौलवी बशीरुद्दीन के बेटे थे। उनके वालिद हैदराबाद रियासत में मुलाज़िम थे, इसलिए शाहिद अहमद की शुरुआती तालीम हैदराबाद में हुई।

बाद में वह अलीगढ़ आए और फिर दिल्ली चले गए। उन्होंने अरबी स्कूल से दसवीं की परीक्षा पास की और इसके बाद लाहौर का रुख़ किया। वहां उन्होंने फ़ोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज में दाख़िला लिया। शुरुआत में उनका इरादा डॉक्टर बनने का था, लेकिन मेडिकल की पढ़ाई के दौरान मुर्दों के पोस्टमार्टम जैसे मंज़र देखकर वह इस पेशे से घबरा गए और डॉक्टर बनने का ख़याल छोड़ दिया।

इसके बाद उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफ़न्स कॉलेज से इंग्लिश ऑनर्स किया और फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी से फ़ारसी में एम.ए. की डिग्री हासिल की। उन्हें मौसीक़ी से भी गहरी दिलचस्पी थी और अदब के साथ-साथ संगीत भी उनकी ज़िंदगी का अहम हिस्सा रहा।

तालीम पूरी करने के बाद 1930 में उन्होंने ‘साक़ी’ नाम का माहाना रिसाला शुरू किया। देखते ही देखते ‘साक़ी’ उर्दू अदब का एक मक़बूल रिसाला बन गया। उन्होंने इसी नाम से एक बुक डिपो भी क़ायम किया। ‘साक़ी’ के ज़रिए उन्होंने नए लिखने वालों को जगह दी और उर्दू अदब के कई अहम पहलुओं को सामने लाने का काम किया।

1947 के बंटवारे के बाद शाहिद अहमद देहलवी पाकिस्तान चले गए। पहले उन्होंने लाहौर का रुख़ किया और बाद में कराची में रहने लगे। वहां से उन्होंने ‘साक़ी’ को दोबारा जारी किया। हालांकि रिसाले को चलाने के लिए उन्होंने बहुत मेहनत की, लेकिन आर्थिक परेशानियां लगातार उनके सामने रहीं। रेडियो के लिए उन्होंने मज़ामीन और दूसरे कार्यक्रम भी लिखे और उससे होने वाली आमदनी को भी अपने अदबी काम में लगा दिया।

1959 में वह पाकिस्तान राइटर्स गिल्ड से जुड़े। उनकी पूरी ज़िंदगी उर्दू ज़बान और अदब की ख़िदमत में गुज़री। उन्होंने 50 से ज़्यादा किताबें लिखीं, जिनमें ‘दिल्ली की बिपता’, ‘गंजीना-ए-गौहर’ और ‘फ़ॉस्ट’ जैसी किताबें ख़ास तौर पर मशहूर हैं। उनकी दूसरी रचनाओं में ‘उजड़ा दिया’, ‘चंद अदबी शख़्सियतें’ और ‘बज़्म-ए-ख़ुशनफ़सां’ भी शामिल हैं।

शाहिद अहमद देहलवी सिर्फ़ लेखक नहीं थे, बल्कि दिल्ली की तहज़ीब, ज़बान और अदबी रवायतों के एक अहम अमीन भी थे। उन्हें अपने दादा मौलवी नज़ीर अहमद और वालिद मौलवी बशीरुद्दीन से अदबी विरासत मिली थी, जिसे उन्होंने अपनी तहरीरों और ‘साक़ी’ के ज़रिए आगे बढ़ाया।

उनकी ज़बान पर गहरी पकड़ थी और उनकी नस्र में दिल्ली की तहज़ीब, रोज़मर्रा की ज़िंदगी और पुरानी अदबी रवायतों की ख़ुशबू महसूस होती है। उन्होंने अपने रिसाले के ख़ास शुमारे निकालकर भी उर्दू शायरी और अदब के फ़रोग़ में अहम किरदार अदा किया।

लगातार मेहनत, रातों की बेदारी और अदबी काम ने उनकी सेहत को मुत्तासिर किया। आख़िरकार 27 मई 1967 को दिल का दौरा पड़ने से उनका इंतक़ाल हो गया। लेकिन शाहिद अहमद देहलवी की तहरीरें और ‘साक़ी’ के ज़रिए उनकी अदबी ख़िदमात आज भी उर्दू अदब में उनकी पहचान को ज़िंदा रखे हुए हैं।

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