20वीं सदी की अदबी दुनिया में अमृता प्रीतम एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने पंजाबी और हिंदी साहित्य को अपनी बेबाक आवाज़ से नई पहचान दी। वह मशहूर लेखिका, उपन्यासकार और शायरा थीं। उनकी तहरीर में मोहब्बत की कैफ़ियत भी है, तन्हाई का दर्द भी और इंसानी ज़िंदगी के संघर्ष की गहरी तस्वीर भी।
अमृता प्रीतम की पैदाइश 31 अगस्त 1919 को गुजरांवाला में हुयी थी, जो अब पाकिस्तान में है। उनका बचपन का नाम अमृत कौर था। उनके वालिद करतार सिंह हितकारी एक विद्वान, शायर और अदबी पत्रिका के संपादक थे। घर के इसी अदबी माहौल ने अमृता के अंदर लिखने का शौक़ पैदा किया। बाद में उनका परिवार लाहौर चला गया, जहां उनकी साहित्यिक परवरिश हुई।
जब अमृता महज़ 11 साल की थीं, उनकी वालिदा का इंतक़ाल हो गया। इस हादसे ने उनके दिल में गहरी तन्हाई पैदा कर दी। इसी तन्हाई में कविता उनके लिए सहारा बन गई। उन्होंने अपने एहसास और दर्द को अल्फ़ाज़ का रूप देना शुरू किया।
सिर्फ़ 16 साल की उम्र में 1936 में उनका पहला कविता संग्रह ‘अमृत लहरान’ प्रकाशित हुआ। उसी साल उनका विवाह प्रीतम सिंह से हुआ और अमृत कौर, अमृता प्रीतम के नाम से पहचानी जाने लगीं।
बंटवारे का दर्द और अमृता की कलम
1947 का बंटवारा अमृता प्रीतम की ज़िंदगी और उनकी शायरी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। लाहौर से दिल्ली का सफ़र सिर्फ़ एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं था, बल्कि अपने पीछे एक पूरा शहर, रिश्ते और यादें छोड़ आने का दर्द था।
“अज्ज आखां वारिस शाह नूं, कित्थों क़ब्रां विच्चों बोल,
ते अज्ज किताब-ए-इश्क़ दा कोई अगला वरका फोल।”
इस कविता में उन्होंने पंजाब के महान सूफ़ी शायर वारिस शाह को पुकारा और बंटवारे में तबाह हुए पंजाब, ख़ासकर औरतों के दर्द को आवाज़ दी। यह नज़्म आज भी विभाजन की त्रासदी और इंसानी दर्द की सबसे असरदार साहित्यिक आवाज़ों में गिनी जाती है।
‘पिंजर’: औरत के दर्द की दास्तान
अमृता प्रीतम के मशहूर उपन्यास ‘पिंजर’ में बंटवारे के दौरान औरतों पर होने वाली हिंसा, विस्थापन और सामाजिक बेबसी को बेहद मार्मिक अंदाज़ में पेश किया गया है।
यह सिर्फ़ एक कहानी नहीं, बल्कि उस दौर की उन औरतों की आवाज़ है, जिनकी ज़िंदगी सियासत और मज़हबी नफ़रत के बीच बिखर गई। बाद में इसी उपन्यास पर 2003 में फ़िल्म ‘पिंजर’ बनी, जिसे काफी सराहना मिली।
‘रसीदी टिकट’ और बेबाक ज़िंदगी
अमृता प्रीतम की आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ उनकी ज़िंदगी और उनके रिश्तों की बेहद बेबाक दास्तान है। इसमें उन्होंने अपने तर्जुबों, मोहब्बत, तन्हाई और साहित्यिक सफ़र को खुलकर बयान किया।
उनकी ज़िंदगी में मशहूर शायर साहिर लुधियानवी की मोहब्बत का भी एक ख़ास मुक़ाम रहा। यह रिश्ता मुकम्मल नहीं हो सका, लेकिन उसकी यादें अमृता की तहरीर में हमेशा ज़िंदा रहीं।
अदब की दुनिया में बड़े सम्मान
अमृता प्रीतम को साहित्य के क्षेत्र में कई बड़े सम्मान मिले। 1956 में वह साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाली पहली महिला बनीं, जो पंजाबी साहित्य के लिए दिया गया था। बाद में उन्हें 1982 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
भारत सरकार ने उन्हें 2004 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। वह राज्यसभा की सदस्य भी रहीं।
एक ऐसी आवाज़ जो आज भी ज़िंदा है
31 अक्टूबर 2005 को नई दिल्ली में अमृता प्रीतम का इंतक़ाल हुआ। लेकिन उनकी तहरीर आज भी ज़िंदा है।
“आज मैंने अपने घर का नंबर मिटा दिया है…”
तो कभी एक ऐसी दुनिया की तलाश, जहां इंसान को उसकी आज़ाद रूह से पहचाना जाए।
“अगर मुझे ढूंढना चाहो,
तो हर मुल्क के हर शहर की गली का
दरवाज़ा खटखटाओ…”
और बंटवारे के ज़ख़्मों को याद करते हुए वह वारिस शाह से कहती हैं।
“आज वारिस शाह से कहती हूं, अपनी क़ब्र में से बोलो,
और इश्क़ की किताब का कोई नया वर्क़ा खोलो।”
अमृता प्रीतम की ज़िंदगी मोहब्बत, तन्हाई, बग़ावत और रूहानी तलाश का एक लंबा सफ़र थी। उन्होंने सिर्फ़ लिखा नहीं, बल्कि अपने दौर की औरतों, बिछड़े हुए लोगों और इंसानी दर्द को आवाज़ दी। इसीलिए अमृता प्रीतम सिर्फ़ एक लेखिका नहीं, बल्कि सरहदों के पार धड़कने वाली एक अदबी आवाज़ हैं।
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