Friday, October 16, 2026
21.2 C
Delhi

मरदान अली ख़ां: ग़ालिब के चहेते शागिर्द और अपने दौर के अनोखे शायर ‘निज़ाम’

उर्दू अदब की तारीख़ में ऐसे कई शायर हुए हैं जिनकी पहचान सिर्फ़ उनके कलाम तक महदूद नहीं रही। उन्होंने इल्म, तहज़ीब, संगीत, इतिहास और दूसरे कई इलाकों में भी अपनी ख़ास पहचान बनाई। नवाब मरदान अली ख़ां भी ऐसी ही बहुमुखी शख़्सियत थे। वह एक शायर होने के साथ-साथ प्रशासक, खोजी, संगीत के जानकार और कई विषयों पर किताबें लिखने वाले आलिम भी थे। उनकी शायरी में इश्क़, सूफ़ियाना रंग, रिवायत और ज़िंदगी के अलग-अलग रंग एक साथ दिखाई देते हैं।

“आख़िर हुआ है हश्र बपा इंतिज़ार में,
सुबह-ए-शब-ए-फ़िराक़ हुई मारवाड़ में।”

इन अशआर में इंतिज़ार और जुदाई की वह कैफ़ियत दिखाई देती है, जो उनकी शायरी की ख़ास पहचान थी।

नवाब मरदान अली ख़ां की पैदाइश उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद ज़िले के भट्टी मुहल्ले के एक बावकार परिवार में हुई थी। वह यूसुफ़ज़ई पठान परिवार से ताल्लुक़ रखते थे। उनके बुज़ुर्ग मुग़ल सल्तनत और अवध रियासत में अहम ओहदों पर रह चुके थे। घर का माहौल इल्मी था, इसलिए मरदान अली ख़ां ने अरबी और फ़ारसी की तालीम भी घर पर ही हासिल की।

साल 1850 में रावलपिंडी में उन्हें सरकारी नौकरी मिली। हालांकि नौकरी से वह ज़्यादा ख़ुश नहीं थे और कुछ साल बाद, 1858 में उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। इसके लगभग एक साल बाद वह मालेरकोटला चले गए। वहां के नवाब ने उनकी क़ाबिलियत को देखते हुए उन्हें वज़ीर-ए-आज़म नियुक्त किया।

इसके बाद उनका रिश्ता कपूरथला से जुड़ा। वहां के महाराजा शिवदान सिंह ने उनकी सेवाओं और क़ाबिलियत से मुत्तासिर होकर उन्हें एक लंबा सम्मानित ख़िताब दिया—“निज़ामुद्दौला मुन्तज़िम-उल-मुल्क नवाब मुहम्मद मरदान अली ख़ां बहादुर तख़्त क़ायम जंग”—और उन्हें मारवाड़ का वज़ीर-ए-आज़म नियुक्त किया।

प्रशासन में रहते हुए भी मरदान अली ख़ां की दिलचस्पियां सिर्फ़ सरकारी काम तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने कई अहम सड़कें बनवाने में भूमिका निभाई और टकसाल भी क़ायम करवाए। उन्हें नई और अनोखी चीज़ों की खोज का भी बहुत शौक़ था। अपने दौर में उन्होंने कई क़ीमती और दुर्लभ पत्थरों की खोज की। मारवाड़ की दीवानी के दौरान चांदी, लोहा और अन्य खनिजों की खोज में भी उनकी दिलचस्पी रही।

1876 में उन्होंने अपने सभी ओहदों से इस्तीफ़ा दे दिया और हज के लिए रवाना हुए। वह पूरी ज़िंदगी अविवाहित रहे। बाद के दिनों में वह कश्मीर आए और 2 जून 1879 को श्रीनगर में उनका इंतिक़ाल हुआ। उन्हें वहीं सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।

मरदान अली ख़ां की शख़्सियत का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि वह सिर्फ़ शायर नहीं थे। उन्हें संगीत, भूगोल, इतिहास, तिलिस्मी इल्म और हिप्नोटिज़्म जैसे अलग-अलग विषयों में भी दिलचस्पी थी। उन्होंने इन विषयों पर कई किताबें लिखीं। हिप्नोटिज़्म पर उनकी किताबें ‘तिलिस्म-ए-नज़र’ और ‘सीर-ए-ग़ायत’ ख़ास तौर पर उल्लेखनीय मानी जाती हैं। मशहूर विद्वान मालिक राम के मुताबिक़, ये उर्दू में इस विषय पर लिखी गई शुरुआती किताबों में शामिल थीं।

मौसीक़ी के इलाके में भी उनका काम अहम था। उनकी किताब ‘ग़ुंचा-ए-राग’ 1863 में मुंशी नवल किशोर प्रेस, लखनऊ से प्रकाशित हुई। भारतीय संगीत की विदुषी अतिया बेगम ने अपनी किताब ‘Music of India’ में भी इस किताब का ज़िक्र किया था। इससे अंदाज़ा होता है कि मरदान अली ख़ां की दिलचस्पी मौसीक़ी में कितनी गहरी थी।

शायरी की दुनिया में उनका रिश्ता मिर्ज़ा ग़ालिब से भी जुड़ा हुआ था। वह ग़ालिब से इस्लाह लिया करते थे। ग़ालिब के इंतिक़ाल के बाद उन्होंने मुंशी मुज़फ़्फ़र अली ‘असीर’ लखनवी से इस्लाह लेना शुरू किया, जो अमीर मीनाई के उस्ताद भी थे।

मरदान अली ख़ां के नाम ग़ालिब के दो ख़त भी मिलते हैं, जो ‘ख़ुतूत-ए-ग़ालिब’ में शामिल हैं। इन ख़तों में ग़ालिब ने उनके कलाम की तारीफ़ की और उनकी शायरी की क़ाबिलियत को सराहा। एक दूसरे ख़त में ग़ालिब ने मरदान अली ख़ां की बहादुरी का भी ज़िक्र किया है, जब उन्होंने एक शेर को पकड़ लिया था।

मशहूर ग़ालिब-शोधकर्ता मालिक राम ने अपनी किताब ‘तलामीज़ा-ए-ग़ालिब’ में भी मरदान अली ख़ां को ग़ालिब के शागिर्दों में शामिल करते हुए उनके बारे में विस्तार से लिखा है।

मरदान अली ख़ां ने उर्दू और फ़ारसी दोनों ज़बानों में शायरी की। उन्होंने ग़ज़ल, नज़्म, हम्द, नात, सलाम, मनक़बत, वासोख़्त, मुख़म्मस, क़सीदा, रुबाई और सेहरा जैसी कई अस्नाफ़ में तबअ-आज़माई की।

शायरी की शुरुआत में वह ‘मुज़्तर’ तख़ल्लुस इस्तेमाल करते थे। बाद में उन्होंने ‘राना’ तख़ल्लुस अपना लिया, जो उनकी कई ग़ज़लों में मिलता है। जब उन्हें ‘निज़ामुद्दौला’ का ख़िताब मिला तो उन्होंने ‘निज़ाम’ तख़ल्लुस अपनाया। उन्होंने अपनी एक रुबाई में इन तीनों तख़ल्लुस का ज़िक्र भी किया।

“आग़ाज़-ए-सुख़नवरी में ‘मुज़्तर’ था नाम,
‘राना’ था शबाब-ए-शायरी के हंगाम।
है ज़ेर-ए-नगीं जो किश्वर-ए-नज़्म तो अब,
नवाब ख़िताब और तख़ल्लुस है ‘निज़ाम’।”

उनकी शायरी पर मिर्ज़ा ग़ालिब और असीर लखनवी, दोनों उस्तादों का असर साफ़ दिखाई देता है। उनका कलाम ज़्यादातर रूमानी, सूफ़ियाना और रिवायती रंग लिए हुए है। वह मुहावरों और कहावतों का ख़ूबसूरत इस्तेमाल करते थे। उनके अशआर में तरह-तरह की तश्बीहें और इस्तिआरे भी मिलते हैं, जिससे उनकी ग़ज़ल में रवानी और दिलकशी पैदा होती है।

लेकिन मरदान अली ख़ां की शायरी की एक ख़ास बात यह भी थी कि उन्होंने अपने दौर की रवायत से थोड़ा अलग रास्ता अपनाया। उन्होंने उर्दू शायरी में हिंदी और ख़ास तौर पर अंग्रेज़ी के अल्फ़ाज़ भी इस्तेमाल किए। यह प्रयोग उस ज़माने के लिहाज़ से काफ़ी अनोखा था। 

“खींचा है अक्स क़ल्ब की ‘फ़ोटोग्राफ़’ में,
शीशे में है शबीह, परी कोहकाफ़ में।”

यहां ‘फ़ोटोग्राफ़’ जैसे अंग्रेज़ी लफ़्ज़ को शेर में शामिल करके उन्होंने एक नया अंदाज़ पैदा किया।

उनकी शायरी में वतन से मोहब्बत का रंग भी दिखाई देता है।

“न पूछो हम-सफ़रो मुझ से माजरा-ए-वतन,
वतन है मुझ पे फ़िदा और मैं फ़िदा-ए-वतन।”

इश्क़ के रूमानी रंग में भी उनका अंदाज़ बेहद दिलकश था।

“राह-ए-उल्फ़त में मुलाक़ात हुई किस-किस से,
दश्त में क़ैस मिला, कोह में फ़रहाद मुझे।”

और उनकी बातचीत के अंदाज़ में भी मोहब्बत की मिठास दिखाई देती है।

“प्यार की बातें कीजिए साहब,
लुत्फ़-ए-सोहबत का गुफ़्तुगू से है।”

मरदान अली ख़ां की पूरी ज़िंदगी को देखें तो वह सिर्फ़ एक शायर की ज़िंदगी नहीं थी। वह एक ऐसे इंसान थे जिन्हें हर नई चीज़ जानने, समझने और खोजने का जुनून था। प्रशासन से लेकर संगीत तक, इल्म से लेकर शायरी तक और खोज से लेकर साहित्य तक उन्होंने कई मैदानों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

इसीलिए नवाब मरदान अली ख़ां ‘निज़ाम’ का नाम उर्दू अदब में एक बहुआयामी शख़्सियत के तौर पर याद किया जाता है। उनकी शायरी में ग़ालिब की रवायत का असर है, असीर का रंग है, मगर साथ ही अपनी ज़मीन और अपना अनोखा अंदाज़ भी है। यही ख़ासियत उन्हें अपने दौर के दूसरे शायरों से अलग और यादगार बनाती है।

ये भी पढ़ें: नवाज़ देवबंदी: मोहब्बत, जज़्बात और इंसानियत के शायर

आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

हसन नईम: ग़म को अपनी ताक़त बनाने वाले शायर

हसन नईम ने अपनी शायरी के ज़रिए ज़िंदगी के...

5,000 घंटे की उड़ान, चार दशक की ख़िदमत: Air Chief Marshal AP Singh का शानदार सफ़र

जब कोई लड़ाकू विमान आवाज़ की रफ़्तार को पार...

वहीद अख़्तर: शायरी, फ़लसफ़े और इल्म की दुनिया का एक अहम नाम

उर्दू अदब की दुनिया में शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का...

Topics

हसन नईम: ग़म को अपनी ताक़त बनाने वाले शायर

हसन नईम ने अपनी शायरी के ज़रिए ज़िंदगी के...

5,000 घंटे की उड़ान, चार दशक की ख़िदमत: Air Chief Marshal AP Singh का शानदार सफ़र

जब कोई लड़ाकू विमान आवाज़ की रफ़्तार को पार...

वहीद अख़्तर: शायरी, फ़लसफ़े और इल्म की दुनिया का एक अहम नाम

उर्दू अदब की दुनिया में शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का...

मुजतबा हुसैन: हंसी के पीछे छुपी सच्चाई का बेमिसाल क़लमकार

उर्दू अदब में तंज़-ओ-मज़ाह की बात हो और मुजतबा...

Balbir Singh Senior: भारतीय हॉकी को गोल्ड की राह दिखाने वाले

भारतीय हॉकी के इतिहास में जब भी बड़े खिलाड़ियों...

Related Articles

Popular Categories