Friday, October 16, 2026
24.8 C
Delhi

तालिब बागपती: इश्क़ की कैफ़ियत को शायरी में ढालने वाले शायर 

उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ शायर ऐसे रहे हैं, जिन्होंने अपनी ग़ज़लों में पुराने क्लासिकी रंग को बरक़रार रखते हुए मोहब्बत, जुदाई, याद और दिल की कैफ़ियत को बेहद सादगी से बयान किया। तालिब बागपती भी ऐसे ही मशहूर शायरों में शुमार होते हैं। उनकी शायरी में इश्क़ का सोज़ भी है, जुदाई का दर्द भी और महबूब की यादों की वह कसक भी, जो पढ़ने वाले के दिल को छू जाती है।

तालिब बागपती का असल नाम कुंवर लताफ़त अली ख़ां था। उनकी पैदाइश 27 नवंबर 1903 को बागपत, ज़िला मेरठ में हुई थी। उन्होंने मेरठ कॉलेज से एफ.ए. तक की तालीम हासिल की। साहित्य और शायरी से उनका रिश्ता बहुत गहरा था। उन्होंने ग़ज़ल के साथ-साथ गद्य लेखन में भी अपनी पहचान बनाई।

तालिब ने अपनी शायरी में जिगर मुरादाबादी और नुदरत मेरठी जैसे शायरों से भी फ़ायदा उठाया। इन शायरों के असर से उनके कलाम में इश्क़ की गर्मी, जज़्बात की नर्मी और क्लासिकी ग़ज़ल की रवायत दिखाई देती है। उनकी शायरी पढ़ते हुए महसूस होता है कि वह मोहब्बत को सिर्फ़ एक ख़ूबसूरत एहसास के तौर पर नहीं देखते, बल्कि उसके साथ जुड़े दर्द, इंतज़ार और तन्हाई को भी उतनी ही अहमियत देते हैं।

तालिब बागपती का एक दिलकश अंदाज़ उनके इन अशआर में दिखाई देता है।

“यूं भी तिरा एहसान है आने के लिए आ
ऐ दोस्त किसी रोज़ न जाने के लिए आ”

इन अशआर में मिलने की ख़्वाहिश के साथ एक अजीब-सी उदासी भी मौजूद है। शायर चाहता है कि महबूब आए, मगर ऐसी मुलाक़ात हो जिसमें जुदाई का ख़याल न हो। यही तालिब की शायरी की ख़ूबी है कि वह आसान अल्फ़ाज़ में भी गहरी कैफ़ियत पैदा कर देते हैं।

उनका एक और रंग इन अशआर में दिखाई देता है।

“हर-चंद नहीं शौक़ को यारा-ए-तमाशा
ख़ुद को न सही मुझ को दिखाने के लिए आ”

यहां महबूब को देखने की आरज़ू है, लेकिन उसके पीछे छिपी बेकरारी भी साफ़ महसूस होती है। तालिब की शायरी में ऐसी ही छोटी-छोटी कैफ़ियतें मिलकर मोहब्बत की पूरी तस्वीर बना देती हैं।

तालिब सिर्फ़ गंभीर और दर्दभरी शायरी तक सीमित नहीं थे। उनके व्यक्तित्व में हास्य और दिल्लगी का रंग भी था। उन्होंने ‘कोई’ के तख़ल्लुस से ‘आलमगीर’ में हास्य लेखन किया। उनके इस मसखरेपन की झलक उनकी शायरी में भी दिखाई देती थी। यानी उनके कलाम में जहां इश्क़ और हिज्र की उदासी है, वहीं कहीं-कहीं हल्की मुस्कान और दिल्लगी भी नज़र आती है।

साल 1936 में उनका काव्य-संग्रह ‘शाख़-ए-नबात’ प्रकाशित हुआ। यह किताब उनके साहित्यिक सफ़र की अहम कड़ी मानी जाती है। उनकी शायरी में उस दौर की क्लासिकी ग़ज़ल की रवायत दिखाई देती है, लेकिन उनके जज़्बात सीधे और इंसानी हैं। यही वजह है कि उनके अशआर आज भी आसानी से समझ में आते हैं।

“हर-चंद भुलाता हूं, भुलाया नहीं जाता,
इक नक़्श-ए-तख़य्युल है, मिटाया नहीं जाता।”

मोहब्बत की यही कैफ़ियत तालिब के कलाम में बार-बार सामने आती है। यादें इंसान के दिल पर ऐसा नक़्श छोड़ देती हैं, जिन्हें वक़्त भी आसानी से मिटा नहीं पाता। उनके यहां इश्क़ कोई अचानक पैदा होने वाला जज़्बा नहीं, बल्कि धीरे-धीरे दिल में उतरने वाली कैफ़ियत है।

उनकी शायरी में पुरानी मुलाक़ातों की याद भी बेहद ख़ूबसूरती से आती है।

“पहली पहली वो मुलाक़ात, वो बरसात की रात,
याद है, याद है वो शर्म-ओ-हिजाबात की रात।”

बारिश की रात, पहली मुलाक़ात और महबूब की शर्म—ये सब मिलकर एक ऐसा मंज़र बनाते हैं, जो पाठक को भी उस दौर में ले जाता है। यही तालिब की शायरी का कमाल है कि वह बहुत साधारण याद को भी शेर की ख़ूबसूरत तस्वीर में बदल देते हैं।

तालिब बागपती का साहित्यिक सफ़र लंबा रहा। उन्होंने ग़ज़ल, नज़्म और गद्य के ज़रिए अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी शायरी में जिगर की रवानी, क्लासिकी ग़ज़ल की मिठास और अपने दौर के जज़्बात की सच्चाई दिखाई देती है। उनके यहां मोहब्बत है तो उसके साथ इंतज़ार भी है, मुलाक़ात है तो उसके पीछे जुदाई का डर भी है और याद है तो उसे भुला न पाने की बेबसी भी।

26 जुलाई 1984 को तालिब बागपती का इंतिक़ाल हुआ। लेकिन अच्छे शायर की तरह उनका कलाम भी उनके बाद ज़िंदा रहा। उनकी शायरी आज भी उन लोगों को अपनी तरफ़ खींचती है, जो इश्क़, तन्हाई और याद के एहसास को शायरी में महसूस करना चाहते हैं।

तालिब बागपती की अहमियत इसी बात में है कि उन्होंने क्लासिकी ग़ज़ल की रवायत को अपने अंदाज़ में आगे बढ़ाया और दिल की बात को ऐसे अल्फ़ाज़ दिए, जिनमें आज भी वही सोज़, वही मिठास और वही मोहब्बत महसूस होती है। उनकी शायरी हमें याद दिलाती है कि सच्चा इश्क़ वक़्त के साथ ख़त्म नहीं होता, बल्कि यादों और अल्फ़ाज़ में हमेशा ज़िंदा रहता है।

ये भी पढ़ें: नवाज़ देवबंदी: मोहब्बत, जज़्बात और इंसानियत के शायर

आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

हसन नईम: ग़म को अपनी ताक़त बनाने वाले शायर

हसन नईम ने अपनी शायरी के ज़रिए ज़िंदगी के...

5,000 घंटे की उड़ान, चार दशक की ख़िदमत: Air Chief Marshal AP Singh का शानदार सफ़र

जब कोई लड़ाकू विमान आवाज़ की रफ़्तार को पार...

वहीद अख़्तर: शायरी, फ़लसफ़े और इल्म की दुनिया का एक अहम नाम

उर्दू अदब की दुनिया में शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का...

Topics

हसन नईम: ग़म को अपनी ताक़त बनाने वाले शायर

हसन नईम ने अपनी शायरी के ज़रिए ज़िंदगी के...

5,000 घंटे की उड़ान, चार दशक की ख़िदमत: Air Chief Marshal AP Singh का शानदार सफ़र

जब कोई लड़ाकू विमान आवाज़ की रफ़्तार को पार...

वहीद अख़्तर: शायरी, फ़लसफ़े और इल्म की दुनिया का एक अहम नाम

उर्दू अदब की दुनिया में शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का...

मुजतबा हुसैन: हंसी के पीछे छुपी सच्चाई का बेमिसाल क़लमकार

उर्दू अदब में तंज़-ओ-मज़ाह की बात हो और मुजतबा...

Balbir Singh Senior: भारतीय हॉकी को गोल्ड की राह दिखाने वाले

भारतीय हॉकी के इतिहास में जब भी बड़े खिलाड़ियों...

Related Articles

Popular Categories