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बठिंडा का Qila Mubarak: रज़िया सुल्तान, गुरुओं की आमद और सल्तनतों के दौर की दास्तान

भारत का Qila Mubarak (किला मुबारक) इतिहास जितना पुराना है, उतना ही रंग-बिरंगा भी है। इस लंबे इतिहास की गवाही आज भी देश के कई पुराने महलों, इमारतों और किलों में मिलती है। जब भारत के सबसे पुराने किलों की बात होती है, तो अक्सर राजस्थान या मध्य भारत का नाम सामने आता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत के सबसे पुराने किलों में से एक Qila Mubarak (किला मुबारक) भी है, जो पंजाब के ऐतिहासिक शहर बठिंडा के बीचों-बीच मौजूद है।

ईंटों से बना ये किला पंजाब के इतिहास में आए कई बड़े बदलावों का गवाह रहा है। इस किले में पंजाब के सियासी, मज़हबी और तामीराती इतिहास की कई परतें देखने को मिलती हैं। किले का इतिहास कुषाण दौर से लेकर मुग़ल, सिख और ब्रिटिश दौर तक फैला हुआ है। आज Qila Mubarak (किला मुबारक) को भारत सरकार ने राष्ट्रीय अहमियत वाला स्मारक का दर्जा दिया हुआ है। इसकी देखरेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI करता है।

सिंधु घाटी सभ्यता से किला मुबारक तक का इतिहास

Qila Mubarak (किला मुबारक) के बारे में जानने से पहले बठिंडा के पुराने इतिहास को समझना ज़रूरी है। बठिंडा का रिश्ता भारत के बेहद पुराने इतिहास से जुड़ा हुआ है। पुरातात्विक खोजों से पता चलता है कि बठिंडा और इसके आसपास का इलाका सिंधु घाटी सभ्यता से भी जुड़ा हुआ था। आसपास के इलाकों में मिले पुराने अवशेष इस बात की तरफ़ इशारा करते हैं। इस इलाके का ज़िक्र प्राचीन भारतीय ग्रंथों, जैसे ऋग्वेद और महाभारत, में भी मिलता है। माना जाता है कि पुराने ज़माने में बठिंडा भारत के अहम तिजारती और सियासी रास्तों के करीब बसा हुआ था।

Pic Credit: Britannica

पुराने दौर में बठिंडा थार रेगिस्तान के उत्तरी किनारे के पास था। चारों तरफ़ बड़े-बड़े रेत के टीले हुआ करते थे। इस भौगोलिक स्थिति की वजह से इस इलाके को कुदरती हिफाज़त भी मिलती थी। Qila Mubarak (किला मुबारक) की सबसे ख़ास चीज़ों में से एक है। इसके निर्माण में इस्तेमाल की गई ईंटें। पुरातात्विक जानकारियों के मुताबिक, किले की नींव में ख़ास तरह की आयताकार ईंटें मिली हैं, जिन्हें कुषाण दौर से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि किले की शुरुआती तामीर पहली सदी ईस्वी में कुषाण बादशाह कनिष्क और राजा डब के दौर में हुई थी। कुछ रवायतों में राजा डब को राजा वेन पाल का पूर्वज भी माना जाता है।

कहा जाता है कि उन्होंने उत्तर-पश्चिम से आने वाले हूणों और दूसरे हमलावरों से बचाव के लिए इस किले को एक मज़बूत हिफाज़ती ठिकाने के तौर पर बनवाया था।
वक़्त के साथ अलग-अलग हुक्मरानों ने अपनी फौजी ज़रूरतों के हिसाब से किले में कई बदलाव और इज़ाफे किए। 11वीं और 12वीं सदियों तक Qila Mubarak (किला मुबारक) एक बड़ा फौजी किला बन चुका था। ये उत्तर-पश्चिम से दिल्ली की तरफ़ बढ़ने वाली हमलावर फौजों को रोकने के लिए एक अहम हिफाज़ती दीवार की तरह काम करता था।

किला मुबारक से जुड़े बड़े ऐतिहासिक दौर और हुक्मरान

Qila Mubarak (किला मुबारक) का इतिहास कई बड़े हुक्मरानों की जीत, हार और सियासी संघर्षों का गवाह रहा है। इस किले से जुड़े इतिहास में भारतीय उपमहाद्वीप के कई मशहूर हुक्मरानों का ज़िक्र मिलता है। ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक, किले की शुरुआती तामीर का रिश्ता कुषाण सम्राट कनिष्क से जोड़ा जाता है। इसके बाद 1004 ईस्वी में महमूद ग़ज़नवी ने बठिंडा पर हमला किया और इस मज़बूत किले पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद 1189 ईस्वी में मुहम्मद ग़ोरी ने किले पर अपना कब्ज़ा कर लिया।

Pic Credit: Discover SIkhism

लेकिन 1191 ईस्वी में तराइन की पहली जंग से पहले हिंदू हुक्मरान पृथ्वीराज चौहान ने लंबे घेराव के बाद ग़ोरी की फौजों को शिकस्त दी और किले पर दोबारा अपना कब्ज़ा कर लिया।
Qila Mubarak (किला मुबारक) का रिश्ता 1240 ईस्वी में रज़िया सुल्तान के इतिहास से भी जुड़ता है। इसके बाद 16वीं से 18वीं सदी के दौरान कई सिख गुरु साहिबान ने इस इलाके का दौरा किया। 18वीं सदी में ये किला पटियाला के महाराजा आला सिंह के असर में आ गया। इस तरह Qila Mubarak (किला मुबारक) ने सदियों के दौरान कई जंगों, सियासी बदलावों और हुक्मरानों के उतार-चढ़ाव को अपनी आंखों से देखा है।

किला मुबारक से जुड़े बड़े ऐतिहासिक दौर और हुक्मरान

Qila Mubarak (किला मुबारक) का इतिहास कई बड़े हुक्मरानों की जीत, शिकस्त और सियासी कशमकश का गवाह रहा है। इस किले से जुड़े इतिहास में भारतीय उपमहाद्वीप के कई मशहूर हुक्मरानों का ज़िक्र मिलता है। ऐतिहासिक रिवायतों के मुताबिक, किले की शुरुआती तामीर का रिश्ता कुषाण बादशाह कनिष्क से जोड़ा जाता है। इसके बाद 1004 ईस्वी में महमूद ग़ज़नवी ने बठिंडा पर हमला किया और इस मज़बूत किले पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद 1189 ईस्वी में मुहम्मद ग़ोरी ने किले पर अपना कब्ज़ा कर लिया।

लेकिन 1191 ईस्वी में तराइन की पहली जंग से पहले हिंदू हुक्मरान पृथ्वीराज चौहान ने लंबे घेराव के बाद ग़ोरी की फौज को शिकस्त दी और किले पर दोबारा अपना कब्ज़ा कर लिया। Qila Mubarak (किला मुबारक) का रिश्ता 1240 ईस्वी में रज़िया सुल्तान की तारीख़ से भी जुड़ता है। इसके बाद 16वीं से 18वीं सदी के दौरान कई सिख गुरु साहिबान ने इस इलाके का दौरा किया। 18वीं सदी में ये किला पटियाला के महाराजा आला सिंह के असर में आ गया। इस तरह Qila Mubarak (किला मुबारक) ने सदियों के दौरान कई जंगों, सियासी बदलावों और हुक्मरानों के उतार-चढ़ाव को अपनी आंखों से देखा है।

Qila Mubarak (किला मुबारक) की तारीख़ का एक सबसे दर्दनाक और दिलचस्प अध्याय रज़िया सुल्तान से जुड़ा हुआ है। रज़िया सुल्तान दिल्ली सल्तनत की पहली और इकलौती महिला हुक्मरान थी। कहा जाता है कि बठिंडा के गवर्नर मलिक अल्तूनिया ने रज़िया सुल्तान के खिलाफ़ बगावत कर दी थी। इस दौरान रज़िया के वफ़ादार साथी याकूत की हत्या कर दी गई। जंग में शिकस्त के बाद रज़िया को किला मुबारक के अंदर कैद कर दिया गया।

स्थानीय रिवायतों और मशहूर लोक-कहानियों के मुताबिक, रज़िया सुल्तान ने अपने दुश्मनों से बचकर निकलने और दोबारा अपनी फौज जमा करने की कोशिश में किले की एक ऊंची बालकनी से छलांग लगा दी थी। आज भी किला मुबारक का एक हिस्सा आम तौर पर “रज़िया दी बुर्ज़ी” यानी रज़िया का बुर्ज़ के नाम से जाना जाता है।

धार्मिक अहमियत, सिख गुरु और सूफी संत

किला मुबारक सिर्फ़ एक फौजी किला ही नहीं था, बल्कि वक़्त के साथ इसकी रूहानी और मज़हबी अहमियत भी बढ़ती गई। 11वीं सदी में मशहूर सूफ़ी संत पीर बाबा हाजी रतन जी के बठिंडा आने का ज़िक्र मिलता है। माना जाता है कि उन्होंने किले के पास रहकर इबादत और ध्यान किया था। इस ऐतिहासिक जगह का रिश्ता तीन सिख गुरु साहिबान की बठिंडा यात्रा से भी जोड़ा जाता है।

Pic Credit: Reddit

सिख धर्म के बानी गुरु नानक देव जी के बारे में माना जाता है कि उन्होंने करीब 1515 ईस्वी में अपनी दूसरी उदासी के दौरान बठिंडा का दौरा किया था। नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर जी के भी 1665 ईस्वी में मालवा के सफ़र के दौरान किला मुबारक आने का ज़िक्र मिलता है। वहीं दसवें सिख गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के बारे में माना जाता है कि उन्होंने 1705 ईस्वी में तलवंडी साबो, यानी दमदमा साहिब की तरफ़ जाते हुए इस किले का दौरा किया था। इस तरह किला मुबारक सिर्फ़ जंगों और हुकूमतों का गवाह नहीं रहा, बल्कि ये अलग-अलग मज़हबी और रूहानी रवायतों से भी जुड़ा रहा है।

गुरुद्वारा श्री किला मुबारक साहिब

गुरु गोविंद सिंह जी की बठिंडा यात्रा से जुड़ी एक मशहूर साखी भी सुनाई जाती है। कहा जाता है कि जब गुरु साहिब यहां पहुंचे, तो स्थानीय लोगों ने उनसे शिकायत की कि एक डरावनी ताकत या अलौकिक प्राणी लंबे समय से लोगों को परेशान कर रहा है। रिवायत के मुताबिक, गुरु साहिब ने अपनी रूहानी ताक़त से उससे मुक्ति दिलाई। इसके बाद वो वहां से सरहिंद की तरफ़ चला गया।

गुरु गोबिंद सिंह जी की इस पाक यात्रा की याद में बाद में किले के अंदर एक खूबसूरत गुरुद्वारा बनवाया गया। इसे गुरुद्वारा श्री किला मुबारक साहिब के नाम से जाना जाता है। मौजूदा गुरुद्वारे की इमारत का निर्माण 1835 ईस्वी में पटियाला रियासत के महाराजा करम सिंह ने करवाया था। आज ये गुरुद्वारा किला मुबारक की मज़हबी और रूहानी विरासत का एक अहम हिस्सा है।

पटियाला रियासत और ‘फोर्ट गोबिंदगढ़’

18वीं सदी के बीच, करीब 1754 से 1763 ईस्वी के दौरान पटियाला रियासत के बानी महाराजा आला सिंह ने किला मुबारक पर अपना कब्ज़ा कर लिया। दसवें सिख गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की याद में महाराजा आला सिंह ने इस किले का नाम बदलकर ‘फोर्ट गोबिंदगढ़’ रख दिया। पटियाला रियासत के हुक्मरानों ने इस किले का इस्तेमाल शाही रिहाइश और फौजी ठिकाने, दोनों के तौर पर किया। उन्होंने किले के अंदरूनी हिस्सों को और मज़बूत किया और परिसर के अंदर कई खूबसूरत महलनुमा इमारतें भी बनवाई। इस दौर में किला मुबारक सिर्फ़ एक फौजी किला नहीं रहा, बल्कि पटियाला रियासत की शाही ज़िंदगी और सियासी ताक़त का भी अहम मरकज़ बन गया।

किला मुबारक की वास्तुकला

किला मुबारक की वास्तुकला प्राचीन भारतीय और मध्यकालीन फौजी इंजीनियरिंग की एक शानदार मिसाल है। इसका विशाल आकार ऐसा दिखाई देता है, जैसे रेत के समंदर में कोई बड़ा जहाज़ तैर रहा हो। किले के अंदरूनी हिस्से को ‘किला अंदरून’ कहा जाता है। ये हिस्सा कभी शाही रिहाइश के तौर पर इस्तेमाल होता था। इसके अंदर मोती महल, शीश महल, राजमाता महल और जेल पैलेस जैसी कई अहम इमारतें मौजूद हैं।

किले की हिफाज़त को ध्यान में रखते हुए इसकी दीवारों पर 36 छोटे बुर्ज़ और 8 बड़े बुर्ज़ बनाए गए हैं। इन बड़े बुर्ज़ों की ऊंचाई करीब 118 फीट है। इस किले को हमलों से बचाने और उसकी हिफाज़त मज़बूत करने के लिए बनाया गया था। किले का मुख्य दरवाज़ा भी काफी विशाल और शाही अंदाज़ वाला है। आज किला मुबारक बठिंडा के सबसे व्यस्त बाज़ारों में से एक धोबी बाज़ार के बीच मौजूद है। आधुनिक शहर के शोर और भागदौड़ के बीच ये सदियों पुरानी शाही इमारत आज भी खामोश और गंभीर गवाह की तरह खड़ी है और अपने अंदर इतिहास के कई राज़ समेटे हुए है।

Pic Credit: Reddit

किला मुबारक से जुड़े अहम हुक्मरान और ऐतिहासिक घटनाएं

किला मुबारक का इतिहास करीब दो हज़ार साल पुराना माना जाता है। इस लंबे सफ़र में ये कई हुक्मरानों और अहम ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है। 90 से 110 ईस्वी माना जाता है कि कुषाण दौर में बादशाह कनिष्क और राजा डब ने इस किले की शुरुआती तामीर करवाई थी। इसमें कुषाण दौर की ईंटों का इस्तेमाल किया गया था। 1004 ईस्वी महमूद ग़ज़नवी ने बठिंडा पर हमला कर किले पर कब्ज़ा कर लिया।

करीब 1045 ईस्वी मशहूर सूफ़ी संत पीर बाबा हाजी रतन जी के यहां आकर इबादत और ध्यान करने का ज़िक्र मिलता है। 1189 ईस्वी मुहम्मद ग़ोरी ने किले पर कब्ज़ा कर लिया। 1191 ईस्वी कहा जाता है कि पृथ्वीराज चौहान ने ग़ोरी की फौज को शिकस्त देकर किले पर दोबारा कब्ज़ा कर लिया। 1240 ईस्वी रज़िया सुल्तान को अल्तूनिया से शिकस्त के बाद किला मुबारक में कैद किए जाने का ज़िक्र मिलता है। 1515 ईस्वी माना जाता है कि गुरु नानक देव जी ने अपनी दूसरी उदासी के दौरान किला मुबारक का दौरा किया। 1665 ईस्वी गुरु तेग बहादुर जी ने मालवा के सफ़र के दौरान यहां का दौरा किया।

1705 ईस्वी श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के भी इस किले में आने की रिवायत मिलती है। 1754–1763 ईस्वी महाराजा आला सिंह ने किले को पटियाला रियासत के कब्ज़े में लिया और इसका नाम फोर्ट गोबिंदगढ़ रखा। 1835 ईस्वी महाराजा करम सिंह ने किले के अंदर मौजूदा गुरुद्वारा श्री किला मुबारक साहिब की इमारत बनवाई। इस तरह किला मुबारक ने करीब दो हज़ार साल के इतिहास में जंगों, हुकूमतों, मज़हबी रवायतों और सियासी बदलावों को करीब से देखा है। आज भी ये किला बठिंडा की पहचान और पंजाब की पुरानी विरासत का एक अहम हिस्सा है।

आज की चुनौतियां और किले को बचाने की कोशिशें

Qila Mubarak (किला मुबारक) के सामने आज कई चुनौतियां हैं। करीब दो हज़ार साल पुराना होने की वजह से इसकी ईंटों और दीवारों पर बारिश, हवा और कुदरती घिसाव का असर पड़ रहा है। बठिंडा में तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण और धोबी बाज़ार के आसपास बढ़ती भीड़ की वजह से किले के पास कुछ गैरकानूनी निर्माण भी हुए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI समय-समय पर किले की मरम्मत और बहाली का काम करता है। इसमें किले की दीवारों की मरम्मत, बुर्ज़ों को मज़बूत करना और इसकी हिफाज़त के लिए ज़रूरी कदम उठाना शामिल है। इन कोशिशों का मक़सद किले की पुरानी शक्ल और विरासत को बचाने के साथ-साथ टूरिज़्म को बढ़ावा देना भी है।

बठिंडा का Qila Mubarak (किला मुबारक) सिर्फ़ ईंट और गारे से बनी एक इमारत नहीं है। ये भारत की पुरानी खुशहाली, बहादुरी, रूहानियत और इतिहास की लगातार चलती रवायत की निशानी है। ये किला हमें याद दिलाता है कि पंजाब सिर्फ़ भारत का कृषि केंद्र ही नहीं रहा, बल्कि उत्तर-पश्चिम से आने वाले हमलावरों के खिलाफ़ भारतीय उपमहाद्वीप की हिफाज़त करने वाले अहम दरवाज़ों में से एक भी रहा है।

आज ज़रूरत है कि हमारी नई पीढ़ी इस ऐतिहासिक विरासत के बारे में जाने और इसकी अहमियत को समझे। इस सदियों पुरानी विरासत को महफूज़ रखना सिर्फ़ सरकार की नहीं, बल्कि आम लोगों की भी साझा ज़िम्मेदारी है, ताकि आने वाली नस्लें भी किला मुबारक की इस शानदार विरासत पर फ़ख्र कर सकें।

स्टोरी – सविंदर कौर

इस लेख को अंग्रेज़ी और पंजाबी में भी पढ़े

ये भी पढ़ें: पंजाबी कवि बुल्ले शाह की दास्तान- मोहब्बत, सूफ़ियाना रंग और सादगी की मिसाल

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