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जब संस्कृति मिलती है टेक्नोलॉजी से: कोणार्क मंदिर से लेकर Dhana Dhanye Auditorium तक

कोलकाता में बना Dhana Dhanye Auditorium आज के मॉडर्न आर्किटेक्चर की एक दिलचस्प मिसाल है। शंख की शक्ल में बनी ये इमारत दिखाती है कि कैसे भारतीय संस्कृति के पुराने प्रतीक को आज की टेक्नोलॉजी और डिज़ाइन के साथ एक नया अंदाज़ दिया जा सकता है। भारत में आर्किटेक्चर की कहानी सिर्फ़ ईंट-पत्थर की कहानी नहीं है। ये बदलते वक़्त, बदलती टेक्नोलॉजी और बदलती सोच की भी कहानी है। हर दौर में यहां की इमारतों ने अपने समय की संस्कृति और पहचान को अपने अलग अंदाज़ में पेश किया है।

अगर हम हज़ारों साल पीछे जाएं, तो सांची स्तूप, कोणार्क का सूर्य मंदिर और दक्षिण भारत के मंदिर उस दौर की आर्किटेक्चर की झलक दिखाते हैं। बड़े पत्थर, ऊंचे शिखर, विशाल खंभे, बारीक नक़्काशी और मूर्तियां उस दौर की इमारतों की ख़ास पहचान थी। उस वक़्त किसी इमारत की ख़ूबसूरती सिर्फ़ उसकी ऊंचाई में नहीं, बल्कि पत्थरों पर की गई बारीक कारीगरी में भी नज़र आती थी।

Source: Indian Tech & Infra/X

शिखरों और नक़्काशी से शुरू हुआ सफ़र

सांची स्तूप जैसी इमारतें हमें भारत की पुरानी आर्किटेक्चर परंपरा की याद दिलाती हैं। वहीं कोणार्क का सूर्य मंदिर अपनी शानदार नक़्क़ाशी और पत्थरों पर किए गए बारीक काम के लिए जाना जाता है। दक्षिण भारत के मंदिरों में भी ऊंचे गोपुरम, विशाल प्रांगण और पत्थरों पर की गई नक़्काशी की ख़ास पहचान रहे हैं। इन इमारतों को देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उस दौर में आर्किटेक्चर सिर्फ़ एक इमारत खड़ी करने का काम नहीं था। इसमें कारीगरी, कल्चर और धार्मिक आस्था भी शामिल थे। फिर वक़्त बदला और भारत में आर्किटेक्चर का अंदाज़ भी बदलता गया।

गुंबद, मेहराब से European Architecture तक

मुग़ल दौर में भारतीय आर्किटेक्चर का अंदाज़ बदला और गुंबद, मेहराब, मीनार, जाली और बड़े दरवाज़े इमारतों की ख़ास पहचान बनने लगे। दिल्ली की कुतुब मीनार, हुमायूं का मकबरा और आगरा का ताजमहल इस दौर की अलग-अलग बनावट और कारीगरी की मिसाल हैं। इन इमारतों में बाहर से आए आर्किटेक्चर आइडिया और भारतीय कारीगरों की हुनरमंदी का खूबसूरत मेल दिखाई देता है।

यानी बाहर से आई कोई शैली यहां आकर वैसी की वैसी नहीं रही, बल्कि भारतीय संस्कृति और कारीगरी के साथ मिलकर उसका एक नया अंदाज़ बना। इसके बाद कोलोनियल दौर में यूरोपियन आर्किटेक्चर का असर बढ़ा और शहरों की इमारतों में Victorian Gothic और Art Deco जैसी शैलियां नज़र आने लगीं। Chhatrapati Shivaji Maharaj Terminus इसकी एक अच्छी मिसाल है।

आज़ादी के बाद आर्किटेक्चर ने ली नई करवट

आज़ादी के बाद भारत में इमारतों के डिज़ाइन को लेकर सोच बदली। अब कोशिश थी कि मॉडर्न तकनीक और लोगों की ज़रूरतों के साथ भारतीय संस्कृति और पहचान को भी जोड़ा जाए। आईआईटी अहमदाबाद, जयपुर का जवाहर कला केंद्र और दिल्ली का इंडिया हैबिटेट सेंटर इसी बदलते अंदाज़ की मिसाल हैं। इसके बाद लोटस टेंपल जैसी बिल्डिंगस सामने आईं, जहां मॉडर्न डिज़ाइन के साथ भारतीय संस्कृति के पुराने प्रतीक को जोड़ा गया।

Source: Social Media

कमल से शंख तक, पहचान वही लेकिन अंदाज़ नया

यही दिलचस्प बात हमें Dhana Dhanye Auditorium में भी दिखाई देती है। एक तरफ़ लोटस टेंपल का कमल है और दूसरी तरफ़ Dhana Dhanye Auditorium का शंख। दोनों की शक्ल अलग है, लेकिन दोनों के पीछे एक समान सोच नज़र आती है भारतीय संस्कृति से जुड़े पुराने प्रतीक को मॉडर्न आर्किटेक्चर में एक नई शक्ल देना।

शंख भारतीय संस्कृति में काफी पुराना और अहम प्रतीक है। ऐसे में इस प्रतीक को एक बड़े मॉडर्न ऑडिटोरियम की आर्किटेक्चर का हिस्सा बनाना इसे और दिलचस्प बना देता है। Dhana Dhanye Auditorium जैसी इमारतों में स्टील, ज़िंक, एडवांस लाइटिंग और मॉडर्न कंस्ट्रक्शन टेक्नोलोजी का इस्तेमाल किया गया है।

इसके स्ट्रक्चर में करीब 8,000 metric tonnes hollow steel sections इस्तेमाल किए गए हैं। इमारत की बुनियाद के लिए RCC pile foundation तैयार किया गया है। बाहर से देखने पर इसका डिज़ाइन जितना दिलकश है, अंदर से इसका स्ट्रक्चर उतना ही मज़बूत रखा गया है। लेकिन तकनीक बदलने के बावजूद एक चीज़ नहीं बदली अपनी पहचान को इमारत का हिस्सा बनाने की कोशिश।

Source: Indian Tech & Infra/X

Dhana Dhanye की ख़ूबसूरती रात में और बढ़ जाती है

Dhana Dhanye Auditorium की ख़ासियत सिर्फ़ इसकी शक्ल तक सीमित नहीं है। इसके शंख जैसे बाहरी हिस्से को ज़िंक शीट्स से कवर किया गया है। इस पर जापान से लाई गई स्पेशल लाइटिंग लगाई गई है, जिसकी मदद से ये शंख करीब 33,000 अलग-अलग रंगों में रोशन हो सकता है। दिन में जहां इसकी आर्किटेक्चर लोगों का ध्यान खींचती है, वहीं रात में इसकी रंग-बिरंगी रोशनी इसे एक अलग ही अंदाज़ देती है। यानी यहां एक पुराना cultural symbol modern lighting और तकनीक के ज़रिए बिल्कुल नई शक्ल में दिखाई देता है।

Dhana Dhanye Auditorium को सिर्फ़ एक बड़ा हॉल कहना शायद कम होगा। करीब 4.5 एकड़ में फैला ये पूरा कॉम्प्लेक्स कई सुविधाओं से लैस है। इसमें मेन ऑडिटोरियम में करीब 2,000 सीटें, छोटे ऑडिटोरियम में करीब 540 सीटें और करीब 300 लोगों के बैठने की जगह वाला खुला मंच है। यहां बड़े संगीत कार्यक्रमों से लेकर थिएटर, सांस्कृतिक कार्यक्रम और दूसरे आयोजन किए जा सकते हैं।

छह मंजिला इस इमारत में गेस्ट हाउस, रेस्टोरेंट, कैफेटेरिया, वीआईपी लाउंज, मीडिया लाउंज और सम्मेलन केंद्र जैसी सुविधाएं भी हैं। यहां बैंक्वेट हॉल भी हैं, जहां शादी, रिसेप्शन और दूसरे समारोह किए जा सकते हैं। इसके अलावा परिसर में फूड पार्क भी बनाया गया है। इसका घूमने वाला मंच भी ख़ास है। इसमें दो गोल हिस्से हैं, जिनकी मदद से अलग-अलग तरह के कार्यक्रम और प्रस्तुतियां आसानी से की जा सकती हैं। यही वजह है कि यहां संगीत कार्यक्रम, थिएटर, सांस्कृतिक कार्यक्रम, सम्मेलन और दूसरे बड़े आयोजन किए जा सकते हैं।

Dhana Dhanye Auditorium की ख़ास बनावट, बड़ी बैठने की जगह और आधुनिक सुविधाएं इसे कोलकाता की कला और मनोरंजन की दुनिया में एक ख़ास जगह देती हैं। समय के साथ इमारतों की बनावट बदली, सामान बदला, तकनीक बदली और लोगों की ज़रूरतें भी बदली। लेकिन हर दौर में आर्किटेक्चर ने किसी न किसी तरह हमारी संस्कृति और पहचान को अपने साथ जोड़े रखा।

शायद यही भारतीय आर्किटेक्चर की सबसे ख़ूबसूरत बात है ये पुराना होकर भी रुकता नहीं और मॉर्डन होकर भी अपनी जड़ों से दूर नहीं होता। Dhana Dhanye Auditorium इसी सफ़र का एक नया अध्याय है। यहां सदियों पुराना शंख, आज के स्टील, ज़िंक, लाइट और टेक्नोलॉजी के साथ मिलकर एक नई दास्तान कहता है।

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