Friday, August 21, 2026
29 C
Delhi

महाराजा रणजीत सिंह के दौर से UNESCO तक, जंडियाला गुरु की सदियों पुरानी Thathera Art को बचाने की कोशिश

पंजाब के अमृतसर ज़िले में बसा छोटा-सा कस्बा जंडियाला गुरु अपने अंदर एक अनमोल विरासत समेटे हुए है। यहां के Thathere (ठठेरे) कई पीढ़ियों से तांबे, पीतल और कांसे के बर्तन अपने हाथों से बनाते आ रहे हैं। Thathera Art में धातु को भट्ठी में गर्म करना और फिर हथौड़े की एक-एक चोट से उसे ख़ूबसूरत शक्ल देना है। ये कारीगरों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है।

बिना किसी मशीन के, ये कारीगर अपने हुनर और मेहनत से साधारण धातु को खूबसूरत बर्तनों में बदल देते हैं। इस पारंपरिक कारीगरी को साल 2014 में UNESCO ने ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ की फेहरिस्त में शामिल किया था। ये भारत की पहली ऐसी मेटल क्राफ्ट परंपरा है, जिसे UNESCO से ख़ास पहचान मिली।

भांडे नहीं, कारीगरी का हुनर

गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर के भाषा विज्ञान के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर और Indian National Trust for Art and Cultural Heritage के पूर्व वाइस-चेयरमैन डॉ. सुखदेव सिंह बताते हैं कि UNESCO से मिली ये पहचान बहुत ख़ास मायने रखती है।

विरासत दो तरह की होती है। एक होती है ‘Tangible’, यानी ऐसी चीज़ें जिन्हें हम छू सकते हैं, जैसे इमारतें या बर्तन। दूसरी होती है ‘Intangible’, यानी किसी काम को करने का हुनर, तरीका और उससे जुड़ा इल्म।

UNESCO ने जंडियाला गुरु के भांडों को नहीं, बल्कि Thathero (ठठेरों) के हाथ से काम करने के उस ख़ास हुनर को पहचान दी है। धातु को किस तरह गर्म करना है और हथौड़े की कितनी चोट से उसे सही शक्ल देनी है, ये कोई आसान काम नहीं है। ये एक ऐसा बारीक हुनर है, जो Thathere (ठठेरे) पीढ़ी दर पीढ़ी अपने बच्चों को सिखाते आ रहे हैं।

Source: Sadda Punjab

महाराजा रणजीत सिंह का दौर

डॉ. सुखदेव सिंह बताते हैं कि 1883 में अंग्रेज़ों की ओर से छापे गए ‘अमृतसर डिस्ट्रिक्ट गजेटियर’ में जंडियाला गुरु के Thathero (ठठेरों) का ख़ास ज़िक्र मिलता है। गजेटियर के मुताबिक, उस दौर में जंडियाला गुरु तांबे और पीतल के बर्तनों की एक बड़ी मंडी था। यहां बने बर्तन दूर-दूर तक भेजे जाते थे।

इससे पहले महाराजा रणजीत सिंह के दौर में इस कारीगरी को सरकारी सरपरस्ती मिली। यहां तक कि कश्मीर से भी कई कारीगरों को लाकर जंडियाला गुरु में बसाया गया। फिर 1947 के बंटवारे के वक़्त कई मुस्लिम कारीगर पाकिस्तान चले गए। वहीं, गुजरांवाला से आए कई हिंदू-सिख कारीगर जंडियाला गुरु में आकर बस गए। हालांकि, तांबे और पीतल के बर्तन बनाने का काम बटाला, फगवाड़ा, होशियारपुर और जगाधरी में भी होता था, लेकिन जंडियाला गुरु इस कारीगरी का सबसे बड़ा गढ़ बन गया।

धातुओं का इल्म और पुरानी परंपरा

Thathera (ठठेरा) कारीगरी में इस्तेमाल होने वाली धातुओं के बारे में डॉ. सुखदेव सिंह बताते हैं कि इसकी बुनियादी धातु तांबा है। जब तांबे में ‘टिन’ मिलाया जाता है, तो कांसा बनता है। वहीं, तांबे में ‘जिंक’ मिलाने से पीतल तैयार होता है। इन अलग-अलग धातुओं को हमारी रोज़मर्रा की ज़रूरतों के हिसाब से तैयार किया जाता था। कारीगरों को इन धातुओं की खूबियों और उनके सही इस्तेमाल का इल्म पीढ़ियों से हासिल होता आया है।

Source: Sadda Punjab

रसोई में स्टील का बढ़ता चलन

एक वक़्त था जब हर घर की रसोई, शादियों और गुरुद्वारों के लंगर में बड़े-बड़े पीतल और तांबे के बर्तन इस्तेमाल होते थे। लेकिन वक़्त के साथ लोगों का लाइफस्टाइल बदला और स्टील का चलन बढ़ता गया। डॉ. सुखदेव सिंह के मुताबिक, इसके पीछे कुछ बड़ी वजहें हैं:

देखभाल: तांबे और पीतल के बर्तनों में खट्टी चीज़ें रखने के लिए उन पर ‘कलई’ करवानी पड़ती थी। वहीं, स्टील के बर्तनों को साबुन से धोना काफी आसान है।

कीमत और मेहनत: स्टील के बर्तन मशीनों से बनते हैं, इसलिए वो सस्ते मिल जाते हैं। दूसरी तरफ, हाथ से बर्तन बनाने में काफी वक़्त और मेहनत लगती है, जिसकी वजह से उनकी कीमत ज़्यादा होती है।

आसानी से मिलना: बाज़ार में स्टील और प्लास्टिक के ‘यूज़ एंड थ्रो’ बर्तनों का चलन बढ़ने से पारंपरिक बर्तनों की मांग भी कम हो गई है।

तांबे-पीतल के बर्तनों के सेहतमंद फ़ायदे

बुज़ुर्ग अक्सर रात में तांबे के बर्तन में पानी रखकर सुबह पीने की सलाह देते थे। डॉ. सुखदेव सिंह बताते हैं कि हमारे जिस्म को सिर्फ़ खाने-पीने की चीज़ों की ही नहीं, बल्कि कई तरह के मिनरल्स और धातुओं की भी ज़रूरत होती है। जब हम तांबे या पीतल के बर्तनों में खाना पकाते या उनमें पानी पीते थे, तो इन धातुओं के कुछ तत्व खाने या पानी के ज़रिए हमारे जिस्म तक पहुंचते थे। माना जाता था कि इससे जिस्म में इनकी कमी पूरी करने में मदद मिलती है। इस तरह ये रवायती बर्तन हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सेहत से जुड़ी एक पुरानी परंपरा का हिस्सा थे।

Source: Sadda Punjab

संकट में घिरा ये हुनर

जिस कारीगरी को दुनिया भर में पहचान मिली है, आज उसी के कारीगर अपना हुनर बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। डॉ. सुखदेव सिंह बताते हैं कि जब उनकी टीम ने इस पर रिसर्च की, तो पता चला कि एक वक़्त जंडियाला गुरु में करीब 400 कारीगर हुआ करते थे। लेकिन धीरे-धीरे इनकी तादाद घटकर सिर्फ़ 30-40 रह गई। नई पीढ़ी भी इस मुश्किल और मेहनत वाले काम को अपनाने के लिए तैयार नहीं थी। कारीगरों की आमदनी कम होने की एक बड़ी वजह कच्चे माल की बढ़ती कीमत और बिचौलिये हैं।

कच्चे माल की नीलामी: पहले फौज के स्क्रैप, बिजली की मोटरों की तार और पुराने बर्तनों जैसे कच्चे माल के लिए कारीगरों का कोटा तय होता था।

बड़े व्यापारियों का दबदबा: बाद में सरकार और मिलिट्री ने कच्चे माल की नीलामी शुरू कर दी। बड़े व्यापारियों ने बोली लगाकर कच्चा माल खरीद लिया। इसके बाद कारीगर खुद मालिक बनने के बजाय सिर्फ़ दिहाड़ी पर काम करने वाले मज़दूर बनकर रह गए।

सरकारी टैक्स: छोटे कारोबार पर GST जैसे टैक्स लगने से बर्तनों की कीमत और बढ़ गई, जिससे उनकी बिक्री पर भी असर पड़ा।

Source: Sadda Punjab

विरासत को बचाने की कोशिश

इस विरासत को बचाने के लिए डॉ. सुखदेव सिंह बताते हैं कि पंजाब सरकार ने इस कारीगरी के लिए GI Tag (Geographical Indication Tag) के लिए अप्लाई किया है। अगर GI Tag मिल जाता है, तो बाज़ार में ये पहचान हो जाएगी कि ये बर्तन जंडियाला गुरु के कारीगरों ने ही बनाए हैं। इससे इन बर्तनों की मार्केट वैल्यू भी बढ़ सकती है।

इसके अलावा, कारीगरों ने भी वक़्त के साथ अपने काम में कुछ नई चीज़ें शामिल की हैं। पहले वो सिर्फ़ थालियां, गिलास, कटोरियां, बाल्टियां और गागर बनाते थे। लेकिन अब उन्होंने पीतल के प्रेशर कुकर भी बनाना शुरू कर दिया है। डॉ. सुखदेव सिंह ने इस कारीगरी पर ‘Thatheras of Jandiala Guru’ नाम से एक अंग्रेज़ी किताब भी लिखी है। उनका कहना है कि सरकार को इन बर्तनों पर GST से छूट देनी चाहिए और सरकारी एम्पोरियम के ज़रिए इनकी बिक्री को बढ़ावा देना चाहिए।

आम लोगों को भी चाहिए कि वो स्टील के साथ-साथ पीतल और तांबे के बर्तन खरीदकर इन कारीगरों का साथ दें। क्योंकि जंडियाला गुरु के Thathere (ठठेरे) सिर्फ़ बर्तन नहीं बनाते, बल्कि हमारी सदियों पुरानी विरासत और हुनर को ज़िंदा रख रहे हैं।

स्टोरी– मनमीत कौर

इस लेख को पंजाबी में पढ़ें

ये भी पढ़ें: लखनऊ के तांबे और पीतल के बर्तनों की नायाब विरासत की कहानी

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सब्सक्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

शाहिद अहमद देहलवी: दिल्ली की तहज़ीब और उर्दू अदब के अमीन

उर्दू अदब की दुनिया में शाहिद अहमद देहलवी का...

डिप्टी नज़ीर अहमद: उर्दू अदब में इस्लाह, तालीम और तरक़्क़ी की एक नई आवाज़

उर्दू अदब की तारीख़ में डिप्टी नज़ीर अहमद का...

Patiala Cleanliness Drive: ‘मेरा पटियाला मैं ही संवारूं’—एक सोच से शुरू हुई मुहिम, बनी लोगों की आवाज़

साफ़-सुथरी सड़कें, खुला और हवादार माहौल और चारों तरफ़...

खयाल दर्पण : हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का विभाजन

एक छोटे से कमरे में टूटे कूलर और कबाड़...

Topics

शाहिद अहमद देहलवी: दिल्ली की तहज़ीब और उर्दू अदब के अमीन

उर्दू अदब की दुनिया में शाहिद अहमद देहलवी का...

नीरज की कलम से निकली मोहब्बत और इंसानियत की आवाज़

“अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए,जिसमें इंसान...

Victoria Memorial: कोलकाता की रूह, जहां मिलते हैं माज़ी और मुस्तक़बिल

कोलकाता (Kolkata) के दिल में, जहां ऐतिहासिक मैदान Queensway...

अमृता प्रीतम: मोहब्बत, तन्हाई और बंटवारे के दर्द की आवाज़

20वीं सदी की अदबी दुनिया में अमृता प्रीतम एक...

Related Articles

Popular Categories