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आज़ादी की पहली मशाल : 1947 से पहले ही जिन्होंने विदेशों में लहराया था तिरंगा,भिकाजी कामा का वो अमर सफ़र

आज़ादी का जश्न मनाते हुए हम 15 अगस्त 1947 को याद करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके करीब चार दशक पहले ही एक भारतीय महिला ने विदेशी धरती पर तिरंगा लहराकर दुनिया को बता दिया था “ये भारत की आज़ादी का झंडा है, ये पैदा हुआ है!”

जी हां, 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के शहर स्टटगार्ट में चल रहे ‘इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांग्रेस’ में मैडम भिकाजी कामा (Madam Bhikaji) ने वो काम किया, जिसकी हिम्मत उस दौर में किसी में नहीं थी। उन्होंने हरे, केसरिया और लाल रंग की तिरंगी पताका दिखाई, जिस पर संस्कृत में ‘वंदे मातरम्’ लिखा था और पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। जर्मन अख़बार ‘लाइपजिगर जेतुंग’ ने लिखा-‘जब उन्होंने रेशमी तिरंगा दिखाया, तो अंतरराष्ट्रीय समर्थन के नारे थमने का नाम नहीं ले रहे थे।’

भिकाजी कामा (Image-Wikipedia)

कौन थीं भिकाजी कामा ?

सितंबर 1861 में बंबई (अब मुंबई) के एक अमीर पारसी परिवार में पैदा हुई भिकाजी की शादी रुस्तम कामा से हुई, लेकिन अंग्रेज़ों के प्रति सोच में फर्क के चलते उनका अलगाव हो गया। भिकाजी (Madam Bhikaji) को भारत की ग़ुलामी काटी नहीं खा रही थी, जबकि पति अंग्रेज़ी राज को ‘रहमत’ समझते थे।

भिकाजी कामा (Image-Wikipedia)

1902 में बीमारी के इलाज के लिए लंदन गईं तो वहां दादाभाई नौरोजी से मिलीं, लेकिन जल्द ही लोकमान्य तिलक और अरविंद घोष की क्रांतिकारी विचारधारा ने उन्हें खींच लिया। लंदन के ‘इंडिया हाउस’ में श्यामजी कृष्ण वर्मा और विनायक दामोदर सावरकर से मिलने के बाद तो उनकी ज़िंदगी  ही बदल गई। वे हाइड पार्क में जाकर अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ भाषण देने लगीं।

पेरिस : इंकलाब का नया अड्डा

1909 में ब्रिटिश खुफ़िया नज़रों से बचने के लिए वे पेरिस चली गईं, जहां उन्होंने सावरकर को भी शरण दी। बाद में सावरकर की गिरफ़्तारी और कालापानी की सज़ा ने उन्हें झकझोर दिया।  प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान फ्रांसीसी अधिकारियों ने उन्हें तीन साल के लिए नज़रबंद भी रखा, मगर उनका जज़्बा कम नहीं हुआ।

भिकाजी कामा (Image-Wikipedia)

ज़िन्दगी भर कुर्बानियां, आख़िरी सांस तक तन्हा

भिकाजी ने अपनी मां के गहने तक बेच दिए और सावरकर की क़ानूनी लड़ाई के लिए पैसे जुटाए। करीब 35 साल तक वे परदेस में रहीं, एक बोर्डिंग हाउस में। 1936 में जब वे वापस मुंबई आईं तो बीमार थीं। पारसी जनरल हॉस्पिटल में 8 महीने बिताने के बाद 16 अगस्त 1936 को उन्होंने दम तोड़ दिया। वो दुनिया से लगभग अनजानी ही चली गईं।

भिकाजी के झंडे में क्या था ख़ास ?

  • इस झंडे में तीन पट्टियां थीं:-
  • ऊपर हरा (8 सितारे, जो उस वक़्त के 8 प्रांत थे)
  • बीच में केसरिया (जिस पर ‘वंदे मातरम्’ उकेरा था)
  • नीचे लाल (पास में अर्धचंद्र और तीर)

हालांकि ये आज के तिरंगे से अलग था, पर ये भारत की पहचान और आज़ादी की पुकार था।

आख़िरी पैगाम

भिकाजी कामा वो महिला थीं, जिन्होंने न सिर्फ़ झंडा दिखाया, बल्कि पूरी दुनिया से अपील की ‘आज़ादी के दीवानो! इस ग़ुलामी की ज़ंजीरों से एक-पांचवीं मानवता को मुक्त करने में हमारा साथ दो।’

 जिनका नाम भले ही किताबों में कम मिले, मगर हर 15 अगस्त को जब तिरंगा लहराता है, उसकी हर लहर में भिकाजी कामा की आवाज़ गूंजती है- ‘ये झंडा भारत की आज़ादी का है, इसे देखो, ये पैदा हुआ है!’ 

ये भी पढ़ें- चौमहल्ला पैलेस: हैदराबाद की शान, निज़ामों की विरासत

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