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मुगा सिल्क: सोने जैसे चमकती असम की विरासत, दुल्हनों के लिए सुनहरा तोहफ़ा   


अगर सिल्क की बात हो, तो ज़हन में रेशम या बनारसी साड़ी आती है, लेकिन भारत के पास एक ख़ास सिल्क है जिसे मुगा रेशम (Muga Silk) कहते हैं। इसे अक्सर ‘भारत का सुनहरा रेशम’ कहा जाता है। यह सिर्फ़ असम में पैदा होता है और इसकी चमक कुदरती सोने जैसी होती है। यह रेशम इतना मज़बूत है कि पीढ़ियों तक चलता है और हर बार धोने पर इसकी रौनक बढ़ती है। ये ख़ूबी किसी और रेशम में नहीं है।

 Image- Social Media 

हज़ारों सालों का सफ़र

मुगा सिल्क का ज़िक्र हज़ार साल पुरानी असमिया किताबों और राजाओं के अभिलेखों में मिलता है। कहा जाता है कि आहोम राजवंश (Ahom Dynasty-1228–1826) में यह सिर्फ़ राजा-महाराजाओं और अमीर-उमरा (Aristocratic) के पहनने को मिलता था। नाम ‘मुगा’ असमिया भाषा से आया है, जिसका मतलब ‘एम्बर’ (पीला-भूरा) होता है जो इसके कुदरती सुनहरे रंग को बयान करता है। उस ज़माने में मुगा को विदेशी मेहमानों को तोहफे (Gift) में दिया जाता था,इतना कीमती समझा जाता था।

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कैसे बनता है मुगा सिल्क

मुगा का कीड़ा (Antheraea assamensis) सिर्फ़ असम में पाया जाता है। इसे सोम और सोआलू नाम के पेड़ों की पत्तियों पर पाला जाता है। ये कीड़े सिर्फ़ इन्हीं पत्तियों को खाते हैं, इसीलिए उनका रेशम इतना बेहतरीन होता है। 

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जब कीड़ा बड़ा होकर सुनहरा कोकून बनाता है, तो किसान उसे बिना कीड़े को मारे (अहिंसक तरीके से) तोड़ते हैं। इसे ‘अहिम्सा सिल्क’ भी कहा जाता है। फिर कोकून को पानी में उबालकर रेशम के धागे निकाले जाते हैं। सबसे ख़ास बात कि मुगा सिल्क हर बार धुलाई के बाद और चमकता और मज़बूत होता है, जबकि बाकी रेशम धोने पर ख़राब हो जाते हैं।

ख़ासियतें जो मुगा को अनोखा बनाती हैं

  • कुदरती सुनहरी चमक : जो वक्त के साथ और गहरी होती है
  • बहुत मज़बूत  : सालों, बल्कि पीढ़ियों तक चले
  • आरामदायक  : गर्मी-सर्दी दोनों में पहन सकते हैं
  • धोने पर चमक बनी रहती है  : ये केवल मुगा में है
  • पर्यावरण-अनुकूल  : यह  बायोडिग्रेडेबल है 

असम की पहचान और सांस्कृतिक अहमियत

असम में मुगा सिर्फ़ कपड़ा नहीं, बल्कि शान-ओ-शौकत, प्योरिटी और परंपरा की निशानी है। यहां की औरतें मेखला-चादर पहनती हैं, जिस पर सुनहरी कढ़ाई होती है। मर्द शेरवानी और कुर्ता बनवाते हैं, ख़ासतौर पर शादियों और बिहू (असमी नया साल) के मौके पर। गामोसा जो एक ख़ास कपड़ा है धार्मिक रस्मों में इज़्ज़त के तौर पर भेंट किया जाता है। माना जाता है कि मुगा पहनना शुभ होता है। असमिया दुल्हनों के लिए इसकी बनी साड़ी जो वो अपनी शादी के दिन पहनती हैं काफी ख़ास होती है, इसको पहनना शुभ माना जाता है।

अर्थव्यवस्था और पर्यावरण-दोनों के लिए फ़ायदेमंद

मुगा उद्योग असम के गांवों में हज़ारों कारीगरों, ख़ासतौर पर औरतों को रोज़गार देता है। यह पूरी तरह कुदरती है। इसमें किसी केमिकल की ज़रूरत नहीं। जो प्लास्टिक और सिंथेटिक कपड़े पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं, मुगा उसका उल्टा ये पर्यावरण का दोस्त है।

सुनहरी विरासत ख़तरे में

  • जंगल कट रहे हैं, जिससे कीड़ों को खाने के पेड़ कम हो गए
  • मौसम बदल रहा है, बारिश-गर्मी का नियम नहीं, जिससे सिल्क कमज़ोर होता है
  • सस्ते सिंथेटिक कपड़ों की भरमार, जिससे मुगा की मांग घटी
  • नए लोग इस पेशे में नहीं आना चाहते, इसलिए कारीगर कम पड़ रहे हैं
  • नकली मुगा बाज़ार में आ गया है,असली पहचानना मुश्किल

सरकारी उपाय और उम्मीदें

ख़ुशखबरी ये है कि भारत सरकार और सेंट्रल सिल्क बोर्ड ने मुगा को GI टैग (भौगोलिक पहचान) दिया है यानी अब सिर्फ़ असली असम के मुगा को ही ये नाम मिलेगा। किसानों को सब्सिडी, नई तकनीक, और प्रशिक्षण दिया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय फैशन शोज़ में मुगा को पेश किया जा रहा है। आधुनिक डिज़ाइन के साथ मिलाकर इसे नई पीढ़ी के लिए आकर्षक बनाया जा रहा है।

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मुगा सिल्क सिर्फ़ एक कपड़ा नहीं  ये असम की रूह, उसके कारीगरों की मेहनत, और सदियों का हुनर है। अगर आप असली मुगा ख़रीदेंगे, तो आप एक कारीगर के घर रोज़ी-रोटी पहुंचाएंगे, एक पेड़ बचाएंगे  और एक हज़ार साल पुरानी परंपरा को ज़िंदा रखेंगे।

‘मुगा सिर्फ़ रेशम नहीं, सोने की तरह चमकती संस्कृति है।’

ये भी पढ़ें-  बिहार की सुजनी कढ़ाई: कपड़े पर बुनती कहानियां, ख़्वाब और पहचान

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