पंजाबी संस्कृति में त्योहारों की एक लंबी और समृद्ध रवायत रही है। ये त्योहार सिर्फ़ मज़हबी या मौसम में बदलाव का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि हमारे सामाजिक रिश्तों, खुशियों और लोक कलाओं को भी ज़िंदा रखने का ज़रिया हैं। पंजाबी संस्कृति में “तियां” या “तीज” का त्योहार बेटियों और बहनों के प्यार, आज़ादी और खुशी की ख़ास निशानी माना जाता है। सावन के महीने में मनाया जाने वाला तियां का त्योहार पंजाब की बेटियों के लिए एक बेहद ख़ास और खुशनुमा वक़्त होता है। हालांकि, वक़्त के साथ लोगों का रहन-सहन बदला है और इसी के साथ तियां मनाने का तरीका भी काफी हद तक बदल गया है।
तीज का इतिहास और सांस्कृतिक अहमियत
पुरानी मान्यताओं के मुताबिक, तीज का त्योहार देवी पार्वती और भगवान शिव के दोबारा मिलन की याद में मनाया जाता है। कहा जाता है कि देवी पार्वती ने भगवान शिव को अपने शौहर के तौर पर पाने के लिए कड़ी तपस्या की थी। उनकी तपस्या के बाद सावन महीने के शुक्ल पक्ष की तीसरी तिथि को उन्हें शिव जी की प्राप्ति हुई थी।
पंजाबी लोक-ज़िंदगी में तियां या तीज को मौसम और सामाजिक ज़िंदगी से भी जोड़कर देखा जाता है। सावन का महीना तेज़ गर्मी के बाद बारिश लेकर आता है और चारों तरफ़ हरियाली छा जाती है। पुराने वक़्त में शादीशुदा बेटियां सावन में अपने मायके आती थी। वहां बचपन की सहेलियों से मिलना, साथ वक़्त गुज़ारना और अपने सुख-दुख साझा करना ही तियां या तीज की असली रूह मानी जाती थी।

पंजाब में तियां से जुड़ी ख़ास चीज़ें
तियां या तीज के त्योहार के साथ कई ऐसी रवायती चीज़ें जुड़ी हुई हैं, जो इस त्योहार की ख़ूबसूरती और रूह को बनाए रखती हैं।
संधारा: बेटी के मायके वालों की तरफ़ से भेजी जाने वाली ख़ास सौगात। इसमें मिठाइयां, ख़ासकर घेवर और मट्ठियां, सूट, चूड़ियां, मेहंदी और सजने-संवरने का सामान शामिल होता है।
पींग: गांवों की साझा जगहों पर पीपल, बरगद और नीम के पेड़ों पर मोटी रस्सियों से पींग डाली जाती थी। लड़कियां इन पर झूलती और आसमान को छूने की कोशिश करती थी। पींग तियां या तीज की खुशियों का अहम हिस्सा माना जाता था।
गिद्धा और बोलियां: तियां का गिद्धा पंजाबी लोक-नाच की ख़ास पहचान है। बोलियों के ज़रिए बेटियां अपने दिल की बातें, सास-ननद के साथ खट्टे-मीठे रिश्ते, भाइयों का प्यार और समाज से जुड़े कई मुद्दों का इज़हार करती थी।
खीर और पूड़े: सावन की लगातार बारिश के दिनों में घर-घर खीर और पूड़े बनाए जाते थे। ये तियां या तीज के ख़ास रवायती पकवान माने जाते हैं और त्योहार की रौनक बढ़ाते हैं।

पुराने गांवों की तियां: कुदरत और आपसी मेल का संगम
पुराने ज़माने में गांवों में आज की तरह बड़े पैलेस या हॉल नहीं होते थे। लड़कियां गांव से बाहर किसी खुले बरगद या पीपल के पेड़ की छांव में या तालाब के किनारे इकट्ठा होती थी। यही जगहें तियां की रौनक का हिस्सा बन जाती थी।
कुदरती माहौल: न कोई स्टेज होती थी और न ही लाउडस्पीकर। बरगद के पेड़ की घनी छांव में पींग डाली जाती थीं और लड़कियां झूला झूलती थी। बारिश के मौसम में तालाब या पानी के किनारे ठंडी हवा चलती थी, इसलिए ऐसी जगहें तियां मनाने के लिए बेहद ख़ास मानी जाती थी।
सच्चा आपसी प्यार: गांव की सभी बेटियां, चाहे उनका मज़हब या जाति कुछ भी हो, एक ही जगह इकट्ठा होती थी। बुज़ुर्ग औरतें भी पेड़ों की छांव में बैठकर लड़कियों का गिद्धा देखती और उनकी खुशियों में शामिल होती थी।
दिल की बात कहने का ज़रिया: उस दौर में औरतों को अपने मन की बात खुलकर कहने की ज़्यादा आज़ादी नहीं थी। तियां का मेला उनके लिए एक ऐसा मौक़ा होता था, जहां वो बोलियों के ज़रिए अपने दुख, तकलीफ़ और दिल की बातें ज़ाहिर कर सकती थी। इस तरह तियां उनके लिए दिल का बोझ हल्का करने का एक ज़रिया भी था।

आज के दौर की तियां: स्टेज और क्लबों तक सिमटी
आज के आधुनिक दौर में तियां या तीज का रंग-रूप काफ़ी बदल गया है। अब गांवों के बाहर पहले जैसे पीपल और बरगद के पेड़ और खुले आंगन कम ही नज़र आते हैं। इसके साथ ही तियां या तीज मनाने का तरीक़ा भी बदल गया है।
रवायत से सांस्कृतिक प्रोग्राम तक: अब तियां या तीज गांव की गलियों और खुले मैदानों से निकलकर स्कूल, कॉलेज, पैलेस और होटलों तक पहुंच गई हैं। पहले जहां ये एक कुदरती मेल-जोल का मौक़ा होता था, वहीं अब ये एक मुनज़्ज़म सांस्कृतिक प्रोग्राम का रूप ले चुका है।
डीजे और बनावटी शो: पहले तियां या तीज में ढोलकी की थाप और लड़कियों की अपनी आवाज़ में गाई जाने वाली बोलियां होती थी। अब उनकी जगह DJ और बड़े साउंड सिस्टम ने ले ली है। इससे तियां की पुरानी रौनक और रवायती अंदाज़ काफी बदल गए हैं।
विदेशों में तियां: इस बदलाव के बीच एक अच्छी बात ये भी है कि कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में रहने वाली पंजाबी औरतें कम्युनिटी हॉल में इकट्ठा होकर बड़े चाव से तियां मनाती हैं। इससे वो सात समंदर पार रहकर भी अपनी पंजाबी विरासत, संस्कृति और मिट्टी से जुड़ी रहती हैं।
पुरानी और नई तियां में क्या बदला?
पुराने वक़्त और आज के दौर की तियां में काफी फर्क़ आ गया है। पहले तियां या तीज गांव की गलियों, पीपल की छांव और खुले खेतों में मनाई जाती थीं। वहीं आज तियां या तीज कॉलेज, मैरिज पैलेस, क्लब, होटल और DJ हॉल तक पहुंच गई हैं। पहले लड़कियां पेड़ों पर मोटी रस्सियों से पींग डालकर झूला झूलती थीं, लेकिन अब उनकी जगह लोहे के झूले या सिर्फ़ स्टेज की सजावट ने ले ली है।
पहले बिना किसी लाउडस्पीकर के ढोलकी, तालियों और बोलियों से तियां या तीज की रौनक जमती थी। आज रिकॉर्डेड गाने और DJ ने उसकी जगह ले ली है। पहले तियां या तीज का असली मक़सद बचपन की सहेलियों से मिलना और उनके साथ अपनी खुशियां और दुख साझा करना होता था। अब ये कई जगहों पर एक दिन के मनोरंजन, फोटोग्राफी और सोशल मीडिया पोस्ट तक सिमटती जा रही है।

इसी तरह, पहले औरतें साधारण देसी सूट और सादे श्रृंगार में तियां मनाने आती थीं। अब स्टेज और शो-ऑफ के लिए भारी और ख़ास पारंपरिक कपड़े पहनने का चलन बढ़ गया है। यानी वक़्त के साथ तियां या तीज का अंदाज़ बदला है, लेकिन इसके पीछे जुड़ी खुशियां और अपनी संस्कृति से जुड़ने की चाह आज भी कायम है।
आज के दौर की ज़रूरत: अपनी विरासत को बचाना
हर चीज़ का बदलना कुदरत का नियम है। आज औरतें पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर हो रही हैं और उनका सामाजिक दायरा भी पहले से काफी बदल गया है। लेकिन तियां या तीज जैसे रवायती त्योहारों की असल भावना को ज़िंदा रखना भी बहुत ज़रूरी है। हमें नई पीढ़ी को सिर्फ़ स्टेज पर नाचने और मनोरंजन तक सीमित नहीं रखना चाहिए।
उन्हें ये भी बताना चाहिए कि तियां के पीछे आपसी मेल-जोल, कुदरत से मोहब्बत और रिश्तों की अहमियत जैसी कई खूबसूरत बातें जुड़ी हैं। इसके अलावा, गांवों में फ़िर से ऐसे साझा प्लेटफॉर्म बनाए जाने चाहिए, जहां बेटियां बिना किसी दिखावे के अपनी विरासत से जुड़ सकें और तियां को उसकी पुरानी रूह और रवायत के साथ मना सकें।
स्टोरी– मनमीत कौर
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