जब हम Vote (वोट) डालने जाते हैं, तो हमारे दिमाग में क्या चल रहा होता है? क्या हमारा फैसला सिर्फ़ उस वक़्त के राजनैतिक माहौल, किसी नेता की बात, परिवार की सोच या अपनी ज़िंदगी के अनुभव से बनता है? या फिर हमारे व्यवहार के पीछे हमारी बायोलॉजी का भी कोई हिस्सा काम करता है? आमतौर पर वोटिंग को राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और लोगों की अपनी पसंद से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन पूर्व IRS अधिकारी और biology के स्टूडेंट्स रहे Dr. Devi Prasad Semwal ने इस सवाल को एक अलग तरह से देखने की कोशिश की है।
उन्होंने लंबे वक़्त तक लोकसभा चुनावों के वोटिंग पैटर्न्स को पढ़ा और उन्हें कुछ ऐसे रेश्यो दिखाई दिए, जो उन्हें जेनेटिक्स में बताए गए Mendelian ratios से मिलते-जुलते लगे।
इसी सोच पर उन्होंने अपनी किताब ‘Ratios in the Republic’ लिखी है। हालांकि Dr. Devi Prasad Semwal इसे जेनेटिक्स और वोटिंग के बीच वैज्ञानिक कनेक्शन नहीं बताते। उनका कहना है कि उन्हें कुछ पैटर्न्स में समानता दिखाई दी है, लेकिन इस कनेक्शन को पूरी तरह समझने के लिए अभी और रिसर्च की ज़रूरत है।
चुनावी नतीजों से शुरू हुई कहानी
इस पूरे आइडिया की शुरुआत एक इलेक्शन ड्यूटी के दौरान हुई। Dr. Devi Prasad Semwal को इलेक्शन कमीशन की तरफ़ से West Bengal की एक Lok Sabha constituency में Expenditure Observer बनाया गया था। चुनावी खर्च पर नज़र रखने के साथ उन्हें पुराने इलेक्शन रिकॉर्ड और रिज़ल्ट को देखने का भी मौक़ा मिला। Dr. Devi Prasad Semwal बायोलॉजी के स्टूडेंट रहे हैं और जेनेटिक्स भी पढ़ चुके हैं।
इसलिए जब उन्होंने अलग-अलग चुनावों के नंबर और रिज़ल्ट को देखा, तो उनका ध्यान Gregor Johann Mendel की तरफ़ गया। Mendel ने pea plants पर experiments के ज़रिए ये समझने की कोशिश की थी कि अलग-अलग traits एक जनरेशन से दूसरी जनरेशन तक किस तरह पास होते हैं। उनके एक्सपेक्टमेंट्स में कुछ ख़ास रेश्यो सामने आए।
Dr. Devi Prasad Semwal बताते हैं कि चुनावी नतीजों को देखते हुए उन्हें भी कुछ ऐसे पैटर्न दिखाई दिए, जो उन्हें Mendelian ratios से मिलते-जुलते लगे। यहीं से उन्होंने वोटिंग व्यवहार को जेनेटिक्स के लेंस से देखना शुरू किया। लेकिन यहां एक बात साफ़ है किसी इलेक्शन रिज़ल्ट में कोई रेश्यो दिखाई देना अपने आप में ये साबित नहीं करता कि उसके पीछे जेनेटिक्स ही ज़िम्मेदार है। डॉ. सेमवाल भी इसे एक ऐसी रिसर्ट फाइंडिंग के तौर पर देखते हैं, जिसे आगे डेटा और साइंटिफिक स्टडी के ज़रिए जांचने की ज़रूरत है।

क्या जीन तय करता है कि हम किसे वोट देंगे?
शायद इस रिसर्च को समझने का सबसे अहम पॉइंट यही है। डॉ. सेमवाल ये नहीं कहते कि अगर किसी पिता ने किसी एक पार्टी को वोट दिया, तो उसके बेटे को भी वही जीन मिला और इसलिए उसने भी उसी पार्टी को वोट दे दिया। उनके मुताबिक human behaviour इतना आसान नहीं है। एक इंसान का वोट देने का फैसला कई चीज़ों से मिलकर बन सकता है।
किसी व्यक्ति का फैमिली बैकग्राउंड क्या है, घर में राजनीति को लेकर कैसी बातचीत होती है, उसकी आर्थिक स्थिति कैसी है, उसने अपनी ज़िंदगी में क्या देखा है, किसी नेता की छवि उसके सामने कैसी बनी है—ये सब उसके फैसले को प्रभावित कर सकते हैं। कई बार ऐसा भी हो सकता है कि कोई व्यक्ति घर से एक कैंडिडेट या पार्टी को वोट देने का मन बनाकर निकले, लेकिन पोलिंग स्टेशन पर जाकर उसका फैसला बदल जाए।
यानी फाइनल चॉइस हमेशा पहले से तय हो, ये ज़रूरी नहीं है। यही वजह है कि Dr. Devi Prasad Semwal वोटिंग को polygenic behaviour के तौर पर देखते हैं। आसान शब्दों में कहें तो उनका मानना है कि अगर जेनेटिक की कोई भूमिका है भी, तो वो किसी एक जीन की वजह से नहीं होगी। कई जेनेटिक फैक्टर्स एक साथ काम कर सकते हैं। इसके साथ पर्यावरण भी अपना असर डालता है। यहां पर्यावरण का मतलब सिर्फ़ मौसम से नहीं है। इसमें परिवार, समाज, आर्थिक हालात, राजनीति, मीडिया, नेताओं का असर और लोगों के अपने अनुभव जैसी कई बातें शामिल हैं।
परिवार एक जैसा, लेकिन वोट अलग
जेनेटिक्स और वोटिंग को समझने के लिए डॉ. सेमवाल अपने परिवार का उदाहरण भी देते हैं। वो बताते हैं कि जींस एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचते हैं—दादा से पिता और फिर अगली पीढ़ी तक। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि बच्चे अपने माता-पिता की हर सोच को उसी तरह अपनाएंगे। उनके अपने बेटे को पता है कि वो किस राजनीतिक सोच को मानते हैं और किसे वोट देते हैं।
लेकिन ज़रूरी नहीं कि उनका बेटा भी उसी उम्मीदवार या पार्टी को वोट दे। उसकी अपनी सोच है और वो अपने हिसाब से फैसला करता है। यही उदाहरण बताता है कि जींस से मिलने वाली विरासत और Vote (वोट) देने का फैसला एक ही बात नहीं हैं। जींस अपनी जगह हैं, लेकिन इंसान की सोच, आसपास का माहौल और उसके अनुभव समय के साथ बदलते रहते हैं।
जनरेशन बदलती है तो सोच भी बदलती है
आज की जनरेशन की तुलना कुछ दशक पहले की जनरेशन से करें, तो फर्क साफ़ दिखाई देता है। डॉ. सेमवाल के मुताबिक इस फर्क की एक बड़ी वजह एक्सपोजर है। वो अपने बचपन का उदाहरण देते हैं। उनके दौर में कई बच्चों के पास रोज़मर्रा के लिए कुछ ही जोड़ी कपड़े होते थे। आज बच्चों की लाइफस्टाइल काफी अलग है। पार्टी के लिए अलग कपड़े, स्पोर्ट्स के लिए अलग, सफ़र के लिए अलग और सर्दियों के लिए अलग चीज़ें चाहिए।
आज की जनरेशन के पास दुनिया को देखने और समझने के भी कहीं ज़्यादा रास्ते हैं। इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया ने लोगों का एक्सपोजर बहुत बढ़ा दिया है। अब कोई घटना सिर्फ़ अपने शहर या देश तक सीमित नहीं रहती। दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में क्या हो रहा है, उसकी जानकारी भी लोगों तक तुरंत पहुंच सकती है।
इसका असर राजनीतिक सोच पर भी पड़ सकता है। नई पीढ़ी की उम्मीदें और ज़रूरतें भी अलग हैं। वो पढ़ाई, नौकरी, रहन-सहन, घूमने-फिरने और नए मौकों को अलग नज़र से देखती है। इसलिए राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के सामने भी इस बदलती पीढ़ी की उम्मीदों और ज़रूरतों को समझने की चुनौती रहती है। डॉ. सेमवाल के मुताबिक, ये सिर्फ़ भारत की बात नहीं है। दुनिया के अलग-अलग देशों में नई पीढ़ी को पहले के मुकाबले ज़्यादा जानकारी और नए अनुभव मिल रहे हैं। इसका असर उनकी सोच और फैसलों पर भी दिखाई देता है।
लेकिन यहां वो Genes और जनरेशनल बदलाव के बीच एक फर्क भी बताते हैं। उनका कहना है कि जनरेशन बदलने का मतलब ये नहीं कि हर कुछ साल में हमारे Genes बदल रहे हैं। जेनेटिक में जीन में होने वाले बदलाव को mutation कहा जाता है, जबकि voting behaviour में बदलाव के लिए हर बार mutation की ज़रूरत नहीं होती। उनके मुताबिक, जींस पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते रहते हैं, लेकिन माहौल बदलने से इंसान की सोच और व्यवहार में बदलाव आ सकता है।
क्या नारे भी वोटर के व्यवहार पर असर डालते हैं?
राजनीति में नारों की अहम भूमिका हमेशा से रही है। डॉ. सेमवाल 2014 के इलेक्शन में इस्तेमाल हुए “सबका साथ, सबका विकास” जैसे नारे का उदाहरण देते हैं। उनके मुताबिक एक नारा लोगों का ध्यान खींच सकता है और किसी बड़े राजनीतिक आइडिया को बहुत आसान तरीके से लोगों तक पहुंचा सकता है। वो 1971 के इलेक्शन का भी ज़िक्र करते हैं, जब “इंदिरा हटाओ” और “गरीबी हटाओ” जैसे slogans political campaign का हिस्सा बने। उनके मुताबिक “गरीबी हटाओ” जैसे नारों ने अलग-अलग लोगों के मन में अलग-अलग उम्मीदें पैदा की होंगी।
गरीब व्यक्ति ने इसे अपनी ज़िंदगी बेहतर होने की उम्मीद के तौर पर देखा होगा, मध्यम वर्ग ने आगे बढ़ने की उम्मीद के रूप में समझा होगा और कुछ लोगों ने इसे देश की तरक्की से जोड़कर देखा होगा। यानी एक छोटा-सा स्लोगन अलग-अलग लोगों के लिए अलग मतलब रख सकता है। डॉ. सेमवाल नारे की ताक़त को सिर्फ़ इलेक्शन तक सीमित नहीं रखते। आज़ादी के दौर के “दिल्ली चलो”, “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा” और “इंकलाब ज़िंदाबाद” जैसे नारे का उदाहरण देते हुए वो बताते हैं कि एक छोटा मैसेज भी लोगों के बीच एक बड़ा मक़सद और जज़्बा पैदा कर सकता है।
किसी Constituency को ‘गढ़’ क्यों कहा जाता है?
भारत की राजनीति में अक्सर कुछ constituencies को किसी विशेष लीडर या राजनीतिक परिवार का “गढ़” कहा जाता है। लंबे वक्त तक किसी एक परिवार या पार्टी का वहां मज़बूत सपोर्ट रहना भी पॉलिटिक्स का एक जाना-पहचाना पैटर्न है। Dr. Devi Prasad Semwal इसे भी जेनेटिक्स और पर्यावरण के अपने फ्रेमवर्क से देखने की कोशिश करते हैं। उनका कहना है कि अगर किसी इलाके में कोई नेता लगातार लोगों के संपर्क में रहता है, वहां पढ़ाई, उद्योग, रोज़गार या दूसरी सुविधाओं से लोगों को फायदा मिलता है, तो ये अनुभव भी मतदाताओं की पसंद को प्रभावित कर सकते हैं।
यानी किसी क्षेत्र को सिर्फ़ इसलिए “गढ़” कहना कि वहां एक ही परिवार कई पीढ़ियों से जीतता आया है, पूरी बात नहीं बताता। लोगों का उस नेता के साथ अनुभव कैसा रहा, उन्हें अपने इलाके में क्या बदलाव दिखाई दिए और स्थानीय स्तर पर उन्हें क्या फायदा मिला—ये बातें भी अहम हो सकती हैं। उनकी रिसर्च में Genes से मिलने वाली प्रवृत्ति और आसपास के माहौल के असर के बीच संबंध की बात सामने आती है। लेकिन यहां एक सवाल फिर भी बना रहता है—क्या इसे वैज्ञानिक सच माना जा सकता है? अभी इसका जवाब इतना आसान नहीं है। इसे समझने के लिए और ज़्यादा आंकड़ों और गहरी रिसर्च की ज़रूरत है।
लोकसभा चुनावों को ही रिसर्च का आधार क्यों बनाया?
डॉ. सेमवाल ने अपनी स्टडी के लिए लोकसभा इलेक्शन को चुना। इसकी एक बड़ी वजह उनके मुताबिक सैंपल साइज़ है। भारत में पहला जनरल इलेक्शन 1951-52 में हुआ था और इसके बाद लगातार अलग-अलग लोकसभा इलेक्शन हुए। इलेक्शन कमीशन के रिकॉर्ड में इन चुनावों के आंकड़े और statistics मौजूद हैं। इतने लंबे वक़्त के इलेक्शन रिज़ल्ट को एक साथ देखने से उन्हें अलग-अलग पैटर्न को तुलना करने का मौका मिला।
उनका मानना है कि किसी भी समूह के व्यवहार को समझने के लिए बड़ा नमूना ज़रूरी होता है। एक-दो लोगों या छोटे समूह को देखकर कोई बड़ा रुझान समझना मुश्किल है। लेकिन जब लाखों मतदाताओं के व्यवहार और कई चुनावों के नतीजों को लंबे समय तक देखा जाए, तो कुछ बार-बार दिखने वाले रुझान सामने आ सकते हैं। फिर भी उनके लिए सिर्फ़ आंकड़े ही काफी नहीं हैं।
किसी क्षेत्र को समझने के लिए वहां की आर्थिक स्थिति, पढ़ाई-लिखाई, साक्षरता, गरीबी, मध्यम वर्ग, स्थानीय मुद्दे और क्षेत्रीय हितों को भी देखना ज़रूरी है। एक ही लोकसभा क्षेत्र में रहने वाले लोगों की ज़रूरतें और पसंद अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए लोगों के Vote (वोट) देने के तरीके को सिर्फ़ एक वजह से समझना आसान नहीं है।
Dr. Devi Prasad Semwal की किताब अनुपातों को जेनेटिक्स के मेंडेलियन पैटर्न से जोड़कर समझने की कोशिश करती है। शायद इस रिसर्च की दिलचस्प बात यही है कि ये हमें Vote (वोट) देने के फैसले को सिर्फ़ राजनीति की नज़र से नहीं, बल्कि इंसान की सोच, समाज, जैविक बनावट और आसपास के माहौल को साथ रखकर समझने के लिए प्रेरित करती है। आख़िर एक Vote (वोट) भले ही सिर्फ़ एक बटन दबाने जितना छोटा फैसला लगे, लेकिन उसके पीछे इंसान की सोच, उसके अनुभव और उसकी पूरी ज़िंदगी का असर हो सकता है।
ये भी पढ़ें: From Myths to Science: गौहर रज़ा की Book Launch में वैज्ञानिक सोच पर गहरी बातचीत
आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं



