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इज़हार असर: उर्दू साइंस फ़िक्शन के संजीदा क़लमकार और उनकी शायरी

इज़हार असर उर्दू अदब के उन गिने-चुने लिखने वालों में से हैं जिन्होंने साइंस फ़िक्शन को सिर्फ़ शौक़ नहीं, बल्कि पूरी संजीदगी से अपनाया। उनके नावेल “आधी ज़िंदगी”, “मशीनों की बग़ावत” और “बीस हज़ार साल बाद” ने उर्दू में विज्ञान-कथा की रिवायत को मज़बूत बुनियाद दी। उर्दू में उस दौर तक ज़्यादातर लिखत इश्क़, समाज और तारीख़ के गिर्द घूमती थी। ऐसे में मशीनों, भविष्य और ब्रह्मांड जैसे मौज़ूअ पर लिखना एक नई राह बनाने जैसा था। यही सोच उनकी शायरी में भी झलकती है, जहां विज्ञान का असर साफ़ महसूस होता है।

ज़िंदगी का सफ़र

इज़हार असर की पैदाइश 15 जून 1927 को ज़िला बिजनौर के क़स्बे किरतपुर में हुई। मैट्रिक के बाद वे आगे नहीं पढ़ सके, क्योंकि रोज़ी-रोटी कमाने की ज़िम्मेदारी सिर पर आ गई थी। मगर तालीम की यह कमी उनके हौसले को नहीं रोक सकी। उन्होंने आज़ाद सहाफ़ी (फ़्रीलांस पत्रकार) के तौर पर काम शुरू किया और दिल्ली से निकलने वाले मशहूर रिसालों “बानो” और “चिलमन” की एडिटिंग की। उन्होंने पाक्षिक अदबी रिसाला “हमक़लम” और उर्दू में एक डाइजेस्ट भी शुरू किया। कहा जाता है कि उन्होंने करीब एक हज़ार किताबें लिखीं, जिनमें साइंस फ़िक्शन, जासूसी कहानियां और आम पाठकों के लिए लिखी गई दूसरी किताबें शामिल हैं। इतनी ज़्यादा लिखत किसी भी क़लमकार के लिए बड़ी बात है।

एक ही शै थी बा-अंदाज़-ए-दिगर मांगी थी
मैं ने बीनाई नहीं तुझ से नज़र मांगी थी

इसमें “बीनाई” का मतलब आंखों की रौशनी है और “नज़र” का मतलब निगाह या मेहरबानी की नज़र। शायर कहता है कि मैंने तुझसे देखने की ताक़त नहीं मांगी थी, मैंने तो तेरी एक मुहब्बत भरी नज़र मांगी थी। दोनों लफ़्ज़ बज़ाहिर एक जैसे लगते हैं, मगर उनके मानी में बड़ा फ़र्क़ है।

तमाम मज़हर-ए-फ़ितरत तिरे ग़ज़ल-ख़्वां हैं
ये चांदनी भी तिरे जिस्म का क़सीदा है

तारीकियों के पार चमकती है कोई शय
शायद मिरे जुनून-ए-सफ़र की उमंग है

इस शायरी की ख़ासियत

इन अशआर में चांद, चांदनी, अंधेरा, सूरज और सफ़र जैसे इशारे बार-बार आते हैं। ये आसमान और कायनात से जुड़े अल्फ़ाज़ हैं, जो एक साइंस फ़िक्शन लिखने वाले के ज़ेहन से बहुत क़रीब हैं। इज़हार असर की शायरी में इश्क़ का जज़्बा और कायनात की वुसअत साथ-साथ चलते हैं। इसी वजह से उनकी ग़ज़लें रिवायती होते हुए भी अलग महसूस होती हैं।

तू भी तो हटा जिस्म के सूरज से अंधेरे
ये महकी हुई रात भी महताब-ब-कफ़ है

इज़हार असर ने कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद अपनी मेहनत और लगन से उर्दू अदब में अपनी जगह बनाई। उन्होंने साबित किया कि उर्दू सिर्फ़ गुल-ओ-बुलबुल की ज़बान नहीं है, वह मशीनों, ख़लाओं और आने वाले ज़माने की बात भी उतनी ही ख़ूबसूरती से कह सकती है। आज जब साइंस और अदब को अलग-अलग दुनिया समझा जाता है, उनका काम याद दिलाता है कि दोनों एक-दूसरे के साथी हो सकते हैं।

ये भी पढ़ें: सत्यपाल आनंद: चार ज़बानों में अपनी रूह की आवाज़ लिखने वाला शख़्स  

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