लेफ्टिनेंट जनरल Harbaksh Singh (हरबख़्श सिंह) भारतीय फ़ौज के उन बहादुर जनरलों में से एक थे, जिन्होंने मुल्क़ के इतिहास में अहम किरदार निभाया। 1965 की भारत-पाकिस्तान जंग के दौरान उन्होंने पश्चिमी फ़ौजी कमान (Western Command) की अगुवाई की। इस दौरान उनकी बेख़ौफ़ हिम्मत, दूर की सोच और मज़बूत इरादे के लिए उन्हें “पंजाब का रक्षक” भी कहा जाता है।
शुरुआती ज़िंदगी, जन्म और तालीम
जनरल Harbaksh Singh (हरबख़्श सिंह) की पैदाइश 1 अक्टूबर 1913 को जिंद रियासत के गांव बडरुखां, ज़िला संगरूर, पंजाब में एक ख़ुशहाल माढ़ड़ जाट परिवार में हुई थी। इस गांव को महाराजा रणजीत सिंह का ननिहाल भी माना जाता है। उनके वालिद डॉ. हरनाम सिंह गांव के पहले डॉक्टर थे। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इन्फेंट्री में अपनी सेवाएं दी थी। Harbaksh Singh (हरबख़्श सिंह) सात भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। उन्होंने संगरूर के रणबीर हाई स्कूल से पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने सरकारी कॉलेज, लाहौर से ग्रेजुएशन की।
फ़ौजी सफ़र और रेजिमेंट
Harbaksh Singh (हरबख़्श सिंह) 1933 में इंडियन मिलिट्री अकादमी (IMA), देहरादून के पहले बैच में शामिल हुए। 15 जुलाई 1935 को उन्हें भारतीय फ़ौज में कमीशन मिला। शुरुआत में वो ब्रिटिश आर्मी की रेजिमेंट ‘Argyll and Sutherland Highlanders’ से जुड़े। इस दौरान उन्होंने उत्तर-पश्चिमी सरहद (NWFP) में मोहमंद मुहिम में हिस्सा लिया। 1936 में वो औरंगाबाद में 11वीं सिख रेजिमेंट की 5वीं बटालियन में शामिल हुए।

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मलाया मुहिम में दुश्मन से लड़ते हुए वो बुरी तरह ज़ख़्मी हो गए। सिंगापुर पर जापानी फ़ौज के कब्ज़े के बाद उन्हें जंग का क़ैदी (POW) बना लिया गया। क़ैद के दौरान उन्हें तकलीफ़ों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद वो आख़िर तक अपने उसूलों पर क़ायम रहे। 1945 में रिहा होने के बाद वो भारत लौट आए। लेफ्टिनेंट जनरल Harbaksh Singh (हरबख़्श सिंह) ने 14 नवंबर 1999 को 86 साल की उम्र में नई दिल्ली में आख़िरी सांस ली। उनकी आख़िरी यात्रा के दौरान पूरे फ़ौजी सम्मान के साथ देश ने उन्हें आख़िरी सलाम किया।
15 अनोखे और कम सुने गए तथ्य
- पीछे हटने के हुक्म को मानने से इनकार:
1965 की जंग के दौरान जब पाकिस्तान की फ़र्स्ट आर्मर्ड डिवीजन ने अमेरिकी पैटन टैंकों के साथ खेमकरण सेक्टर पर हमला किया, तो दिल्ली में बैठे आर्मी चीफ़ जनरल जे.एन. चौधरी ने लेफ्टिनेंट Harbaksh Singh (हरबख़्श सिंह) को ज़ुबानी हुक्म दिया कि 11 Corps को पीछे हटाकर ब्यास नदी के पास नई डिफेंस लाइन बनाई जाए।
Harbaksh Singh (हरबख़्श सिंह) के मुताबिक, अगर फ़ौज पीछे हटती तो अमृतसर, गुरदासपुर और तरनतारन जैसे पंजाब के अहम इलाक़े और श्री दरबार साहिब बिना लड़ाई के दुश्मन के हाथ में जा सकते थे। उन्होंने इस हुक्म को मानने से साफ़ इनकार कर दिया और कहा कि अगर ऐसा हुक्म लागू करवाना है, तो पहले लिखित हुक्म भेजा जाए। इस फ़ैसले को 1965 की जंग के अहम मोड़ों में गिना जाता है।

- ‘पैटन नगर’ का नाम पड़ा:
खेमकरण के पास असल उत्तर की लड़ाई में Harbaksh Singh (हरबख़्श सिंह) की अगुवाई में भारतीय फ़ौज ने नहरों के बांध तोड़कर खेतों में पानी भरवा दिया। इससे पाकिस्तान के अमेरिकी पैटन टैंक कीचड़ में फंस गए। भारतीय फ़ौज ने बड़ी तादाद में पाकिस्तानी टैंकों को तबाह किया या अपने कब्ज़े में लिया। इसके बाद इस जगह को “पैटन नगर” कहा जाने लगा।
- हाजी पीर दर्रे पर अहम जीत:
उनकी अगुवाई में मेजर रणजीत सिंह दयाल की टुकड़ी ने 28 अगस्त 1965 को हाजी पीर दर्रे पर तिरंगा फहराया। ये 1965 की जंग में एक अहम कामयाबी थी और इससे पाकिस्तान की ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ की कोशिशों को झटका लगा।
- ‘मेघदूत फ़ोर्स’ बनाने की इजाज़त:
1965 की जंग के दौरान मेजर मेघ सिंह के सुझाव पर हरबख़्श सिंह ने दुश्मन की सरहद के अंदर जाकर गुरिल्ला हमले करने के लिए ‘मेघदूत फ़ोर्स’ बनाने की इजाज़त दी। बाद में यही यूनिट भारतीय फ़ौज की मशहूर ‘9 पैरा’ स्पेशल फ़ोर्सेज़ बनी।
- लाहौर और सियालकोट की तरफ़ हमला:
जब पाकिस्तान ने छंब सेक्टर में ‘ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम’ के तहत हमला किया, तो Harbaksh Singh (हरबख़्श सिंह) ने लाहौर की तरफ़ इछोगिल नहर और सियालकोट की दिशा में अंतरराष्ट्रीय सरहद पार कर जवाबी मोर्चा खोलने की रणनीति बनाई। इससे पाकिस्तान पर अपना ध्यान कश्मीर से हटाकर दूसरे मोर्चों पर लगाने का दबाव पड़ा।
- अपना रैंक ख़ुद कम किया:
1947 में 1 सिख बटालियन के कमांडिंग अफ़सर लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रणजीत राय शहीद हो गए। इसके बाद कर्नल Harbaksh Singh (हरबख़्श सिंह) ने ख़ुद आगे बढ़कर कमान संभाली। उन्होंने अपनी वर्दी से एक सितारा उतार दिया और लेफ्टिनेंट कर्नल के रैंक पर मोर्चे पर पहुंच गए।
- श्रीनगर की हिफ़ाज़त:
नवंबर 1947 में शालातेंग के पास कबायली हमलावर श्रीनगर से सिर्फ़ कुछ मील दूर पहुंच गए थे। Harbaksh Singh (हरबख़्श सिंह) ने उनके खिलाफ़ ऐसी रणनीति बनाई कि भारतीय फ़ौज ने उन्हें घेर लिया। इस लड़ाई में बड़ी तादाद में हमलावर मारे गए और श्रीनगर एयरपोर्ट को दुश्मन के हाथ में जाने से बचा लिया गया।
- वीर चक्र से सम्मानित:
1948 में 163 इन्फैंट्री ब्रिगेड की कमान संभालते हुए उन्होंने छह दिनों में नास्ताचुन दर्रा पार करके तिथवाल पर कब्ज़ा करने में अहम भूमिका निभाई। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
- पद्म सम्मान से नवाज़े गए:
1965 की जंग में देश की हिफ़ाज़त में उनकी भूमिका के लिए भारत सरकार ने 1966 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। इससे पहले उन्हें पद्म भूषण भी मिल चुका था।
- पहले भारतीय अफ़सर:
1959 में वो जर्मन फ़ौज की पहली डिवीजन के साथ ट्रेनिंग और तजुर्बे के लिए जाने वाले पहले भारतीय फ़ौजी अफ़सर बने।
- अमरिंदर सिंह उनके ADC रहे:
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, जो सिख रेजिमेंट में थे, 1965 की जंग के दौरान हरबख़्श सिंह के ADC यानी Aide-de-Camp के तौर पर उनके साथ रहे।
- घोड़े पर सवार होकर परेड:
जापानी क़ैद के दौरान Harbaksh Singh (हरबख़्श सिंह) का जिस्म बहुत कमज़ोर हो गया था। वो लंबे समय तक पैदल मार्च नहीं कर पाते थे। जब वो 4 सिख में सेकंड-इन-कमांड बने, तो वो घोड़े पर सवार होकर परेड करते थे। उन्हें ऐसे इन्फैंट्री अफ़सरों में गिना जाता है जिन्होंने इस तरह परेड की।
- IV Corps की कमान संभाली:
1962 की भारत-चीन जंग के दौरान जब हालात बेहद मुश्किल हो गए थे, तब उन्हें शिमला से तुरंत बुलाकर तेज़पुर में IV Corps की कमान दी गई। उनका काम फ़ौज का हौसला बढ़ाना और हालात को संभालना भी था।
14. जवानों के बीच मोर्चे पर मौजूद रहते थे:
1965 की जंग के दौरान Harbaksh Singh (हरबख़्श सिंह) सिर्फ़ पीछे बैठकर हुक्म नहीं देते थे। वो ख़ुद खेमकरण, बरकी और डोगरई जैसे आगे के मोर्चों पर जाकर जवानों के बीच खड़े होते थे। उनकी ये मौजूदगी जवानों के लिए हौसले का सबब बनती थी।
जंग पर किताबें लिखी
Harbaksh Singh (हरबख़्श सिंह) ने अपने फ़ौजी तजुर्बों और जंग से जुड़े हालात को किताबों में भी दर्ज किया। उनकी मशहूर किताबों में War Despatches: Indo-Pak Conflict 1965 और उनकी आत्मकथा In the Line of Duty: A Soldier Remembers शामिल हैं। जनरल Harbaksh Singh (हरबख़्श सिंह) सिर्फ़ एक फ़ौजी अफ़सर नहीं थे। वो ऐसे कमांडर थे, जिन्होंने मुश्किल हालात में मज़बूत इरादे और हिम्मत के साथ अपनी ज़िम्मेदारी निभाई। 1965 की जंग में उनकी अगुवाई भारतीय फ़ौज के इतिहास का एक अहम हिस्सा बन गई।
लेख: मनमीत कौर
इस लेख को पंजाबी में पढ़ें
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